रविवार, 27 जुलाई 2014
Case #26 - 26 देना और लेना
ट्रेसी अकेले ही घूमना पसन्द करती थी । उसे एक स्वतंत्र औरत की तरह रहना पसन्द था । अपने घर कुछ हफ्तों में कुछ दिनों के लिये ही जाती थी, और उसे यह ठीक लगता था । शहर में उसका अपना घर था । उसने कहा यह उसके पति को यह ठीक लगता था क्योंकि उसका स्तर ऊँचा था, और निश्चय ही उनके बीच बहस होगी ।
उसे लगता था कि उसका जीवन उसका अपना था । और, अब चूंकि उसका बेटा बड़ा हो चुका था, उसे पारिवारिक जिम्मेदारियों को निभाने की जरूरत नहीं थी । वह अपनी जीवनशैली और अपने काम से प्यार करती थी ।
फिर भी, उसकी चिंता ये थी कि जब वो घर में होती थी तो कुछ समय बाद उसे घबराहट होने लगती थी ।
गहराई से जानने के लिये, मैंने उससे उसके माता-पिता के बारे में पूछा । जब वो बड़ी हो रही थी, उसको कुछ हद तक स्वतंत्रता मिली हुई थी – उसकी माँ काफी सारे बच्चों में व्यस्त रहती थी – उसके पिता उसके साथ लड़कों जैसा व्यवहार करते थे और उसे कुछ विशेषाधिकार दे रखे थे – हालांकि वो उससे प्यार भी करते थे । फिर भी, जब उस पर ध्यान दिया जाता था तो ये ध्यान कुछ कर दिखाने के लिये होता था, या फिर एक अच्छा बच्चा बनने के लिये । इस सब की जड़ में यह था कि या तो यह हो या वह हो । या तो उस पर ध्यान दिया जाता था या वह स्वतन्त्र होती थी । लेकिन इसके बीच का कोई रास्ता नहीं था ।
उसके बाद, मैंने यह जानने के लिये कि उसके पति के साथ यह कैसा था, एक प्रयोग का सुझाव दिया ।
हम एक-दूसरे के सामने खड़े हुए । मुड़े हुए हाथ ऊपर करने का अर्थ था कि ध्यान आकर्षित करना चाहते थे । हाथ पीछे की तरफ करने का अर्थ था स्वतन्त्रता चाहते थे ।
वह एकदम से परेशान हो गई । उसने कहा वह ध्यान आकर्षित करने की मुद्रा में नहीं रहना चाहती थी । इससे उस पर बहुत दबाव पड़ता था और वह घबरा जाती थी ।
मैंने उससे पूछा कि वो स्वयँ कितनी बार महसूस करती थी कि उसे उस मुद्रा में रहना चाहिये, स्वाभाविकत: अपने पति के साथ । उसने कहा उसे जितनी उसके पास स्वतन्त्रता थी उससे ज्यादा स्वतन्त्रता चाहिये थी । मैंने पूछा बिना किसी कर्तव्य पालन की जिम्मेदारी के कितनी बार । उसने कहा- साल में दो बार अपने घर पर और बाकी समय उसका अपना हो ।
मेरे संबंध का यह नमूना नहीं था, लेकिन मैं यह स्वीकार कर सकता था कि यह नमूना उसका होगा।
इसलिये, इस आधार पर हम आगे बढ़े । वह ध्यान आकर्षित कराने की मुद्रा में थोड़ी देर ही रहना चाहती थी । फिर उसके बाद स्वतन्त्रता पाने की मुद्रा में चली गई । उसने कहा कि उसको ध्यान आकर्षित करने की मुद्रा में बड़ा असुविधाजनक लगता था ।
इसलिये, मैंने स्थिति को उल्टा कर दिया । मैंने पति का किरदार निभाया और हाथों को ध्यान आकर्षित करने की मुद्रा में ले आया । उसने एकदम बड़े जोर से पीछे हटना शुरू कर दिया । उसे बहुत गुस्सा आया । उसको लगा जब भी वह अपने पति के साथ होती थी तो वह उससे कुछ न कुछ चाहता था, और यह कि वह हमेशा ही उसको देती आई थी पर उसे कभी कुछ वापिस नहीं मिला था । इसलिये, उसका गुस्सा उभर कर आया और यह घटनाचक्र स्पष्ट हो गया । वो दूर हुई, उसकी जरूरतें और बढ़ गईं, वह और दूर हो गई, इत्यादि ।
इसलिये, मैंने ये सुझाव दिया कि हम हाथ खड़े करने की एक और मुद्रा अपने प्रयोग में जोड़ लें : देने वाली मुद्रा । स्पष्ट रुप से उसके पास देने के लिये कुछ और नहीं था । लेकिन मैंने उसके पति के रूप में देने वाली मुद्रा अपना ली और उसे कहा कि वह ध्यान आकर्षित करने वाली/प्राप्त करने वाली मुद्रा में आ जाये ।
इससे भी उसको बहुत 'शिकायत' हुई । उसे लगता था कि वास्तव में उसने अपने पति से कुछ पाया नहीं, और उसे केवल देते हुए ही काफी साल बीत गये थे ।
फिर भी, मैंने उसे वर्तमान में आने के लिये कहा और एक बार अपना गुस्सा दिखा कर उस मुद्रा का अनुभव करे जिसमें दिया जा रहा हो । वह मान गई और लेने करने से उस पर बहुत गहरा प्रभाव पड़ा । परन्तु, वह फिर असहज महसूस करने लगी – लेने की कीमत उसे देकर चुकानी पड़ेगी, जिससे वह डरती थी ।
इसलिये, इस घटनाचक्र का गहरा पक्ष उजागर हो गया ।
इसलिये, मैंने उसे एक बार प्राप्त करने और एक बार देने के लिये कहा । मैं उसे दूँगा और वह लेगी, और जैसे ही वह असहज महसूस करेगी, हम मुद्रा को बदल लेंगें । वह अपना उधार चुकाने के लिये मुझे वापस दे सकती थी (और मैं प्राप्त करूँगा) । लेकिन तब तक ही जब तक वह सहज रह सकती थी ।
उसकी गति बहुत तेज थी, एक मुद्रा में वह केवल कुछ ही सैकेंड के लिये रहती थी । परन्तु, इससे वह बहुत ही सहज महसूस कर रही थी, और उसे लगा कि हम एक ही मुद्रा में जरूरत से ज्यादा नहीं रहे ।
यह अनु्भव उसके लिये गहरी पैनी दृष्टि वाला था, और इसने उसे वो अनुभव दिया जिसके लिये वह इच्छुक थी पर उसने उम्मीद पूरी तरह से छोड़ दी थी ।
इसका महत्व यह नहीं था कि यह स्थिति के लिये 'ठीक' था या स्थिति का 'इलाज' था, बल्कि यह जागरुकता को खोजने के लिये था, जिसने उसमें एक बड़ी गहरी जागरुकता उत्पन्न की, उसका संदर्भ, उसका घटनाचक्र में भाग लेना, तथा उसे एक नया अनुभव भी प्रदान किया ।
ऐसे नये अनुभव जो गेस्टाल्ट प्रयोगों से निकल कर आते हैं उपाय नहीं हैं, लेकिन एक आदमी के संसार को बड़ा करते हैं, और कुछ करने के लिये शुरुआत का एक नया बिंदु प्रदान करते हैं ।
जब वातावरण से कुछ नहीं मिलता तो वह एक ठीक होने का अनुभव भी प्रदान करते हैं ।
प्रक्रिया की शुरूआत पृष्ठभूमि के संदर्भ से हुई थी । एक बार वह स्पष्ट हो गया तो हम अभी और यहीं के प्रयोग पर आ गये । इसके लिये उसे यह लगना चाहिये था कि यह किसी 'चाहने वाली चीज' के द्वारा व्यवस्थित नहीं किया गया था, लेकिन वास्तव में यह उसकी लय के बारे में था ।
उसमें स्वयँ भाग ले कर मैं जहाँ वह थी, उसे क्या आवश्यकता थी, उससे तालमेल बिठा सकता था और उसकी व्यवस्था पर एक सीधी आनुभविक पैनी दृष्टि डाल सकता था ।
इसका ये अर्थ भी था कि मैं नये तरीकों से प्रतिक्रिया कर सकता था । मैंने प्रयोग में बदलाव ला कर 'देने' की तीसरी मुद्रा भी जोड़ दी थी, क्योंकि यह स्पष्टत: अनुपस्थित थी, फिर भी बहुत ही महत्वपूर्ण तत्व थी । इसने उसको किसी के द्वारा बिना अधिक कीमत के दिये जाने का अनुभव भी लेने दिया।
उसे लगता था कि उसका जीवन उसका अपना था । और, अब चूंकि उसका बेटा बड़ा हो चुका था, उसे पारिवारिक जिम्मेदारियों को निभाने की जरूरत नहीं थी । वह अपनी जीवनशैली और अपने काम से प्यार करती थी ।
फिर भी, उसकी चिंता ये थी कि जब वो घर में होती थी तो कुछ समय बाद उसे घबराहट होने लगती थी ।
गहराई से जानने के लिये, मैंने उससे उसके माता-पिता के बारे में पूछा । जब वो बड़ी हो रही थी, उसको कुछ हद तक स्वतंत्रता मिली हुई थी – उसकी माँ काफी सारे बच्चों में व्यस्त रहती थी – उसके पिता उसके साथ लड़कों जैसा व्यवहार करते थे और उसे कुछ विशेषाधिकार दे रखे थे – हालांकि वो उससे प्यार भी करते थे । फिर भी, जब उस पर ध्यान दिया जाता था तो ये ध्यान कुछ कर दिखाने के लिये होता था, या फिर एक अच्छा बच्चा बनने के लिये । इस सब की जड़ में यह था कि या तो यह हो या वह हो । या तो उस पर ध्यान दिया जाता था या वह स्वतन्त्र होती थी । लेकिन इसके बीच का कोई रास्ता नहीं था ।
उसके बाद, मैंने यह जानने के लिये कि उसके पति के साथ यह कैसा था, एक प्रयोग का सुझाव दिया ।
हम एक-दूसरे के सामने खड़े हुए । मुड़े हुए हाथ ऊपर करने का अर्थ था कि ध्यान आकर्षित करना चाहते थे । हाथ पीछे की तरफ करने का अर्थ था स्वतन्त्रता चाहते थे ।
वह एकदम से परेशान हो गई । उसने कहा वह ध्यान आकर्षित करने की मुद्रा में नहीं रहना चाहती थी । इससे उस पर बहुत दबाव पड़ता था और वह घबरा जाती थी ।
मैंने उससे पूछा कि वो स्वयँ कितनी बार महसूस करती थी कि उसे उस मुद्रा में रहना चाहिये, स्वाभाविकत: अपने पति के साथ । उसने कहा उसे जितनी उसके पास स्वतन्त्रता थी उससे ज्यादा स्वतन्त्रता चाहिये थी । मैंने पूछा बिना किसी कर्तव्य पालन की जिम्मेदारी के कितनी बार । उसने कहा- साल में दो बार अपने घर पर और बाकी समय उसका अपना हो ।
मेरे संबंध का यह नमूना नहीं था, लेकिन मैं यह स्वीकार कर सकता था कि यह नमूना उसका होगा।
इसलिये, इस आधार पर हम आगे बढ़े । वह ध्यान आकर्षित कराने की मुद्रा में थोड़ी देर ही रहना चाहती थी । फिर उसके बाद स्वतन्त्रता पाने की मुद्रा में चली गई । उसने कहा कि उसको ध्यान आकर्षित करने की मुद्रा में बड़ा असुविधाजनक लगता था ।
इसलिये, मैंने स्थिति को उल्टा कर दिया । मैंने पति का किरदार निभाया और हाथों को ध्यान आकर्षित करने की मुद्रा में ले आया । उसने एकदम बड़े जोर से पीछे हटना शुरू कर दिया । उसे बहुत गुस्सा आया । उसको लगा जब भी वह अपने पति के साथ होती थी तो वह उससे कुछ न कुछ चाहता था, और यह कि वह हमेशा ही उसको देती आई थी पर उसे कभी कुछ वापिस नहीं मिला था । इसलिये, उसका गुस्सा उभर कर आया और यह घटनाचक्र स्पष्ट हो गया । वो दूर हुई, उसकी जरूरतें और बढ़ गईं, वह और दूर हो गई, इत्यादि ।
इसलिये, मैंने ये सुझाव दिया कि हम हाथ खड़े करने की एक और मुद्रा अपने प्रयोग में जोड़ लें : देने वाली मुद्रा । स्पष्ट रुप से उसके पास देने के लिये कुछ और नहीं था । लेकिन मैंने उसके पति के रूप में देने वाली मुद्रा अपना ली और उसे कहा कि वह ध्यान आकर्षित करने वाली/प्राप्त करने वाली मुद्रा में आ जाये ।
इससे भी उसको बहुत 'शिकायत' हुई । उसे लगता था कि वास्तव में उसने अपने पति से कुछ पाया नहीं, और उसे केवल देते हुए ही काफी साल बीत गये थे ।
फिर भी, मैंने उसे वर्तमान में आने के लिये कहा और एक बार अपना गुस्सा दिखा कर उस मुद्रा का अनुभव करे जिसमें दिया जा रहा हो । वह मान गई और लेने करने से उस पर बहुत गहरा प्रभाव पड़ा । परन्तु, वह फिर असहज महसूस करने लगी – लेने की कीमत उसे देकर चुकानी पड़ेगी, जिससे वह डरती थी ।
इसलिये, इस घटनाचक्र का गहरा पक्ष उजागर हो गया ।
इसलिये, मैंने उसे एक बार प्राप्त करने और एक बार देने के लिये कहा । मैं उसे दूँगा और वह लेगी, और जैसे ही वह असहज महसूस करेगी, हम मुद्रा को बदल लेंगें । वह अपना उधार चुकाने के लिये मुझे वापस दे सकती थी (और मैं प्राप्त करूँगा) । लेकिन तब तक ही जब तक वह सहज रह सकती थी ।
उसकी गति बहुत तेज थी, एक मुद्रा में वह केवल कुछ ही सैकेंड के लिये रहती थी । परन्तु, इससे वह बहुत ही सहज महसूस कर रही थी, और उसे लगा कि हम एक ही मुद्रा में जरूरत से ज्यादा नहीं रहे ।
यह अनु्भव उसके लिये गहरी पैनी दृष्टि वाला था, और इसने उसे वो अनुभव दिया जिसके लिये वह इच्छुक थी पर उसने उम्मीद पूरी तरह से छोड़ दी थी ।
इसका महत्व यह नहीं था कि यह स्थिति के लिये 'ठीक' था या स्थिति का 'इलाज' था, बल्कि यह जागरुकता को खोजने के लिये था, जिसने उसमें एक बड़ी गहरी जागरुकता उत्पन्न की, उसका संदर्भ, उसका घटनाचक्र में भाग लेना, तथा उसे एक नया अनुभव भी प्रदान किया ।
ऐसे नये अनुभव जो गेस्टाल्ट प्रयोगों से निकल कर आते हैं उपाय नहीं हैं, लेकिन एक आदमी के संसार को बड़ा करते हैं, और कुछ करने के लिये शुरुआत का एक नया बिंदु प्रदान करते हैं ।
जब वातावरण से कुछ नहीं मिलता तो वह एक ठीक होने का अनुभव भी प्रदान करते हैं ।
प्रक्रिया की शुरूआत पृष्ठभूमि के संदर्भ से हुई थी । एक बार वह स्पष्ट हो गया तो हम अभी और यहीं के प्रयोग पर आ गये । इसके लिये उसे यह लगना चाहिये था कि यह किसी 'चाहने वाली चीज' के द्वारा व्यवस्थित नहीं किया गया था, लेकिन वास्तव में यह उसकी लय के बारे में था ।
उसमें स्वयँ भाग ले कर मैं जहाँ वह थी, उसे क्या आवश्यकता थी, उससे तालमेल बिठा सकता था और उसकी व्यवस्था पर एक सीधी आनुभविक पैनी दृष्टि डाल सकता था ।
इसका ये अर्थ भी था कि मैं नये तरीकों से प्रतिक्रिया कर सकता था । मैंने प्रयोग में बदलाव ला कर 'देने' की तीसरी मुद्रा भी जोड़ दी थी, क्योंकि यह स्पष्टत: अनुपस्थित थी, फिर भी बहुत ही महत्वपूर्ण तत्व थी । इसने उसको किसी के द्वारा बिना अधिक कीमत के दिये जाने का अनुभव भी लेने दिया।
शुक्रवार, 25 जुलाई 2014
Case #25 - 25 10,000 तीर
मेरी का दो बार तलाक हो चुका था और अब वो फिर अपने पिछले पति के साथ रह रही थी, जो उसके बेटे का पिता था ।
मैंने उससे जीवन के सफर के बारे में पूछा ।
दोनों एक साथ एक व्यापार करते थे लेकिन वो एक दृष्टिकोण पर सहमत नहीं होतेथे । समय के साथ वह उसके साथ हिंसक होता गया था । यह काफी वर्षों तक चलता रहा ।
फिर उसने उससे तलाक माँगा, और उसके बाद एक कर्मचारी, जो उनके व्यापार में काम करता थी, के साथ संबंध बनाना चाहा ।
उस औरत द्वारा नकार दिये जाने के बाद उसने मेरी से दोबारा विवाह करने के लिये कहा, जिसे उसने मान लिया। पर उसका उसको मारना जारी रहा ।
अंत में, बहुत वर्षों बाद जब हिंसा हद से बढ़ गई तो उसने उसे तलाक दे दिया ।
कुछ वर्षों के बाद उन्होने फिर साथ रहना शुरू कर दिया, इस बार बिना किसी हिंसा के, और वह अब अपने संबंध को संतोषजनक बताती है, और अब वह उसके साथ नाखुश नहीं है ।
फिर भी, यह बताते हुए उसे बहुत पीड़ा महसूस हुई थी।
मैंने उससे पूछा कि वो बची कैसे रही; उसको अपनी माँ और दादी के बारे में याद आया कि उनको किस तरह का जीवन व्यतीत करना पड़ा था (बिना हिंसा के ) ।
मैंने उससे पूछा कि उसे क्या महसूस हो रहा था। उसका उत्तर था 'जैसे मेरे ह्रदय में 10,000 तीर हैं' ।
मैंने इस बात को समझा कि वो इसके बजाय कि दूसरों को दर्द दे, दर्द को अपने अंदर छुपा कर रखती है, लेकिन मैंने उस पर इसके प्रभाव के लिये चिंता जताई ।
मैंने उससे पूछा कि मेरे साथ, जो कि एक आदमी है, बात करते हुए उसे कैसा लगता था – उसने कहा कि वो सुरक्षित महसूस कर रही थी ।
मैंने उससे कहा कि एक आदमी ने वो तीर उसको चुभाये थे, इसलिये एक आदमी हो कर मैं उन्हे निकालने में उसकी सहायता करना चाहता था ।
मैंने ऐसा किया, 'तीर' को जमीन पर लिटा कर, इस बात को माना कि वह किस तरह बुरी तरह घायल हुई होगी ।
मैंने यह जाँचा कि उसको कैसा लग रहा था: उसने बताया कि उसे पीड़ा महसूस हो रही थी, लेकिन अंदर तक द्रवित भी महसूस कर रही थी, और थोड़ा आराम भी लग रहा था ।
इसलिये मैंने इस प्रक्रिया को दो बार दोहराया, हर दफा उसके अनुभव के अलग पक्ष को देखा ।
उसको थोड़ी राहत महसूस हुई, लेकिन उसको अपने हाथ कुछ सुन्न भी होते हुए लगे । इससे यह पता चलता था कि उसने काफी कर लिया था । अंत में, मैंने यह सुझाव दिया कि हम उसके चुनाव के अनुसार तीन तीरों से ये पद्धति करते हैं । उसने तीरों को जमीन के अन्दर गाड़ने वाली पद्धति को चुना ।
इसलिये मैंने उसको एक काल्पनिक कहानी सुनाई जिसमें हम दोनो तीरों को गाड़ने के लिये एक जंगल में जा रहे थे और ये मान कर कि तीर जमीन में गाड़े जा चुके थे हम उन्हे गड़ा हुआ ही छोड़ देते हैं ।
अंत में उसको हल्केपन का और उस जगह पर देखे और सुने जाने का अनुभव हुआ ।
मैंने उससे कहा कि यही काम वह घर पर करे और तीन और तीरों के साथ इस प्रक्रिया को अपने दिमाग में दिन में एक बार करके उन्हे गाड़ने की पद्धति अपनाये ।
इस प्रक्रिया में मैंने संदर्भ को अच्छी तरह से समझने के लिये उसकी पृष्ठभूमि का ढाँचा बनाया । फिर मैंने उसको ठीक करने के लिये अपने आदमी होने को इस्तेमाल किया । मैं इस बात को जाँचते हुए कि हर कदम पर उसे कैसा लग रहा था, धीरे-धीरे आगे बढ़ा और उसे काफी विकल्प दिये ।
मैंने उसके बताये गये तीरों के लक्षण को गंभीरता से लेते हुए उसे ठीक करने का कार्य प्रारंभ किया । महत्वपूर्ण कारक तीरों की संख्या को निकालना नहीं था, या फिर दर्द का स्थायी तौर पर निवारण करना नहीं था, लेकिन वास्तव में जो हमने शुरूआत की थी उससे ये अंतर पड़ा था कि उसे यह रास्ता मिल गया था कि वह स्वयँ इसका सामना कर सकती थी ।
यहाँ पर गेस्टाल्ट प्रयोग सीधे तथ्यों से और जो शब्द उसने प्रयोग किये थे से बनाया गया था और यह मूलत: हमारे बीच स्थापित हुए संबंध के कारण काम कर गया ।
मैंने उससे जीवन के सफर के बारे में पूछा ।
दोनों एक साथ एक व्यापार करते थे लेकिन वो एक दृष्टिकोण पर सहमत नहीं होतेथे । समय के साथ वह उसके साथ हिंसक होता गया था । यह काफी वर्षों तक चलता रहा ।
फिर उसने उससे तलाक माँगा, और उसके बाद एक कर्मचारी, जो उनके व्यापार में काम करता थी, के साथ संबंध बनाना चाहा ।
उस औरत द्वारा नकार दिये जाने के बाद उसने मेरी से दोबारा विवाह करने के लिये कहा, जिसे उसने मान लिया। पर उसका उसको मारना जारी रहा ।
अंत में, बहुत वर्षों बाद जब हिंसा हद से बढ़ गई तो उसने उसे तलाक दे दिया ।
कुछ वर्षों के बाद उन्होने फिर साथ रहना शुरू कर दिया, इस बार बिना किसी हिंसा के, और वह अब अपने संबंध को संतोषजनक बताती है, और अब वह उसके साथ नाखुश नहीं है ।
फिर भी, यह बताते हुए उसे बहुत पीड़ा महसूस हुई थी।
मैंने उससे पूछा कि वो बची कैसे रही; उसको अपनी माँ और दादी के बारे में याद आया कि उनको किस तरह का जीवन व्यतीत करना पड़ा था (बिना हिंसा के ) ।
मैंने उससे पूछा कि उसे क्या महसूस हो रहा था। उसका उत्तर था 'जैसे मेरे ह्रदय में 10,000 तीर हैं' ।
मैंने इस बात को समझा कि वो इसके बजाय कि दूसरों को दर्द दे, दर्द को अपने अंदर छुपा कर रखती है, लेकिन मैंने उस पर इसके प्रभाव के लिये चिंता जताई ।
मैंने उससे पूछा कि मेरे साथ, जो कि एक आदमी है, बात करते हुए उसे कैसा लगता था – उसने कहा कि वो सुरक्षित महसूस कर रही थी ।
मैंने उससे कहा कि एक आदमी ने वो तीर उसको चुभाये थे, इसलिये एक आदमी हो कर मैं उन्हे निकालने में उसकी सहायता करना चाहता था ।
मैंने ऐसा किया, 'तीर' को जमीन पर लिटा कर, इस बात को माना कि वह किस तरह बुरी तरह घायल हुई होगी ।
मैंने यह जाँचा कि उसको कैसा लग रहा था: उसने बताया कि उसे पीड़ा महसूस हो रही थी, लेकिन अंदर तक द्रवित भी महसूस कर रही थी, और थोड़ा आराम भी लग रहा था ।
इसलिये मैंने इस प्रक्रिया को दो बार दोहराया, हर दफा उसके अनुभव के अलग पक्ष को देखा ।
उसको थोड़ी राहत महसूस हुई, लेकिन उसको अपने हाथ कुछ सुन्न भी होते हुए लगे । इससे यह पता चलता था कि उसने काफी कर लिया था । अंत में, मैंने यह सुझाव दिया कि हम उसके चुनाव के अनुसार तीन तीरों से ये पद्धति करते हैं । उसने तीरों को जमीन के अन्दर गाड़ने वाली पद्धति को चुना ।
इसलिये मैंने उसको एक काल्पनिक कहानी सुनाई जिसमें हम दोनो तीरों को गाड़ने के लिये एक जंगल में जा रहे थे और ये मान कर कि तीर जमीन में गाड़े जा चुके थे हम उन्हे गड़ा हुआ ही छोड़ देते हैं ।
अंत में उसको हल्केपन का और उस जगह पर देखे और सुने जाने का अनुभव हुआ ।
मैंने उससे कहा कि यही काम वह घर पर करे और तीन और तीरों के साथ इस प्रक्रिया को अपने दिमाग में दिन में एक बार करके उन्हे गाड़ने की पद्धति अपनाये ।
इस प्रक्रिया में मैंने संदर्भ को अच्छी तरह से समझने के लिये उसकी पृष्ठभूमि का ढाँचा बनाया । फिर मैंने उसको ठीक करने के लिये अपने आदमी होने को इस्तेमाल किया । मैं इस बात को जाँचते हुए कि हर कदम पर उसे कैसा लग रहा था, धीरे-धीरे आगे बढ़ा और उसे काफी विकल्प दिये ।
मैंने उसके बताये गये तीरों के लक्षण को गंभीरता से लेते हुए उसे ठीक करने का कार्य प्रारंभ किया । महत्वपूर्ण कारक तीरों की संख्या को निकालना नहीं था, या फिर दर्द का स्थायी तौर पर निवारण करना नहीं था, लेकिन वास्तव में जो हमने शुरूआत की थी उससे ये अंतर पड़ा था कि उसे यह रास्ता मिल गया था कि वह स्वयँ इसका सामना कर सकती थी ।
यहाँ पर गेस्टाल्ट प्रयोग सीधे तथ्यों से और जो शब्द उसने प्रयोग किये थे से बनाया गया था और यह मूलत: हमारे बीच स्थापित हुए संबंध के कारण काम कर गया ।
सोमवार, 21 जुलाई 2014
Case #24 - 24 छोड़ा हुआ बच्चा
सत्र की शुरुआत में मैंने कुछ समय जेन के साथ जुड़ने में व्यतीत किया । मैंने देखा उसने पीले/सोने के रंग का टाप पहना हुआ था । उसने कहा कि उसे भड़कीले रंग अच्छे लगते हैं, वो जोश लाते हैं जिससे उदासी से निपटने में सहायता मिलती है । जेन ने बताया कि कैसे वो उत्साही और तेज लोगों के बीच रहना पसन्द करती है; अगर वो ऐसे लोग नहीं हैं उसे उनमें कोई रुचि नहीं होती ।
मैंने उससे पूछा कि वह किसके साथ काम करना चाहती थी - उसने बताया कि व्यापार, पिता और प्रेमी । मैंने उसको एक को चुनने के लिये कहा और उसने व्यापार को चुना ।
व्यक्ति कुछ भी चुने वो ठीक है, और वह अपने लक्ष्य के बहुत करीब हो सकता है ।
मैंने उससे पूछा दर-असल मुद्दा क्या था – उसने कहा कि वह आत्मकेन्द्रित है और जो उसे चाहिये उसके पीछे लग जाती है, बिना दूसरों की परवाह किये ।
मैंने व्यापार में इसके सकारात्मक पक्ष को स्वीकार किया और समझ में आया कि कैसे यह दूसरों को अखर सकती है ।
फिर उसने खु्लासा किया कि उसे बहुत इच्छा है कि दूसरों से सम्मान मिले, और ये कि वास्तव में उसे गोद लिया गया था । उसके अपने माता-पिता ने उसको एक पुल के नीचे छोड़ दिया था ।
इसने मेरे लिये चीजों को महत्वपूर्ण ढंग से बदल दिया । ऐसे महत्वपूर्ण और मुश्किल पड़ाव के खुलासे का ये मतलब है कि वो मुझ पर व्यक्तिगत और ह्रदय के अंदर की बातों के लिये भरोसा कर रही है । इसको सिर्फ उसके बारे में कुछ उपयोगी और उपयुक्त सूचना समझने और उसके आत्मकेन्द्रित होने के संदर्भ में लेने के बजाय, मैंने इसे उसकी सम्माम पाने की इच्छा, जो उसने कहा था कि जिसकी उसे जरूरत है, एक गहरी अन्तर्वेदना के रुप में लिया ।
मैंने फिर उसके उत्साह की आवश्यकता को भी समझ लिया ।
मैंने उससे पूछा कि वो क्या महसूस कर रही थी लेकिन वो कुछ भी बता नहीं पाई । इसके अलावा ऐयर कंडिनशर के कारण उसकी टाँगे भी ठंडी पड़ रहीं थी ।
इसलिये मैंने उससे संबंध में ठंडेपन के बारे में पूछा, और उसे बताया कि जो वह संबंध में चाहती थी, वह उसमें पाये गये उत्साह के विरुद्ध था ।
लेकिन मैं इस बारे में बात करके समय व्यतीत नहीं करना चाहता था । मैंने उससे पूछा कि वो पुल के नीचे कब तक पड़ी रही । वो नहीं जानती थी, इसलिये मैंने उसे अनुमान लगाने के लिये कहा । उसके विचार में एक दिन के लिये ।
स्पष्टत:, उस समय के दौरान वो ठंडी पड़ गई होगी ।
इसलिये, उससे उसके साथ हुई उस कटु घटना के बारे जान कर, मैं यह सुनिश्चित करना चाहता था कि कुछ अलग ही हुआ हो । मैंने उससे पूछा कि क्या मैं उसके पास आ सकता था और क्या वो अपना सिर मेरे कंधे पर रख सकती थी ।
उसने कहा, हाँ, और यही वो चीज थी जिसके लिये वो तड़प रही थी ।
इसलिये, हमने ऐसा ही किया और मैंने उससे साँस लेकर अपने अंदर जो भी गर्मी ले सकती थी लेने के लिये कहा । इसके लिये कुछ समय लगा; कुछ समय के लिये वो ऐसा नहीं कर पाई । लेकिन फिर उसने शुरू किया; उसका साँस जल्दी-जल्दी चलने लगा, शिशुओं की तरह । अंत में वो धीमी पड़ी; मैंने उससे पूछा वो क्या महसूस कर रही थी । उसने कहा, गर्म लेकिन उसकी टाँगें अभी तक ठंडी थी । इसलिये मैंने उन्हे कपड़े से ढक दिया, और हम आगे बढ़ते रहे । उसने बताया कि उसके पेट में से आवाजें आ रही हैं । मैंने उससे उसके अनुभव के बारे में पूछा, उसने कहा कि वो अपना वजन घटाने की कोशिश कर रही थी और उसे भूखे रह पाने की कोशिश में बड़ी मुश्किल हो रही थी ।
स्पष्टत:, यह उसकी भावात्मक सौहार्द की भूख थी । इसलिये मैंने उसके पेट पर हाथ रख कर उस सौहार्द में साँस लेने के लिये कहा ।
हमने यह कुछ अधिक देर के लिये किया और उसे चेतावनी देते हुए मैं पीछे हट गया ।
उसने बताया कि वह बहुत सारी कार्यशालाओं में गई थी पर उसके मुद्दों पर ऐसी प्रतिक्रिया कहीं नहीं मिली थी ।
गेस्टाल्ट की प्रक्रिया अभी और यहाँ का संबंध तथा उसके कार्यक्षेत्र का संदर्भ, तथा उसमें क्या अनुपस्थित है, द्वारा निदेशित है । उसने जिस बारे में भी बात की थी, वो सब एक साथ पता चल गये – मान्यता की आवश्यकता, सौहार्द की इच्छा, उसकी भूख और अधिक खाना, उसका अपने हित को बचा पाना ।
इसलिये मैंने उसको बहुत गहराई से मान्यता प्रदान की जो मैं कर सकता था, ज्यादातर गैर-संवादी, और स्पर्श के स्तर पर; क्योंकि शिशु के साथ संवाद ज्यादातर गैर-संवादी स्पर्शिय स्तर पर ही होता है ।
सुविधाजनक काम इलाज में उपयोगी हो सकता है, लेकिन सबसे गहरा बदलाव संबंध के माधयम से ही आता है । आसामी की संबंधात्मक जरूरतों के अनुकूल बनना एक मुख्य उपाय है, और फिर एक ऐसा तरीका निकालना, जिससे उन आवश्यकताओं की पूर्ति हो, एक बहुत गहरे प्रभाव के रुप में परिलक्षित होता है।
मैंने उससे पूछा कि वह किसके साथ काम करना चाहती थी - उसने बताया कि व्यापार, पिता और प्रेमी । मैंने उसको एक को चुनने के लिये कहा और उसने व्यापार को चुना ।
व्यक्ति कुछ भी चुने वो ठीक है, और वह अपने लक्ष्य के बहुत करीब हो सकता है ।
मैंने उससे पूछा दर-असल मुद्दा क्या था – उसने कहा कि वह आत्मकेन्द्रित है और जो उसे चाहिये उसके पीछे लग जाती है, बिना दूसरों की परवाह किये ।
मैंने व्यापार में इसके सकारात्मक पक्ष को स्वीकार किया और समझ में आया कि कैसे यह दूसरों को अखर सकती है ।
फिर उसने खु्लासा किया कि उसे बहुत इच्छा है कि दूसरों से सम्मान मिले, और ये कि वास्तव में उसे गोद लिया गया था । उसके अपने माता-पिता ने उसको एक पुल के नीचे छोड़ दिया था ।
इसने मेरे लिये चीजों को महत्वपूर्ण ढंग से बदल दिया । ऐसे महत्वपूर्ण और मुश्किल पड़ाव के खुलासे का ये मतलब है कि वो मुझ पर व्यक्तिगत और ह्रदय के अंदर की बातों के लिये भरोसा कर रही है । इसको सिर्फ उसके बारे में कुछ उपयोगी और उपयुक्त सूचना समझने और उसके आत्मकेन्द्रित होने के संदर्भ में लेने के बजाय, मैंने इसे उसकी सम्माम पाने की इच्छा, जो उसने कहा था कि जिसकी उसे जरूरत है, एक गहरी अन्तर्वेदना के रुप में लिया ।
मैंने फिर उसके उत्साह की आवश्यकता को भी समझ लिया ।
मैंने उससे पूछा कि वो क्या महसूस कर रही थी लेकिन वो कुछ भी बता नहीं पाई । इसके अलावा ऐयर कंडिनशर के कारण उसकी टाँगे भी ठंडी पड़ रहीं थी ।
इसलिये मैंने उससे संबंध में ठंडेपन के बारे में पूछा, और उसे बताया कि जो वह संबंध में चाहती थी, वह उसमें पाये गये उत्साह के विरुद्ध था ।
लेकिन मैं इस बारे में बात करके समय व्यतीत नहीं करना चाहता था । मैंने उससे पूछा कि वो पुल के नीचे कब तक पड़ी रही । वो नहीं जानती थी, इसलिये मैंने उसे अनुमान लगाने के लिये कहा । उसके विचार में एक दिन के लिये ।
स्पष्टत:, उस समय के दौरान वो ठंडी पड़ गई होगी ।
इसलिये, उससे उसके साथ हुई उस कटु घटना के बारे जान कर, मैं यह सुनिश्चित करना चाहता था कि कुछ अलग ही हुआ हो । मैंने उससे पूछा कि क्या मैं उसके पास आ सकता था और क्या वो अपना सिर मेरे कंधे पर रख सकती थी ।
उसने कहा, हाँ, और यही वो चीज थी जिसके लिये वो तड़प रही थी ।
इसलिये, हमने ऐसा ही किया और मैंने उससे साँस लेकर अपने अंदर जो भी गर्मी ले सकती थी लेने के लिये कहा । इसके लिये कुछ समय लगा; कुछ समय के लिये वो ऐसा नहीं कर पाई । लेकिन फिर उसने शुरू किया; उसका साँस जल्दी-जल्दी चलने लगा, शिशुओं की तरह । अंत में वो धीमी पड़ी; मैंने उससे पूछा वो क्या महसूस कर रही थी । उसने कहा, गर्म लेकिन उसकी टाँगें अभी तक ठंडी थी । इसलिये मैंने उन्हे कपड़े से ढक दिया, और हम आगे बढ़ते रहे । उसने बताया कि उसके पेट में से आवाजें आ रही हैं । मैंने उससे उसके अनुभव के बारे में पूछा, उसने कहा कि वो अपना वजन घटाने की कोशिश कर रही थी और उसे भूखे रह पाने की कोशिश में बड़ी मुश्किल हो रही थी ।
स्पष्टत:, यह उसकी भावात्मक सौहार्द की भूख थी । इसलिये मैंने उसके पेट पर हाथ रख कर उस सौहार्द में साँस लेने के लिये कहा ।
हमने यह कुछ अधिक देर के लिये किया और उसे चेतावनी देते हुए मैं पीछे हट गया ।
उसने बताया कि वह बहुत सारी कार्यशालाओं में गई थी पर उसके मुद्दों पर ऐसी प्रतिक्रिया कहीं नहीं मिली थी ।
गेस्टाल्ट की प्रक्रिया अभी और यहाँ का संबंध तथा उसके कार्यक्षेत्र का संदर्भ, तथा उसमें क्या अनुपस्थित है, द्वारा निदेशित है । उसने जिस बारे में भी बात की थी, वो सब एक साथ पता चल गये – मान्यता की आवश्यकता, सौहार्द की इच्छा, उसकी भूख और अधिक खाना, उसका अपने हित को बचा पाना ।
इसलिये मैंने उसको बहुत गहराई से मान्यता प्रदान की जो मैं कर सकता था, ज्यादातर गैर-संवादी, और स्पर्श के स्तर पर; क्योंकि शिशु के साथ संवाद ज्यादातर गैर-संवादी स्पर्शिय स्तर पर ही होता है ।
सुविधाजनक काम इलाज में उपयोगी हो सकता है, लेकिन सबसे गहरा बदलाव संबंध के माधयम से ही आता है । आसामी की संबंधात्मक जरूरतों के अनुकूल बनना एक मुख्य उपाय है, और फिर एक ऐसा तरीका निकालना, जिससे उन आवश्यकताओं की पूर्ति हो, एक बहुत गहरे प्रभाव के रुप में परिलक्षित होता है।
शुक्रवार, 18 जुलाई 2014
Case #23 - 23 शराबी पिता
मैरी के अपने पिता को लेकर बहुत सारे मुद्दे थे ।
मैंने पहले उसके साथ जुड़ने के लिये कुछ समय व्यतीत किया । मैं उसे बताता हूँ कि मुझे उसके बारे में क्या अनुभव हुआ – उत्साही, स्पष्ट, और मेरे प्रत्युत्तर में उसमें गर्मजोशी है ।
मैं उससे पूछता हूँ कि मेरे बारे में उसका अनुभव क्या रहा । वो सहज महसूस करती है, सोचती है कि मैं मित्रवत हूँ ।
मैंने उससे उसके पिता के बीच अंतर और समानताएँ बताने के लिये कहा ।
अंतर हैँ : वह उसके पैसा खर्च करने पर आलोचना करते था, वह समय-समय पर बहुत शराब पीते था, और उसे उसके बारे में चिंता होती है, जो वह उनको बताती है ।
समानताएँ थीं : वह उसको बहुत सहयोग देते था और उसे प्रोत्साहन देते था ।
वह बताती है कि उसकी माँ उस पर बहुत भरोसा करती है, उसके पिता के बारे में उससे शिकायत करती है और उसके द्वारा दिये गये कष्टों को उसे बताती है ।
मैंने उससे कहा कि उसके शरीर में जो भावनाएँ थीं, उनको पहचाने । उसे छाती में कुछ अटका हुआ लगता है, पीठ में तनाव महसूस होता है और पेट में कुछ कसाव लगता है । हम कुछ समय व्यतीत करते हैं जबकि वह इनमें साँस लेती है । तब मैं अपने-आप को उसके पिता की तरह पेश करता हूँ, कल्पना करता हूँ कि वो क्या कह सकता है ।
उसके पिता का किरदार करते हुए मैं कहता हूँ :
'मैं चाहता हूँ कि तुम पीछे हटो, जो चुनाव मैंने अपने जीवन में किये था वो मेरा अपना निर्णय है । तुम्हे अपना जीवन स्वयँ ही चलाना है । '
'मैं तुम्हे ये समझाना चाहता हूँ कि तुम्हारी माँ और मैं अपने तरीके से चीजों को सुलझायेंगे । कृपया हमारे संबंध के बारे में चिंता मत करो।'
-'अगर तुम्हारी माँ मेरे बारे में तुमसे शिकायत करती है तो मैं चाहता हूँ कि तुम उस पर धयान न दो और उससे कहो कि तुम इस बारे में सुनना नहीं चाहती हो'
इन वाक्यों के बाद मैं उससे पूछता हूँ कि उसे क्या महसूस होता है, वो बताती है कि उसे राहत महसूस हो रही है ।
अंत में मैं उससे राहत और सहजता की भावना के साथ भरपूर साँस लेने के लिये कहता हूँ ।
वह उसके संबंध में दूसरा मुद्दा उठाना चाहती थी, परन्तु मैंने उसको वहीं रुकने के लिये कहा, और कुछ देर के लिये राहत की भावना के साथ रहने के लिये कहा ।
इस प्रक्रिया में मैंने सीधे तौर पर संबंधात्मक आधार पर शुरूआत की क्योंकि मैं जानता था कि उसका मुद्दा उसका पिता है और मैं चाहता था कि मैं ऐसे तरीके खोजुँ जिसमें कि मैं उसके पिता जैसी स्थिति में हो सकुँ । ऐसा करने से मैं आसानी से जान पाया कि उसके मुद्दे क्या थे, और क्या मैंने भी उनका अनुभव किया है ।
अंतर और समानताएँ हमारे संबंधों को परिभाषित करने में सहायता करते हैं, और मुझे उससे जुदा रखते हैं, लेकिन जुडाव का एक बिंदु भी देते हैं, और हमारे बीच पारस्परिकता स्थापित करने के उपाय भी ।
स्पष्टत:, पारिवारिक व्यवस्था मेरी पर माता-पिता का असर डाल रही थी, और यह हानिकारक है ।
इसलिये, उसके पिता के स्थान की कल्पना करके मैं उसे इस बारे में एक संदेश दे पाया हूँ, जो उसके ऊपर असर कर सकता है । यह एक खुशनुमा पारिवारिक समूह की व्याख्या है ।
जाहिर तौर पर, शराब के साथ भी मुद्दे थे लेकिन हम सबको एक साथ नहीं सुलझा पाते, सबसे स्पष्ट ये बात है कि उसे अपने पिता को बचाना बंद कर देना चाहिये । इसलिये उससे अस्तित्व संबंधी जिम्मेदारी का संदेश उसको रुकने में सहायता कर सकता है, और वो अपनी जरूरतों पर धयान दे सकती है ।
राहत से यह संकेत मिलता है कि हम सही दिशा में जा रहे थे । प्रारम्भ की शारीरिक जाँच
ने यह सुनिश्चित कर दिया था कि मेरे पास आधार था और मैं बदलाब को देख सकता था ।
मैंने पहले उसके साथ जुड़ने के लिये कुछ समय व्यतीत किया । मैं उसे बताता हूँ कि मुझे उसके बारे में क्या अनुभव हुआ – उत्साही, स्पष्ट, और मेरे प्रत्युत्तर में उसमें गर्मजोशी है ।
मैं उससे पूछता हूँ कि मेरे बारे में उसका अनुभव क्या रहा । वो सहज महसूस करती है, सोचती है कि मैं मित्रवत हूँ ।
मैंने उससे उसके पिता के बीच अंतर और समानताएँ बताने के लिये कहा ।
अंतर हैँ : वह उसके पैसा खर्च करने पर आलोचना करते था, वह समय-समय पर बहुत शराब पीते था, और उसे उसके बारे में चिंता होती है, जो वह उनको बताती है ।
समानताएँ थीं : वह उसको बहुत सहयोग देते था और उसे प्रोत्साहन देते था ।
वह बताती है कि उसकी माँ उस पर बहुत भरोसा करती है, उसके पिता के बारे में उससे शिकायत करती है और उसके द्वारा दिये गये कष्टों को उसे बताती है ।
मैंने उससे कहा कि उसके शरीर में जो भावनाएँ थीं, उनको पहचाने । उसे छाती में कुछ अटका हुआ लगता है, पीठ में तनाव महसूस होता है और पेट में कुछ कसाव लगता है । हम कुछ समय व्यतीत करते हैं जबकि वह इनमें साँस लेती है । तब मैं अपने-आप को उसके पिता की तरह पेश करता हूँ, कल्पना करता हूँ कि वो क्या कह सकता है ।
उसके पिता का किरदार करते हुए मैं कहता हूँ :
'मैं चाहता हूँ कि तुम पीछे हटो, जो चुनाव मैंने अपने जीवन में किये था वो मेरा अपना निर्णय है । तुम्हे अपना जीवन स्वयँ ही चलाना है । '
'मैं तुम्हे ये समझाना चाहता हूँ कि तुम्हारी माँ और मैं अपने तरीके से चीजों को सुलझायेंगे । कृपया हमारे संबंध के बारे में चिंता मत करो।'
-'अगर तुम्हारी माँ मेरे बारे में तुमसे शिकायत करती है तो मैं चाहता हूँ कि तुम उस पर धयान न दो और उससे कहो कि तुम इस बारे में सुनना नहीं चाहती हो'
इन वाक्यों के बाद मैं उससे पूछता हूँ कि उसे क्या महसूस होता है, वो बताती है कि उसे राहत महसूस हो रही है ।
अंत में मैं उससे राहत और सहजता की भावना के साथ भरपूर साँस लेने के लिये कहता हूँ ।
वह उसके संबंध में दूसरा मुद्दा उठाना चाहती थी, परन्तु मैंने उसको वहीं रुकने के लिये कहा, और कुछ देर के लिये राहत की भावना के साथ रहने के लिये कहा ।
इस प्रक्रिया में मैंने सीधे तौर पर संबंधात्मक आधार पर शुरूआत की क्योंकि मैं जानता था कि उसका मुद्दा उसका पिता है और मैं चाहता था कि मैं ऐसे तरीके खोजुँ जिसमें कि मैं उसके पिता जैसी स्थिति में हो सकुँ । ऐसा करने से मैं आसानी से जान पाया कि उसके मुद्दे क्या थे, और क्या मैंने भी उनका अनुभव किया है ।
अंतर और समानताएँ हमारे संबंधों को परिभाषित करने में सहायता करते हैं, और मुझे उससे जुदा रखते हैं, लेकिन जुडाव का एक बिंदु भी देते हैं, और हमारे बीच पारस्परिकता स्थापित करने के उपाय भी ।
स्पष्टत:, पारिवारिक व्यवस्था मेरी पर माता-पिता का असर डाल रही थी, और यह हानिकारक है ।
इसलिये, उसके पिता के स्थान की कल्पना करके मैं उसे इस बारे में एक संदेश दे पाया हूँ, जो उसके ऊपर असर कर सकता है । यह एक खुशनुमा पारिवारिक समूह की व्याख्या है ।
जाहिर तौर पर, शराब के साथ भी मुद्दे थे लेकिन हम सबको एक साथ नहीं सुलझा पाते, सबसे स्पष्ट ये बात है कि उसे अपने पिता को बचाना बंद कर देना चाहिये । इसलिये उससे अस्तित्व संबंधी जिम्मेदारी का संदेश उसको रुकने में सहायता कर सकता है, और वो अपनी जरूरतों पर धयान दे सकती है ।
राहत से यह संकेत मिलता है कि हम सही दिशा में जा रहे थे । प्रारम्भ की शारीरिक जाँच
ने यह सुनिश्चित कर दिया था कि मेरे पास आधार था और मैं बदलाब को देख सकता था ।
सोमवार, 14 जुलाई 2014
Case #22 - 22 दरवाजे पर एक भेडिया
मेट्ट एक सफल व्यापारी था । उसने अपना ज्यादातर वयस्क जीवन अपने बारे में जानने में, अधययन करने में, स्वयँ सहायता करना सिखाने वाली पुस्तकें, और अपनी सकारात्मक गति बनाने में व्यतीत किया था । अभी हाल ही में हुए उसके तलाक ने उसके जीवन को एक नये संबंध के कारण नया मोड़ दिया था । उसकी पिछली पत्नी बहुत आलो्चनात्मक थी, विशेषतया उसकी आर्थिक स्थिति और कामकाजी जीवन को लेकर क्योंकि वह अमीर नहीं था । उसने हमेशा उस पर उसकी आर्थिक सफलता को ले कर आघात किया था । वो मेरे पास अपने काम करने के स्थान पर घबराहट का दौरा पड़ने के अनुभव के बाद आया । वह लगभग सारा दिन 'लकवे' से ग्रसित रहा ।
इसका एक कारण उसका अपनी पूर्व पत्नी से सुबह का वार्तालाप लगता था, जो चाहती थी कि वो अपने सुबह के सारे कार्यक्रम रद्द करके उन दोनों के बेटे को लेने आये क्योंकि उसकी कार गैराज में जानी थी । हमेशा की तरह, उसके साथ बात करते हुए वह कटु, इल्जाम लगाने वाली तथा आलोचनात्मक थी ।
जो भी हो, हाल में भी बहुत सारी घटनाएँ हुई थीं – वह एक ठेका, जिसकी उसे उम्मीद थी, प्राप्त नहीं कर पाया था; बहुत सारे खातों में देर से देनदारी हो रही थी; वह अपने पेशे को बनाने में बहुत सी सकारात्मक चीजें कर रहा था, जिसमें से एक किताब लिखना भी था, लेकिन इसमें से किसी ने भी तात्कालिक प्रभाव से फल नहीं दिया; एक पिछला सांझेदार उसके ऊपर केस कर रहा था; और अंत में जब उसने अपने बैंक खाते को देखा तो उसमें केवल 100 डालर ही बचे थे ।
मैंने उससे पूछा कि मुझे यह सब बताते हुए उसे कैसा लग रहा था । वो जो कुछ हो रहा था उसके बारे में अपने विचार बताता रहा, अपने बहुत सी पिछली बातों को दोहरा्ता रहा…लेकिन मैंने उसे बीच में ही रोक उसके अपने शारीरिक अनुभव में बताने के लिये कहा ।
उसने कहा कि पिछली बार जब उसे घबराहट का दौरा पड़ा था तो उसके शरीर को लगा था कि वो एक सीधी जैकेट में है । अब वो कमजोर, डरा हुआ महसूस कर रहा था, विशेषतया छाती में ।
मैंने उसे अपनी भावनाओं पर धयान देने के लिये कहा…उसने गौर किया कि उसे गर्मी लग रही थी, और एक डर की परत थी । उसने कहा कि यह एक विदेशी आक्रमणकारी की तरह था ।
उसने फिर वो उपमा दी जो उसके पिता द्वारा दी जाती थी – दरवाजे पर भेड़िया ।
सामान्यतया, जब उसका आत्मविश्वास ज्यादा होता था तो वह चुनौतियों का सामना कर सकता था । लेकिन इस समय, जब उसके आत्मविश्वास ने उसका साथ छोड़ दिया था तो भेड़िया उस पर काबू पा सकता था ।
मैंने ये सुझाव दिया कि भेड़िया न केवल दरवाजे पर था, वह उसके ऊपर चढ़ कर खड़ा था।
इसलिये मैंने उससे ये कल्पना करने के लिये कहा कि भेड़िया उसके ऊपर चढ़ा हुआ था । उसने कहा 'उसकी थूक मुझ पर गिर रही है' । इसलिये,मैंने उससे कहा कि ऐसा महसूस करे कि जैसे भेड़िये ने उसको नीचे दबोच कर रखा था, और वह भेड़िये का हाँफना सुने और उसकी थूक अपने चेहरे पर गिरती हुई महसूस करे ।
मैंने उससे कहा कि वह भरपूर साँस ले, और डर को अपने सारे शरीर में महसूस करे, और वर्तमान में रहे । मैंने उससे कहा कि वो अपने शरीर में बहुत अधिक मात्रा में शक्ति महसूस करेगा और अगर किसी भी समय यह शक्ति बहुत अधिक हो जाती है, तो वह प्रक्रिया को रोक सकता था ।
उसने वैसा ही किया और उसका शरीर ऐंठन में झटके लेने लगा । कुछ देर बार उसने आँखें खोली और हैरानी से बताया कि उसे अपने शरीर में बहुत सारी शक्ति महसूस हुई थी।
मैंने फिर उसे ये कल्पना करने के लिये कहा कि वह भेड़िया था, मेट्ट के ऊपर चढ़े हुए उसकी थूक गिर रही थी । मैंने उससे मेट्ट से बात करके कुछ संदेश देने के लिये कहा ।
कुछ देर बाद उसने आँखें खोली । उसकी चेतना में अंधकार छा गया था। उसने कहा 'दर-असल यह एक अक्लमंद भेड़िया है' ।
उसको समझ में आया कि उसे एक भेड़ समझा जाता था, और उस स्थिति में, वह कमजोर था, अपना पक्ष नहीं रख पाता था, उस पर काबू किया जा सकता था और उसका आत्मविश्वास कम था । भेड़िया उसका अपना ही त्यागा हुआ हिस्सा था, जो चुनौतियों से लड़ने के लिये शक्ति से भरपूर था, व्यक्तिगत तथा व्यवसायिक रुप से ।
इस प्रक्रिया में मैंने पहचान का प्रयोग किया और विशेषतया उन संकेतों से शुरुआत करके जिन्हे शारीरिक अनुभव ने बताया था । मैंने आक्रमित से संबंध का अनुसरण किया क्योंकि यह स्पष्टत: केवल प्रत्यक्ष धमकी से ज्यादा था, उसको डर के कारण लकवा मार गया था – खतरे का एक बहुत ही नजदीकी अनुभव ।
इसलिये, गेस्टाल्ट के तरीके में, हम सीधे ही खतरे के अनुभव में प्रवेश करते हैं लेकिन पर्याप्त सहायता के साथ । फिर हम उसके दूसरे तरफ के बिंदु की तरफ जाते हैं – खतरनाक होते हुए, विभाजित के उपचार के लिये ।
इसका एक कारण उसका अपनी पूर्व पत्नी से सुबह का वार्तालाप लगता था, जो चाहती थी कि वो अपने सुबह के सारे कार्यक्रम रद्द करके उन दोनों के बेटे को लेने आये क्योंकि उसकी कार गैराज में जानी थी । हमेशा की तरह, उसके साथ बात करते हुए वह कटु, इल्जाम लगाने वाली तथा आलोचनात्मक थी ।
जो भी हो, हाल में भी बहुत सारी घटनाएँ हुई थीं – वह एक ठेका, जिसकी उसे उम्मीद थी, प्राप्त नहीं कर पाया था; बहुत सारे खातों में देर से देनदारी हो रही थी; वह अपने पेशे को बनाने में बहुत सी सकारात्मक चीजें कर रहा था, जिसमें से एक किताब लिखना भी था, लेकिन इसमें से किसी ने भी तात्कालिक प्रभाव से फल नहीं दिया; एक पिछला सांझेदार उसके ऊपर केस कर रहा था; और अंत में जब उसने अपने बैंक खाते को देखा तो उसमें केवल 100 डालर ही बचे थे ।
मैंने उससे पूछा कि मुझे यह सब बताते हुए उसे कैसा लग रहा था । वो जो कुछ हो रहा था उसके बारे में अपने विचार बताता रहा, अपने बहुत सी पिछली बातों को दोहरा्ता रहा…लेकिन मैंने उसे बीच में ही रोक उसके अपने शारीरिक अनुभव में बताने के लिये कहा ।
उसने कहा कि पिछली बार जब उसे घबराहट का दौरा पड़ा था तो उसके शरीर को लगा था कि वो एक सीधी जैकेट में है । अब वो कमजोर, डरा हुआ महसूस कर रहा था, विशेषतया छाती में ।
मैंने उसे अपनी भावनाओं पर धयान देने के लिये कहा…उसने गौर किया कि उसे गर्मी लग रही थी, और एक डर की परत थी । उसने कहा कि यह एक विदेशी आक्रमणकारी की तरह था ।
उसने फिर वो उपमा दी जो उसके पिता द्वारा दी जाती थी – दरवाजे पर भेड़िया ।
सामान्यतया, जब उसका आत्मविश्वास ज्यादा होता था तो वह चुनौतियों का सामना कर सकता था । लेकिन इस समय, जब उसके आत्मविश्वास ने उसका साथ छोड़ दिया था तो भेड़िया उस पर काबू पा सकता था ।
मैंने ये सुझाव दिया कि भेड़िया न केवल दरवाजे पर था, वह उसके ऊपर चढ़ कर खड़ा था।
इसलिये मैंने उससे ये कल्पना करने के लिये कहा कि भेड़िया उसके ऊपर चढ़ा हुआ था । उसने कहा 'उसकी थूक मुझ पर गिर रही है' । इसलिये,मैंने उससे कहा कि ऐसा महसूस करे कि जैसे भेड़िये ने उसको नीचे दबोच कर रखा था, और वह भेड़िये का हाँफना सुने और उसकी थूक अपने चेहरे पर गिरती हुई महसूस करे ।
मैंने उससे कहा कि वह भरपूर साँस ले, और डर को अपने सारे शरीर में महसूस करे, और वर्तमान में रहे । मैंने उससे कहा कि वो अपने शरीर में बहुत अधिक मात्रा में शक्ति महसूस करेगा और अगर किसी भी समय यह शक्ति बहुत अधिक हो जाती है, तो वह प्रक्रिया को रोक सकता था ।
उसने वैसा ही किया और उसका शरीर ऐंठन में झटके लेने लगा । कुछ देर बार उसने आँखें खोली और हैरानी से बताया कि उसे अपने शरीर में बहुत सारी शक्ति महसूस हुई थी।
मैंने फिर उसे ये कल्पना करने के लिये कहा कि वह भेड़िया था, मेट्ट के ऊपर चढ़े हुए उसकी थूक गिर रही थी । मैंने उससे मेट्ट से बात करके कुछ संदेश देने के लिये कहा ।
कुछ देर बाद उसने आँखें खोली । उसकी चेतना में अंधकार छा गया था। उसने कहा 'दर-असल यह एक अक्लमंद भेड़िया है' ।
उसको समझ में आया कि उसे एक भेड़ समझा जाता था, और उस स्थिति में, वह कमजोर था, अपना पक्ष नहीं रख पाता था, उस पर काबू किया जा सकता था और उसका आत्मविश्वास कम था । भेड़िया उसका अपना ही त्यागा हुआ हिस्सा था, जो चुनौतियों से लड़ने के लिये शक्ति से भरपूर था, व्यक्तिगत तथा व्यवसायिक रुप से ।
इस प्रक्रिया में मैंने पहचान का प्रयोग किया और विशेषतया उन संकेतों से शुरुआत करके जिन्हे शारीरिक अनुभव ने बताया था । मैंने आक्रमित से संबंध का अनुसरण किया क्योंकि यह स्पष्टत: केवल प्रत्यक्ष धमकी से ज्यादा था, उसको डर के कारण लकवा मार गया था – खतरे का एक बहुत ही नजदीकी अनुभव ।
इसलिये, गेस्टाल्ट के तरीके में, हम सीधे ही खतरे के अनुभव में प्रवेश करते हैं लेकिन पर्याप्त सहायता के साथ । फिर हम उसके दूसरे तरफ के बिंदु की तरफ जाते हैं – खतरनाक होते हुए, विभाजित के उपचार के लिये ।
शुक्रवार, 11 जुलाई 2014
Case #21 - 21 जंगली औरत

सिंथिया अभी हाल ही में अपने तीसरे पति से अलग हुई थी । वो बीस वर्षों तक एक साथ रहे थे । वह अपने एक सपने पर काम करना चाहती थी ।
मैंने उसे वह वर्तमान में ऐसे बताने का निर्देश दिया कि जैसे कि ये सब हो रहा था, एक-एक करके ।
उसने कहा:
मैं बिस्तर पर सो रही हूँ । वो आता है, मेरा आलिंगन ले कर चूमता है । वो मुझे बताता है कि अभी-अभी उसने एक नया घर सस्ते में खरीदा है जिसमें एक बड़ा सा शेड है । इसमें एक नया बेडरूम एक कमरे के साथ है ।
हम अपने घर की ओर जाते हैं और वहाँ एक लड़का एक लकड़ी का बड़ा सा टुकड़ा ले कर खिड़की के बाहर फेंकता है । अब जाह्न (पति) आता है और उसके फोन की घंटी बजती है । वो कहता है कि उसे अकेले में बात करनी है । मुझे लगता है कि उसकी नई महिला मित्र है ।
मैंने फिर उसको कुछ किरदार निभाने के लिये और हरेक किरदार में अपने बारे में बताने के लिये कहा ।
पहला घर था – उसने कहा, 'मैं नया, चमकदार, अच्छे गुणों वाला, पुराने घर से कहीं बेहतर हूँ । खुशनुमा, बड़ा और विशाल ।'
फिर जाह्न – ' मैं खुश हूँ, घर चाहता हूँ । इसे खरीदना एक चमत्कार है । मैं मजबूत हूँ, मेरा एक उद्देश्य है।'
फिर वो लकड़ी का टुकड़ा जो खिड़की से बाहर फेंका गया था – 'मैं सख्त, मजबूत, शक्तिशाली हूँ । पुराने घर की कोई कीमत नहीं है । मैं केवल यह दिखाना चाहता हूँ कि यह
टूटा हुआ है, बहुत ज्यादा आवाज करता है ।'
फिर लड़का, जो सपने में 13 साल का था – ' मैं शरारती, मजबूत हूँ ।'
फिर नई प्रेमिका – 'मैं आकर्षित हूँ, जिज्ञासु हूँ ।'
इस सबके लिये उसे पढ़ाना पड़ा क्योंकि सिंथिया इस बात को बताना चाहती रही कि हरेक तत्व का मतलब क्या है ।
लेकिन गेस्टाल्ट में हम प्रत्यक्ष अनुभव को देखते हैं न कि पहले से बनी हुई धारणा या संबंध को । इसलिये मैं उसे हरेक तत्व को पहचानने के लिये और अपने अनुभवों को, न कि अपने विचारों को, बताने के लिये पीछे की ओर ले जाता रहा ।
मैंने उससे पूछा कि इन सबसे अलग क्या है – लड़का । चंचल, जो अपने आपे में नहीं है ।
इसलिये, मैं इसको उसके वर्तमान जीवन के साथ जोड़ कर देखता हूँ – ऐसा क्या है जो अपने-आपे में नहीं है ।
सिंथिया ने कहा – सारी रात घर से बाहर रहना, एक बड़ा सा अलाव हो, चाँद की चाँदनी में समुद्र किनारे पार्टी हो और फिर समुद्र किनारे ही सो जायें ।
उसने कहा कि वो जाह्न को लाना चाहेगी लेकिन वो मुझमें एक जंगली औरत देखना पसंद नहीं करता…इसलिये मैंने इसे निरुत्साहित करना सीख लिया…वो एक ऐसी उम्मीद को संभाल नहीं सकता जो उसे एक ही तरीके की लगती है' ।
उसने बताया कि उसने उसे सालों तक अपने साथ राक एण्ड रोल डांस कराने की कोशिश की परन्तु अंत में उसको अपनी कोशिश छोड़नी पड़ी ।
मैंने उससे कहा कि वह खुद को न रोके और स्वयँ ही डाँस कक्षाओं में जाती रहे ।
फिर मैंने उसे जाह्न को कल्पना में कुछ जंगली तरीके से कहने को कहा, ऐसा कुछ जो उसके चरित्र में नहीं है । मैं जाह्न का किरदार निभाऊँगा और वह मुझे यह सीधे तौर पर कह सकती है ।
- वह उसको कहती है कि वो चाहती है कि दोनों नौकरी छोड़ दें, एक नाँव ले लें, और समुद्र में जायें, जहाँ भी लहरें उन्हे ले जायें, वो खाना बनायेगी और दोनों एक-साथ कविताएँ लिखेंगे ।
मैंने उसे अब की बार कुछ बहुत जोर से कहने को कहा, ऐसा कुछ जो थोड़ा चुनौतीपूर्ण हो ।
उसने कहा वो उसके द्वारा दवाइयाँ लेने के कारण थक चुकी है और उसे अपने पिछले वर्ष गँवाने का, और इस बात का इन्तजार करने का कि वो कुछ अलग करे, गुस्सा है । वो और वादों को अब और सहन नहीं करेगी, बस कार्यवाही होनी चाहिये ।
मैंने जो कुछ हुआ था उसे बताया – वह बहुत स्पष्ट थी, स्थिर थी, तथा जाह्न की तरह मेरी गैर-बचाव की मुद्रा में(जिसे वह साधारणतया मुश्किल पाता था), मैंने उसकी स्पष्टवादिता की प्रशंसा की ।
मैंने उसे और मजबूत, कटु, और जंगली होने के लिये कहा ।
उसने अपने बारे में, अपनी सीमाओं के बारे में, कुछ और कहा ।
मैंने उसे फिर बताया कि क्या हुआ था ।
उसने अपने आप को बहुत मजबूत महसूस किया ।
गेस्टाल्ट में हम उन चित्रों की जाँच करते हैं जो उभरते हैं । सपने में यहाँ-वहाँ बहुत से चित्र उभरते हैं, परन्तु हमने उनको चुना जिनमें उसके लिये सबसे अधिक शक्ति थी – कुछ ऐसा करना जो असामान्य हो ।
यह सकारात्मक और नकारात्मक, दोनों ही तरीको से, जंगलीपने, मजबूती और उसका खुद को आगे बढ़ाने में परिवर्तित हुआ ।
मैंने प्रयोग में उसके साथी का किरदार निभा कर भाग लिया, और फिर जो कुछ हुआ उसके बारे में उसे बताया । इसने ये सब उसको स्वाभाविक लगने में मदद की और सुरक्षा की एक ऐसी अनुभूति पैदा की जिससे वो एक नये तरीके से कोशिश कर सके ।
गेस्टाल्ट सहायता द्वारा कुछ नया करने की कोशिश है और उन मुख्य मुद्दों पर ध्यान देना जो जागरूकता में उत्पन्न होते हैं – और इन मुद्दों तक पहुँचने के लिये सपने बहुत अच्छे माधयम हैं ।
रविवार, 6 जुलाई 2014
Case #20 - 20 जमा हुआ ढक्कन
जेन को समूह में बाँटने से गुस्सा आता था । वो काँपती हुई आई । वो विषय-वस्तु के बारे में बात नहीं करना चाहती थी, जो ठीक था । हमने केवल उर्जा के ऊपर काम किया । मैंने उसे अपना अनुभव बताने के लिये कहा । उसने जम जाने के बारे में बात की । मैंने उसे एक लक्षण के बारे में बताने को कहा कि वो क्या महसूस करती है । उसने कहा कि एक जमा हुआ ढक्कन । मैंने उसे शरीर का वो हिस्सा दिखाने के लिये कहा जहाँ पर यह था – पेट के निचले भाग में !
मैंने उससे कहा कि वो ऐसे बोले जैसे वो ढक्कन है "मैं एक जमा हुआ ढक्कन हूँ "। उसने वह किया और बताया कि कैसे उसने कोनों को बंद किया ।
इसलिये मैंने उसे कोने की तरह बोलने के लिये कहा । "मैं एक कोना हूँ…" और फिर उसने कोने के दूसरे पक्ष बताये । मैंने उससे एक हाथ वहाँ रखने के लिये कहा जहाँ जमा हुआ ढक्कन था और दूसरा हाथ वहाँ रखने के लिये कहा जहाँ कोना था (उसके बगल में) । फिर मैंने उसको उन जगहों पर साँस लेने के लिये कहा । इसने उसकी भावनाओं को बढ़ा दिया । उसकी टाँगें काँपने लगी । इसलिये, मैंने उसको प्रोत्साहित किया ।
उसे बहुत उदासी महसूस हुई, वह रोने लगी । वो कुछ बता नहीं पाई । तो मैंने उसे पैरों की अंगुलियों को मोड़ने के लिये कहा । उसे यह बहुत मुश्किल लगा और एक ही पैर कि अन्गुली सकी । थोड़ी देर बाद मेरी सहायता से उसने दूसरे पैर की अंगुलियाँ भी मोड़ लीं । फिर उसने बार-बार डकार लेनी शुरु कर दी । उसने कहा कि उसके साथ यह होता रहता है । शारीरिक रूप से ये एक बहुत अच्छा निकास है, और अभिव्यक्ति की एक शुरुआत है ।
अब ये पक्का था कि उसे अपनी उर्जा बढ़ती हुई लग रही थी, अभी उसके पास शब्द नहीं थे । इसलिये, मैंने उसे शारीरिक निकास के लिये प्रोत्साहित किया और धीरे-धीरे वो अपनी भावनाओं को शब्दों में ढाल पा रही थी । मैंने उसे, ये मान कर कि वह व्यक्ति जिसने उसे चोट पहुँचाई थी वहीं पर है, सीधे तौर पर कहने के लिये कहा ।
यह उसके लिये बहुत सारी पीड़ाओं का अंत था जिसे वो अपने साथ बहुत वर्षों से चुपचाप ले कर चल रही थी । उसे अपनी भावनाओं को लक्षण(ढक्कन, कोना) की तरह व्यक्त करने के लिये कह कर, हम उन लक्षणों पर सीधे-सीधे काम कर सकते थे । उसको उन्हे अपनाने के लिये कह कर उसकी जागरुकता पर ध्यान बढ़ा जो पहले धुंधलाई हुई और उपेक्षित थी – स्वाभाविक रूप से, कोई भी दर्द को महसूस नहीं करना चाहता । अपने शरीर की उर्जा और भावनाओं के साथ रहने में उसकी सहायता करके हमने उसके सोचने की प्रक्रिया को पूरी तरह से उपेक्षित कर दिया और एक स्वाभाविक रूप से उसे खुलने दिया ।
अगर आप शारीरिक प्रक्रिया के साथ रहेंगे तो हमेशा ही ऐसा होगा क्योंकि शरीर हमेशा ठीक होने की दिशा में ही बढ़ता है ।
मैंने उससे कहा कि वो ऐसे बोले जैसे वो ढक्कन है "मैं एक जमा हुआ ढक्कन हूँ "। उसने वह किया और बताया कि कैसे उसने कोनों को बंद किया ।
इसलिये मैंने उसे कोने की तरह बोलने के लिये कहा । "मैं एक कोना हूँ…" और फिर उसने कोने के दूसरे पक्ष बताये । मैंने उससे एक हाथ वहाँ रखने के लिये कहा जहाँ जमा हुआ ढक्कन था और दूसरा हाथ वहाँ रखने के लिये कहा जहाँ कोना था (उसके बगल में) । फिर मैंने उसको उन जगहों पर साँस लेने के लिये कहा । इसने उसकी भावनाओं को बढ़ा दिया । उसकी टाँगें काँपने लगी । इसलिये, मैंने उसको प्रोत्साहित किया ।
उसे बहुत उदासी महसूस हुई, वह रोने लगी । वो कुछ बता नहीं पाई । तो मैंने उसे पैरों की अंगुलियों को मोड़ने के लिये कहा । उसे यह बहुत मुश्किल लगा और एक ही पैर कि अन्गुली सकी । थोड़ी देर बाद मेरी सहायता से उसने दूसरे पैर की अंगुलियाँ भी मोड़ लीं । फिर उसने बार-बार डकार लेनी शुरु कर दी । उसने कहा कि उसके साथ यह होता रहता है । शारीरिक रूप से ये एक बहुत अच्छा निकास है, और अभिव्यक्ति की एक शुरुआत है ।
अब ये पक्का था कि उसे अपनी उर्जा बढ़ती हुई लग रही थी, अभी उसके पास शब्द नहीं थे । इसलिये, मैंने उसे शारीरिक निकास के लिये प्रोत्साहित किया और धीरे-धीरे वो अपनी भावनाओं को शब्दों में ढाल पा रही थी । मैंने उसे, ये मान कर कि वह व्यक्ति जिसने उसे चोट पहुँचाई थी वहीं पर है, सीधे तौर पर कहने के लिये कहा ।
यह उसके लिये बहुत सारी पीड़ाओं का अंत था जिसे वो अपने साथ बहुत वर्षों से चुपचाप ले कर चल रही थी । उसे अपनी भावनाओं को लक्षण(ढक्कन, कोना) की तरह व्यक्त करने के लिये कह कर, हम उन लक्षणों पर सीधे-सीधे काम कर सकते थे । उसको उन्हे अपनाने के लिये कह कर उसकी जागरुकता पर ध्यान बढ़ा जो पहले धुंधलाई हुई और उपेक्षित थी – स्वाभाविक रूप से, कोई भी दर्द को महसूस नहीं करना चाहता । अपने शरीर की उर्जा और भावनाओं के साथ रहने में उसकी सहायता करके हमने उसके सोचने की प्रक्रिया को पूरी तरह से उपेक्षित कर दिया और एक स्वाभाविक रूप से उसे खुलने दिया ।
अगर आप शारीरिक प्रक्रिया के साथ रहेंगे तो हमेशा ही ऐसा होगा क्योंकि शरीर हमेशा ठीक होने की दिशा में ही बढ़ता है ।
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