शनिवार, 16 अगस्त 2014
Case #31 - धनिष्ठता के लिये यौन-ापार
लुई ने कहा कि उसे अपने संबंध में ज्यादा जुनून चाहिये था ।
उसके पति का 5 वर्ष पहले एक प्रेम-प्रसंग था । वह लगभग एक वर्ष तक रहा । उसने उसे स्वीकारा और अपने घुटनों पर बैठ कर माफी माँगी और उस प्रेम-प्रसंग को समाप्त कर दिया ।
उसके बाद से चीजें धीरे-धीरे अच्छी हो रही थीं , लेकिन अभी भी लुई के कुछ मुद्दे बाकी थे ।
जब उसके पति ने उसे पहली बार प्रेम-प्रसंग के बारे में बाताया था तो उसने विवेकशील तरीके से उत्तर दिया, उससे ये पूछ कर कि क्या वह शादी को तोड़ रहा था या नहीं । उसका स्थिति से निपटने का तरीका एकदम से स्थिति को आँकना था, और यह जानना था कि उसका पति और वह कहाँ पर खड़े थे । वह बचाव की एक अच्छी शुरूआती युक्ति थी ।
लेकिन बाद में उसको बहुत उदासी महसूस हुई ।
अभी कुछ दिनों से, उसे बहुत गुस्सा भी आ रहा था ।
लेकिन यह ऐसा कुछ नहीं था जिसको उसने उठाया था । उसके पति ने उससे कहा था कि यदि वह अभी भी गुस्सा थी तो वह उसको छोड़ने के लिये तैयार था (अपने अपराधबोध के कारण) । इसलिये उसे यह डर था कि वह अभी भी उसको छोड़ सकता था यदि वह अपनी भावनाएँ दर्शाती है ।
लेकिन यह बात उसे खाये जा रही थी । और यद्यपि उनके संबंध में बहुत सी अच्छी बातें हैं, वह दोबारा उससे ठीक तरह से खुल नहीं पाई थी, यौन-क्रिया के स्तर को ले कर – उसने कुछ थोड़ा-बहुत छुपा लिया था । मैंने उससे पूछा कि वो यौन-क्रिया कितनी बार करते हैं – महीने में लगभग 4 बार ।
मैंने उससे पूछा कि वो कितनी देर बात करते हैं – औसतन लगभग आधा घंटा प्रतिदिन ।
मैंने उसको अपने पति के बौद्धिक भावुक स्तर का मूल्यांकन करने के लिये कहा । उसने 3 बताया । अब यह मुझे स्पष्ट हो गया था कि उसका पति उसकी बात वैसे नहीं सुनेगा जो इन परिस्थितों में वह उससे चाहती थी । उस पर अपनी भावनाओं को प्रकट करने के लिये काम करने से कोई लाभ नहीं था; यह उसका अपना कुछ गुस्सा बाहर निकाल सकती थी, लेकिन वास्तव में यह उनकी घनिष्ठता को बढ़ा नहीं सकता था क्योंकि उसके पति से उसे कुछ खास मिलने वाला नहीं था। और उसके पति से ये बात किये बिना कि उसके साथ क्या हो रहा था, उनका संबंध कुछ स्तही स्तर पर ही रहेगा ।
गेस्टाल्ट 'क्षमायाचना' पर काम नहीं करता, यद्यपि यह 'क्या है' पर जोर देता है । लेकिन इस मामले में, बहुत से अन्य विकल्प थे जिनके बारे में उसे पता नहीं था । लुई एक अधयापक थी, और उसने बताया कि उसने अपने पढ़ाने की शैली को अभी हाल ही में बदला था जिसमें 'चाहिये और नहीं चाहिये' को छोड़ दिया था, और उसने अपनी कक्षा में एक धीमा और महत्वपूर्ण बदलाव पाया था । इसी के साथ-साथ वह स्वयं को भी खोज रही थी ।
इसलिये, मैं यह जानता था कि उसके पास अपने साधन हैं, और वह स्पष्ट रुप से अपने विकास के ऊपर कार्य कर रही थी । लेकिन इससे वास्तव में यह बात उन दोनों के संबंध के बीच नहीं आई
थी ।
मेरा धयान उन दोनों के संबंध के मुद्दे पर था, बजाय लुई के साथ अंतरात्मिक तौर पर या मेरे साथ पारस्परिक तौर पर भी ।
इसलिये मैने उसे कुछ गृहकार्य करने का सुझाव दिया ।
मूलत: यह एक सौदा था ; धनिष्ठता के लिये अधिक यौन-क्रिया ।
मैंने सुझाव दिया कि वो अपने पति से कहे कि वह ज्यादा यौन-क्रिया चाहती थी, और अधिक नजदीकी चाहती थी । उसे यह सब इसलिये करना था क्योंकि वह ज्यादा धनिष्ठता चाहती थी ।
इसलिये, उसे पाने के लिये वह दोनों रोजाना ½ घंटा साथ में व्यतीत करें जिससे कि उनके संबंध में धनिष्ठता पैदा हो। मैंने उसे बहुत से विकल्प बताये – छोटी-छोटी बातों पर एक दूसरे से विश्वसनीय ढंग से बातचीत करने का अभ्यास करना; एक साथ कोई किताब पढ़ना और उस पर वार्ता करना; किसी व्यायाम का अभ्यास एक साथ करना, जैसे कि सुनना, या भावनओं को जाहिर करना; एक-दूसरे के गुस्से की बात सुनने के लिये एक-दूसरे को मौका देना; या फिर उस समय में कुछ चीजों को एक साथ करना जिससे कि उनकी नजदीकी और आपसी जुड़ाव की भावना बढ़े ।
मैं उससे सहमत था कि यह अनुचित था । वो एक तरीके से अधयापक का किरदार कर रही थी, इसके लिये योजना बना रही थी और उसको अपने तरीके से करने की कोशिश कर रही थी ताकि वह अपना गुस्सा सुरक्षित तरीके से जता सके । यह उचित नहीं था, क्योंकि वह उस तरह से दोगुना कार्य कर रही थी ।
परन्तु, इसके कुछ और अनगिनित गौण फायदे भी होंगें, और इससे वह अपने संबंध में भावुकता लाने के अपने लक्ष्य को भी पा लेगी ।
इसका नतीजा ये होगा कि वह दोनों एक ही पृष्ठभूमि पर होंगें, बजाय इसके कि इससे उसको अपनी व्यक्तिगत जागरुकता ही मिले ।
इस दृष्टिकोण में 'एक जोड़े के संबंध पर एक ही व्यक्ति द्वारा काम करने' का इस्तेमाल किया
गया । अर्थात, जब हम किसी आसामी के साथ काम कर रहे होते हैं तो हम संबंध को सबसे आगे रखते हैं । उनके ऊपर केन्द्रित होने के बजाय, हम यह देखते हैं कि संबंध को कैसे मजबूत करें । बहुत सारी भावनाएँ, पहचान और कहानियाँ एक जोड़े के संबंध का नतीजा हैं । इसलिये, एक ही तरफ बदलाव ला कर हम संबंध में बदलाव ला सकते हैं, बजाय इसके कि हम एक ही व्यक्ति के अनुभव पर केन्द्रित हों । यह एक समुचित दृष्टिकोण को अपनाना है, हिस्सों पर काम करने की बजाय पूरे मुद्दे पर काम करना ।
यह बहुत ही स्वार्थी लगता था कि व्यवहार को बदलने के लिये यौन-क्रिया को इस्तेमाल किया जाये – लेकिन लोग ऐसा बिना जाने ही करते हैं । जो हमने किया है उसकी जिम्मेवारी लेना और संबंधों में सबसे आगे लाना दूसरे व्यक्ति को दर-असल विकल्प दे देता है । उस तरीके से ऐसा प्रस्ताव कोई जोड़-तोड़ नहीं है, लेकिन इसके बजाय एक इमानदार प्रस्ताव है । और इस संदर्भ में किसी चीज के लिये ऐसा लेन-देन जोड़े के संबंध को प्रगाढ़ करेगा ।
उसके पति का 5 वर्ष पहले एक प्रेम-प्रसंग था । वह लगभग एक वर्ष तक रहा । उसने उसे स्वीकारा और अपने घुटनों पर बैठ कर माफी माँगी और उस प्रेम-प्रसंग को समाप्त कर दिया ।
उसके बाद से चीजें धीरे-धीरे अच्छी हो रही थीं , लेकिन अभी भी लुई के कुछ मुद्दे बाकी थे ।
जब उसके पति ने उसे पहली बार प्रेम-प्रसंग के बारे में बाताया था तो उसने विवेकशील तरीके से उत्तर दिया, उससे ये पूछ कर कि क्या वह शादी को तोड़ रहा था या नहीं । उसका स्थिति से निपटने का तरीका एकदम से स्थिति को आँकना था, और यह जानना था कि उसका पति और वह कहाँ पर खड़े थे । वह बचाव की एक अच्छी शुरूआती युक्ति थी ।
लेकिन बाद में उसको बहुत उदासी महसूस हुई ।
अभी कुछ दिनों से, उसे बहुत गुस्सा भी आ रहा था ।
लेकिन यह ऐसा कुछ नहीं था जिसको उसने उठाया था । उसके पति ने उससे कहा था कि यदि वह अभी भी गुस्सा थी तो वह उसको छोड़ने के लिये तैयार था (अपने अपराधबोध के कारण) । इसलिये उसे यह डर था कि वह अभी भी उसको छोड़ सकता था यदि वह अपनी भावनाएँ दर्शाती है ।
लेकिन यह बात उसे खाये जा रही थी । और यद्यपि उनके संबंध में बहुत सी अच्छी बातें हैं, वह दोबारा उससे ठीक तरह से खुल नहीं पाई थी, यौन-क्रिया के स्तर को ले कर – उसने कुछ थोड़ा-बहुत छुपा लिया था । मैंने उससे पूछा कि वो यौन-क्रिया कितनी बार करते हैं – महीने में लगभग 4 बार ।
मैंने उससे पूछा कि वो कितनी देर बात करते हैं – औसतन लगभग आधा घंटा प्रतिदिन ।
मैंने उसको अपने पति के बौद्धिक भावुक स्तर का मूल्यांकन करने के लिये कहा । उसने 3 बताया । अब यह मुझे स्पष्ट हो गया था कि उसका पति उसकी बात वैसे नहीं सुनेगा जो इन परिस्थितों में वह उससे चाहती थी । उस पर अपनी भावनाओं को प्रकट करने के लिये काम करने से कोई लाभ नहीं था; यह उसका अपना कुछ गुस्सा बाहर निकाल सकती थी, लेकिन वास्तव में यह उनकी घनिष्ठता को बढ़ा नहीं सकता था क्योंकि उसके पति से उसे कुछ खास मिलने वाला नहीं था। और उसके पति से ये बात किये बिना कि उसके साथ क्या हो रहा था, उनका संबंध कुछ स्तही स्तर पर ही रहेगा ।
गेस्टाल्ट 'क्षमायाचना' पर काम नहीं करता, यद्यपि यह 'क्या है' पर जोर देता है । लेकिन इस मामले में, बहुत से अन्य विकल्प थे जिनके बारे में उसे पता नहीं था । लुई एक अधयापक थी, और उसने बताया कि उसने अपने पढ़ाने की शैली को अभी हाल ही में बदला था जिसमें 'चाहिये और नहीं चाहिये' को छोड़ दिया था, और उसने अपनी कक्षा में एक धीमा और महत्वपूर्ण बदलाव पाया था । इसी के साथ-साथ वह स्वयं को भी खोज रही थी ।
इसलिये, मैं यह जानता था कि उसके पास अपने साधन हैं, और वह स्पष्ट रुप से अपने विकास के ऊपर कार्य कर रही थी । लेकिन इससे वास्तव में यह बात उन दोनों के संबंध के बीच नहीं आई
थी ।
मेरा धयान उन दोनों के संबंध के मुद्दे पर था, बजाय लुई के साथ अंतरात्मिक तौर पर या मेरे साथ पारस्परिक तौर पर भी ।
इसलिये मैने उसे कुछ गृहकार्य करने का सुझाव दिया ।
मूलत: यह एक सौदा था ; धनिष्ठता के लिये अधिक यौन-क्रिया ।
मैंने सुझाव दिया कि वो अपने पति से कहे कि वह ज्यादा यौन-क्रिया चाहती थी, और अधिक नजदीकी चाहती थी । उसे यह सब इसलिये करना था क्योंकि वह ज्यादा धनिष्ठता चाहती थी ।
इसलिये, उसे पाने के लिये वह दोनों रोजाना ½ घंटा साथ में व्यतीत करें जिससे कि उनके संबंध में धनिष्ठता पैदा हो। मैंने उसे बहुत से विकल्प बताये – छोटी-छोटी बातों पर एक दूसरे से विश्वसनीय ढंग से बातचीत करने का अभ्यास करना; एक साथ कोई किताब पढ़ना और उस पर वार्ता करना; किसी व्यायाम का अभ्यास एक साथ करना, जैसे कि सुनना, या भावनओं को जाहिर करना; एक-दूसरे के गुस्से की बात सुनने के लिये एक-दूसरे को मौका देना; या फिर उस समय में कुछ चीजों को एक साथ करना जिससे कि उनकी नजदीकी और आपसी जुड़ाव की भावना बढ़े ।
मैं उससे सहमत था कि यह अनुचित था । वो एक तरीके से अधयापक का किरदार कर रही थी, इसके लिये योजना बना रही थी और उसको अपने तरीके से करने की कोशिश कर रही थी ताकि वह अपना गुस्सा सुरक्षित तरीके से जता सके । यह उचित नहीं था, क्योंकि वह उस तरह से दोगुना कार्य कर रही थी ।
परन्तु, इसके कुछ और अनगिनित गौण फायदे भी होंगें, और इससे वह अपने संबंध में भावुकता लाने के अपने लक्ष्य को भी पा लेगी ।
इसका नतीजा ये होगा कि वह दोनों एक ही पृष्ठभूमि पर होंगें, बजाय इसके कि इससे उसको अपनी व्यक्तिगत जागरुकता ही मिले ।
इस दृष्टिकोण में 'एक जोड़े के संबंध पर एक ही व्यक्ति द्वारा काम करने' का इस्तेमाल किया
गया । अर्थात, जब हम किसी आसामी के साथ काम कर रहे होते हैं तो हम संबंध को सबसे आगे रखते हैं । उनके ऊपर केन्द्रित होने के बजाय, हम यह देखते हैं कि संबंध को कैसे मजबूत करें । बहुत सारी भावनाएँ, पहचान और कहानियाँ एक जोड़े के संबंध का नतीजा हैं । इसलिये, एक ही तरफ बदलाव ला कर हम संबंध में बदलाव ला सकते हैं, बजाय इसके कि हम एक ही व्यक्ति के अनुभव पर केन्द्रित हों । यह एक समुचित दृष्टिकोण को अपनाना है, हिस्सों पर काम करने की बजाय पूरे मुद्दे पर काम करना ।
यह बहुत ही स्वार्थी लगता था कि व्यवहार को बदलने के लिये यौन-क्रिया को इस्तेमाल किया जाये – लेकिन लोग ऐसा बिना जाने ही करते हैं । जो हमने किया है उसकी जिम्मेवारी लेना और संबंधों में सबसे आगे लाना दूसरे व्यक्ति को दर-असल विकल्प दे देता है । उस तरीके से ऐसा प्रस्ताव कोई जोड़-तोड़ नहीं है, लेकिन इसके बजाय एक इमानदार प्रस्ताव है । और इस संदर्भ में किसी चीज के लिये ऐसा लेन-देन जोड़े के संबंध को प्रगाढ़ करेगा ।
सोमवार, 11 अगस्त 2014
Case #30 - 30 कामुक न ोने का एक अच्छा कारण
ब्रिजिट ने अपनी पीठ के निचले हिस्से में और जननेन्द्रिय क्षेत्र में अकड़न बताई । उसके तलाक को 5 साल हो गये थे और उसके बाद से वह कोई और संबंध नहीं बना पाई थी ।
उसने बताया कि उसके पति ने उसे चोट पहुँचाई थी । उसने कभी यौन-संबंधों में उत्साह नहीं दिखाया था, जब कि उसके पति ने बहुत बार कई तरीकों से भरपूर कोशिश की थी, और ये कि उनके संबंध में कई बहुत अच्छी बातें भी थी ।
मैंने उससे पूछा कि उसने खासतौर पर उसे कैसे चोट पहुँचाई थी, लेकिन वह इसे बता नहीं पाई । उसने कहा कि उसे लगता था कि वह उसकी तरफ नहीं आता है, इसलिये यही वह चीज है जिससे उसको चोट पहुँचती थी ।
लेकिन ऐसा लगता था कि उसके पति ने उसे चोट पहुँचाने के लिये विशेष रूप से कुछ नहीं किया था । इसलिये ये तीर कहीं और ही निशाना लगा रहे थे ।
उसने तब बताया कि वास्तव में उसे अपने शरीर में बने रहने की भावना नहीं रही थी । मैंने भी अपने अलगाव का अनुभव उसे बताया, और यह भी मुझे अपने शरीर में पूर्ण रुप से रहने में मुश्किल होती थी ।
उसने कहा कि उसे शक है कि यह उसके माता-पिता द्वारा उसके भाई को बुरी तरह से पीटने से उत्पन्न हुआ था । उसके बाद उसे तस्करों द्वारा उठा लिया गया था, और वह पांच वर्ष बाद ही उन्हे पत्र लिख पाया था, और वहां से बच पाया था ।
परन्तु, उसके बाद वह गलियों में भिखारियों के साथ घूमता रहता था, चोरी करता था, कई बार जेल गया और जब उसने उसकी सहायता की कोशिश की तो उसने उसके यहाँ भी चोरी की ।
उसने बताया कि 15 साल पहले उसके पिता का देहांत हो गया और तभी से उसका भाई ठीक था, खुश था और एक अच्छा जीवन कर रहा था ।
फिर भी, उसे अभी भी बहुत पीड़ा और अपराधबोध होता था कि वो उसकी पिटाई के लिये कुछ नहीं कर पाई थी ।
मैंने उसे बताया कि उसके पास उस समय कोई सहारा नहीं था – बताने के लिये कोई भी नहीं था, उसे सान्तवना देने के लिये कोई भी नहीं था ।
मैंने यह प्रस्ताव दिया कि, मान लिया जाये कि उसकी पीड़ा अभी भी मौजूद थी, मैं उसके साथ बैठकर अपनी बाजू उसके चारों ओर करता हूं ताकि उसे ये लगे कि जो सहारा उसके पास कभी नहीं था, वह उसके पास है ।
जैसे ही मैंने ये किया, उसने अत्यधिक गहरी पीड़ा से सुबकना शुरू कर दिया । वो हाँफने लगी तो मैंने उसे पकड़ा, और फिर उसने सांस ली । और, वर्तमान में रहते हुए उसने अपने रोने में अत्यधिक पीड़ा को महसूस किया ।
कुछ देर बार उसका रोना बंद हो गया, और वह स्थिर और चुप हो गई । मैंने उससे बात की ।
तब, वह बैठ गई और मेरी तरफ देखा । उसने कहा 'मैं अब तुम्हे कुछ देना चाहती हूँ' । मैंने उसमें एक बदलाव महसूस किया और अपने जोश में भी । मैंने कहा, मैं वह महसूस कर सकता हूँ, मुझे जोशीला महसूस हुआ । उसने बताया कि उसे भी अपने सारे शरीर में जोश महसूस हो रहा था ।
मैंने उससे पूछा कि वो मुझे क्या देना चाहती थी, लेकिन कुछ समय तक उसे कहने के लिये शब्द नहीं मिले । फिर उसने कहा 'मैं तुम्हारी आँखों को अपनी आँखों से चूमना चाहती हूँ' । मैं उसका खुलापन और हम दोनों के बीच उर्जा का प्रवाह महसूस कर पा रहा था । मैंने कहा, अब तुम अपने शरीर में हो, और एक संबंध के लिये तैयार हो । उसने सिर हिलाया ।
मैंने उसकी अपनी पहली भावना(अकड़न महसूस होना) को नहीं लिया, और न ही दूसरी (सामान्य तौर पर उसके शरीर में भावनाओं की कमी) भावना को लिया । मैंने उससे बातचीत की और तब तक इन्तजार किया जब तक कुछ और निकल कर नहीं आया, जो कि उसका पारिवारिक अधूरापन था ।
ऐसे आघात को देखने से उस पर बहुत गहरा प्रभाव पड़ा था, और इसके बावजूद कि उसके भाई ने अंतत: अपने जीवन को फिर से सुधार लिया था, वो अभी भी उसी पीड़ा और अपराधबोध के साथ चल रही थी । वो तब तक आगे नहीं बढ़ पा रही थी जब तक उसके दर्द को महसूस नहीं किया जा सकता था और उसे सहारा नहीं दिया जाता ।
ऐसे अनुभव को दे कर एक बहुत ही मजबूत ठीक होने वाले अनु्भव की शुरूआत हुई, जिससे कि वह तत्काल ही अपनी पीड़ा और अपराधबोध से छुटकारा पा सकी, और अपनी यौन-संबंधी भावनाओं के लिये उपलब्ध हुई ।
शुक्रवार, 8 अगस्त 2014
Case #29 - 29 गुस्से ाली छोटी सी बची को पालना
कैथी अपने पिता से नाराजगी का मुद्दा ले कर आई । मैंने पूछा उसे किस बात का गुस्सा था । उसने बताया कि जब वह 4 वर्ष की थी उसके पिता ने उसकी माँ को तलाक दे दिया था ।
मैंने उसकी पृष्ठभूमि की प्रकृति को परखा । वह बीस साल पहले हुआ था और तब से वह अपने पिता से केवल 20 बार मिली थी । वह उसके बारे में बहुत कम जानती थी ।
उसे लगता था कि उसकी माँ पीड़ित व्यक्ति थी – उसके पिता का प्रेम-प्रसंग था, और फिर उसने दोबारा शादी कर ली थी ।
उसने अपने व्यस्क जीवन में उससे मिलने की कोई कोशिश नहीं की थी । मैंने पूछा क्यों तो उसने जवाब दिया कि पिछली बार जब वह अपनी दूसरी शादी से अपनी बेटी को साथ ले कर आया था तो उसका सौतेली बहन को प्यार करते देख कर मेरी को बहुत जलन महसूस हुई थी ।
मैंने उससे कहा कि मैं उसके माता-पिता के तलाक के मुद्दे पर, या उसके बारे में उसके गुस्से पर, काम नहीं करूँगा (क्योंकि वास्तव में यह उसके मुद्दों का केन्द्रबिंदु नहीं था) । इसके बजाय मैं उसके साथ केवल एक व्यस्क की तरह ही काम करना चाहता था और जानना चाहता कि वर्तमान समय में वह क्या करना चाहती थी ।
वो कुछ हिचकिचा रही थी, लेकिन मेरी सीमाएँ स्पष्ट थीँ ।
मैंने उसको अपने तलाक के बारे में एक कहानी सुनाई, और अपनी सबसे बड़ी बेटी, जब वह बड़ी हो चुकी थी, के साथ हुई बातचीत और जो गल्तफहमियाँ उसने पाल रखी थीं के बारे में बताया ।
मैंने उससे कहा कि मैं उसकी अपने पिता के साथ हुई बातचीत को जानने के लिये तैयार था परन्तु उसके साथ किसी असहाय, पीड़ित या अशक्त भूमिका में रहने के लिये तैयार नहीं था ।
उसे अपनी माँ की कहानियाँ विरासत में मिली थीं और वह उन्ही के रंग में रंगी हुई थी । एक व्यस्क होते हुए वह अपने विकल्पों का इस्तेमाल कर सकती थी और सीधे अपने पिता से उसकी तरफ की बात का पता लगा सकती थी । उसने अभी तक ऐसा नहीं किया था, इसलिये बजाय इसके कि मैं उसके भूतकाल को खोदूँ , मेरा विचार भविष्य की ओर धयान देने का था ।
इसके अलावा, जब हम इसके बारे में बात करते थे तो मेरी की आवाज और हाव-भाव छोटी बच्ची की तरह हो जाते थे । मैंने उससे कहा कि मैं समझता था, और मुझे उस दया आ रही थी, कि उसने अपने पिता का बहुत कुछ खोया था, लेकिन अब वो बीती बात हो चुकी थी और किसी प्रकार की चिकित्सा या अपने पिता के साथ बातचीत उन दिनों को वापिस नहीं ला सकती थी ।
जैसे भी हो, हमें इसी त्रासदी के साथ रहना था और यहीं से उसके लिये उपाय ढूँढना था । यह बहुत मुश्किल था लेकिन कुछ और करने से उसे उसी असहाय स्थिति में ही रहने के लिये ही मदद करते और उकसाते और वह हमेशा उस चीज को पाने की इच्छुक रहती जिसे उसने खो दिया था ।
कभी-कभी समानुभूति दिखाने से लोगों की सहायता हो जाती है परन्तु बाकी समय उन्हे एक स्पष्ट सीमा चाहिये होती है और हमेशा पीछे मुड़ कर देखने के बजाय आगे बढ़ने का रास्ता चाहिये होता है । उसके अंदर की छोटी बच्ची के पास कोई विकल्प नहीं था, अपने पिता की तरफ जाने की हिम्मत नहीं थी ।
उसने बताया कि अगर उसने अपने पिता को बचपन में देखा होता तो उसे किस तरह से मारती । स्पष्ट रूप से वो गुस्सा थी और मैं इसे सामान्य स्तर पर ले कर आया । लेकिन उसके बारे में बताने के लिये उसे कोई और रास्ता नहीं मिला था, वह अभी भी वही छोटी क्रोधी बच्ची थी ।
इसलिये, मैंने एक प्रयोग का सुझाव दिया: कमरे में उस स्थान से शुरू करके, जिसे वह अपनी माँ का स्थान समझती थी, कमरे में दूसरी तरफ अपने पिता की तरफ जाये । शायद अपने पिता के साथ बातचीत करने के लिये या फिर शायद उसके साथ खड़े होने के लिये ।
उसे यह सुझाव बड़ा चुनौतीपूर्ण लगा और वह बहुत डर गई थी । मैंने उसको प्रोत्साहित करने के लिये सब कुछ किया, लेकिन उसे विकल्प भी दिये । मैंने उसे बार-बार याद दिलाया कि वह 24 वर्ष की थी । मैंने उससे छोटी बच्ची की आवाज को त्यागने के लिये कहा, अपनी कमर को झुकाने के बजाय सीधे रखने के लिये कहा (उसने अपनी कमर में लगातार दर्द की शिकायत बताई थी) और उस दशा से व्यस्कता और दूसरे विकल्पों को आजमाने के लिये कहा ।
धीरे-धीरे वह प्रयोग के लिये मान गई । वह एक समय में एक कदम आगे बढ़ी, उसे हर कदम पर सहारे की आवश्यकता होती थी जिससे वह गिर न जाय । अंतत: वह अपने पिता के स्थान पर पहुँची, और मैंने किसी को उसके पिता का किरदार निभाने के लिये कहा ।
उसे अपने पिता से बात करने में बहुत मुश्किल हो रही थी । इसलिये, मैंने उससे पूछा कि वह क्या महसूस कर रही थी, और उसे उन शब्दों में कहे जिनमें वह कह सकती थी । मैंने यह उसकी आधा दर्जन भावनाओं के लिये किया, इसलिये उसके पास कहने के लिये बहुत कुछ था । उसे अपने शब्दों को कहने के लिये और प्रोत्साहन देने की आवश्यकता थी । वास्तव में वह छोटी-छोटी साँस की तेज आवाजें निकाल रही थी, जिन्हे पहचानने पर पता चला कि उनमें उसकी सौतेली बहन की तरफ ध्यान देने पर शिकायतें थीं ।
वह अपने पिता से प्रश्न पूछना चाहती थी, लेकिन मैंने उसे केवल अपनी बात कहने के लिये कहा । मैंने उसे सवालों की चालबाजी के बारे में बताया और उसे उन कारणों पर ले कर आया जिनसे वह अपने पिता के पास जाना चाहती थी ।
अंत में, उसने अपने पिता से बात की । उसे बताया कि वह उससे नाराज, चोट खाई हुई, थी और यह भी कि उसे उसको देख खुशी हुई थी । ज्यादातर उसने अपनी परेशानी के बारे में और अपने डर के बारे में बताया । प्रतिनिधि की प्रतिक्रिया थी कि उसे उस को देख कर खुशी हुई थी; और इसकी उसे उम्मीद नहीं थी ।
सारी प्रक्रिया उसके लिये बहुत मुश्किल थी । मुझे प्रयोग को आसान बनाने के लिये बहुत कुछ करना पड़ा, जैसे कि यह एक चिकित्सा समूह है, वह उसके असली माता-पिता नहीं थे, और वह केवल एक लकड़ी के फर्श पर चल रही थी, इससे ज्यादा कुछ नहीं ।इसने उसकी भावुकता को थोड़ा कम किया । मैं हरेक कदम पर उसके साथ रहा, उसे सिखाते हुए, सहारा देते हुए और उसे अपने व्यस्क रूप में बने रहने के लिये चुनौती देते हुए ।
यह गेस्टाल्ट के 'सुरक्षित आपातकाल' का एक उदाहरण था, जिसमें हम उस सीमा में जाते हैं जो सामान्यतया बहुत मुश्किल होती है, फिर भी जितना भी सहारा दे पायें उससे यह करना आवश्यक
है ।
यह व्यक्ति को एक नया अनुभव लेने देता है ।
परन्तु ऐसे प्रयोग निर्देशात्मक नही होते और आसामियों को नये 'चाहनाओं' में इन्हे इस्तेमाल न करने के लिये प्रोत्साहित किया जाता है, लेकिन इसके बजाय इन्हे जागरूकता लाने और विकल्प खोजने के रूप में देखने के लिये कहा जाता है ।
मैंने उसकी पृष्ठभूमि की प्रकृति को परखा । वह बीस साल पहले हुआ था और तब से वह अपने पिता से केवल 20 बार मिली थी । वह उसके बारे में बहुत कम जानती थी ।
उसे लगता था कि उसकी माँ पीड़ित व्यक्ति थी – उसके पिता का प्रेम-प्रसंग था, और फिर उसने दोबारा शादी कर ली थी ।
उसने अपने व्यस्क जीवन में उससे मिलने की कोई कोशिश नहीं की थी । मैंने पूछा क्यों तो उसने जवाब दिया कि पिछली बार जब वह अपनी दूसरी शादी से अपनी बेटी को साथ ले कर आया था तो उसका सौतेली बहन को प्यार करते देख कर मेरी को बहुत जलन महसूस हुई थी ।
मैंने उससे कहा कि मैं उसके माता-पिता के तलाक के मुद्दे पर, या उसके बारे में उसके गुस्से पर, काम नहीं करूँगा (क्योंकि वास्तव में यह उसके मुद्दों का केन्द्रबिंदु नहीं था) । इसके बजाय मैं उसके साथ केवल एक व्यस्क की तरह ही काम करना चाहता था और जानना चाहता कि वर्तमान समय में वह क्या करना चाहती थी ।
वो कुछ हिचकिचा रही थी, लेकिन मेरी सीमाएँ स्पष्ट थीँ ।
मैंने उसको अपने तलाक के बारे में एक कहानी सुनाई, और अपनी सबसे बड़ी बेटी, जब वह बड़ी हो चुकी थी, के साथ हुई बातचीत और जो गल्तफहमियाँ उसने पाल रखी थीं के बारे में बताया ।
मैंने उससे कहा कि मैं उसकी अपने पिता के साथ हुई बातचीत को जानने के लिये तैयार था परन्तु उसके साथ किसी असहाय, पीड़ित या अशक्त भूमिका में रहने के लिये तैयार नहीं था ।
उसे अपनी माँ की कहानियाँ विरासत में मिली थीं और वह उन्ही के रंग में रंगी हुई थी । एक व्यस्क होते हुए वह अपने विकल्पों का इस्तेमाल कर सकती थी और सीधे अपने पिता से उसकी तरफ की बात का पता लगा सकती थी । उसने अभी तक ऐसा नहीं किया था, इसलिये बजाय इसके कि मैं उसके भूतकाल को खोदूँ , मेरा विचार भविष्य की ओर धयान देने का था ।
इसके अलावा, जब हम इसके बारे में बात करते थे तो मेरी की आवाज और हाव-भाव छोटी बच्ची की तरह हो जाते थे । मैंने उससे कहा कि मैं समझता था, और मुझे उस दया आ रही थी, कि उसने अपने पिता का बहुत कुछ खोया था, लेकिन अब वो बीती बात हो चुकी थी और किसी प्रकार की चिकित्सा या अपने पिता के साथ बातचीत उन दिनों को वापिस नहीं ला सकती थी ।
जैसे भी हो, हमें इसी त्रासदी के साथ रहना था और यहीं से उसके लिये उपाय ढूँढना था । यह बहुत मुश्किल था लेकिन कुछ और करने से उसे उसी असहाय स्थिति में ही रहने के लिये ही मदद करते और उकसाते और वह हमेशा उस चीज को पाने की इच्छुक रहती जिसे उसने खो दिया था ।
कभी-कभी समानुभूति दिखाने से लोगों की सहायता हो जाती है परन्तु बाकी समय उन्हे एक स्पष्ट सीमा चाहिये होती है और हमेशा पीछे मुड़ कर देखने के बजाय आगे बढ़ने का रास्ता चाहिये होता है । उसके अंदर की छोटी बच्ची के पास कोई विकल्प नहीं था, अपने पिता की तरफ जाने की हिम्मत नहीं थी ।
उसने बताया कि अगर उसने अपने पिता को बचपन में देखा होता तो उसे किस तरह से मारती । स्पष्ट रूप से वो गुस्सा थी और मैं इसे सामान्य स्तर पर ले कर आया । लेकिन उसके बारे में बताने के लिये उसे कोई और रास्ता नहीं मिला था, वह अभी भी वही छोटी क्रोधी बच्ची थी ।
इसलिये, मैंने एक प्रयोग का सुझाव दिया: कमरे में उस स्थान से शुरू करके, जिसे वह अपनी माँ का स्थान समझती थी, कमरे में दूसरी तरफ अपने पिता की तरफ जाये । शायद अपने पिता के साथ बातचीत करने के लिये या फिर शायद उसके साथ खड़े होने के लिये ।
उसे यह सुझाव बड़ा चुनौतीपूर्ण लगा और वह बहुत डर गई थी । मैंने उसको प्रोत्साहित करने के लिये सब कुछ किया, लेकिन उसे विकल्प भी दिये । मैंने उसे बार-बार याद दिलाया कि वह 24 वर्ष की थी । मैंने उससे छोटी बच्ची की आवाज को त्यागने के लिये कहा, अपनी कमर को झुकाने के बजाय सीधे रखने के लिये कहा (उसने अपनी कमर में लगातार दर्द की शिकायत बताई थी) और उस दशा से व्यस्कता और दूसरे विकल्पों को आजमाने के लिये कहा ।
धीरे-धीरे वह प्रयोग के लिये मान गई । वह एक समय में एक कदम आगे बढ़ी, उसे हर कदम पर सहारे की आवश्यकता होती थी जिससे वह गिर न जाय । अंतत: वह अपने पिता के स्थान पर पहुँची, और मैंने किसी को उसके पिता का किरदार निभाने के लिये कहा ।
उसे अपने पिता से बात करने में बहुत मुश्किल हो रही थी । इसलिये, मैंने उससे पूछा कि वह क्या महसूस कर रही थी, और उसे उन शब्दों में कहे जिनमें वह कह सकती थी । मैंने यह उसकी आधा दर्जन भावनाओं के लिये किया, इसलिये उसके पास कहने के लिये बहुत कुछ था । उसे अपने शब्दों को कहने के लिये और प्रोत्साहन देने की आवश्यकता थी । वास्तव में वह छोटी-छोटी साँस की तेज आवाजें निकाल रही थी, जिन्हे पहचानने पर पता चला कि उनमें उसकी सौतेली बहन की तरफ ध्यान देने पर शिकायतें थीं ।
वह अपने पिता से प्रश्न पूछना चाहती थी, लेकिन मैंने उसे केवल अपनी बात कहने के लिये कहा । मैंने उसे सवालों की चालबाजी के बारे में बताया और उसे उन कारणों पर ले कर आया जिनसे वह अपने पिता के पास जाना चाहती थी ।
अंत में, उसने अपने पिता से बात की । उसे बताया कि वह उससे नाराज, चोट खाई हुई, थी और यह भी कि उसे उसको देख खुशी हुई थी । ज्यादातर उसने अपनी परेशानी के बारे में और अपने डर के बारे में बताया । प्रतिनिधि की प्रतिक्रिया थी कि उसे उस को देख कर खुशी हुई थी; और इसकी उसे उम्मीद नहीं थी ।
सारी प्रक्रिया उसके लिये बहुत मुश्किल थी । मुझे प्रयोग को आसान बनाने के लिये बहुत कुछ करना पड़ा, जैसे कि यह एक चिकित्सा समूह है, वह उसके असली माता-पिता नहीं थे, और वह केवल एक लकड़ी के फर्श पर चल रही थी, इससे ज्यादा कुछ नहीं ।इसने उसकी भावुकता को थोड़ा कम किया । मैं हरेक कदम पर उसके साथ रहा, उसे सिखाते हुए, सहारा देते हुए और उसे अपने व्यस्क रूप में बने रहने के लिये चुनौती देते हुए ।
यह गेस्टाल्ट के 'सुरक्षित आपातकाल' का एक उदाहरण था, जिसमें हम उस सीमा में जाते हैं जो सामान्यतया बहुत मुश्किल होती है, फिर भी जितना भी सहारा दे पायें उससे यह करना आवश्यक
है ।
यह व्यक्ति को एक नया अनुभव लेने देता है ।
परन्तु ऐसे प्रयोग निर्देशात्मक नही होते और आसामियों को नये 'चाहनाओं' में इन्हे इस्तेमाल न करने के लिये प्रोत्साहित किया जाता है, लेकिन इसके बजाय इन्हे जागरूकता लाने और विकल्प खोजने के रूप में देखने के लिये कहा जाता है ।
बुधवार, 6 अगस्त 2014
Case #28 - 28 बोलने वाली पैंट
नैन्सी ने बहुत सारे मुद्दे बताये । उसे लगता था कि विश्वसनीयता और उसके व्यवहार में एक अंतर था। पहली शादी से उसके एक बच्चा था; उस संबंध में बहुत ही कम वास्तविकता थी, क्योंकि वह कभी-कभी ही साथ रहते थे ।
उसने अपनी दूसरी शादी के बारे में बात की, बहुत से गर्भपात करवाये, तब उसका पति दूसरा बच्चा चाहता था लेकिन वास्तव में वो नहीं चाहती थी । उसने बताया कि वह अपने दूसरे पति के साथ बहुत खुश थी, लेकिन कभी-कभी कार्यशालाओं में अपनी हाजिरी उससे छुपाती थी । उसने बताया कि वह शारीरिक रूप से मजबूत नहीं थी और उस अवस्था को बदलना चाहती थी ।
मैंने बताया कि एक मुद्दा दूसरे मुद्दे की तरफ ले जाता है, और इसलिये किसी भी मुद्दे पर गहराई से केन्द्रित होने में मुश्किल होती है । दर-असल, उसने कहा कि अन्य चिकित्सकों को उस पर भरोसा करने में मुश्किल हुई थी ।
मैंने उससे पूछा कि वो मुझसे क्या चाहती थी । उंसने उत्तर दिया कि वो बचना चाहती थी । मैंने उसे बताया कि मुझमें कुछ ऐसा है जिससे उसे बचा कर मुझे खुशी होगी, लेकिन मैं अभी तक ठीक से कर नहीं पा रहा था; तथा दूसरी तरफ मुझमे कुछ ऐसा भी था जो उसे सशक्त बनाना चाहता था, लेकिन वह भी ठीक तरह से नहीं हो पा रहा था ।
सत्र की शुरूआत में मैंने उसकी पैंट देखी – एक रंगबिरंगी और जटिल नमूने की । मैंने उसे कई बार देखा । मैंने उसका मुँह भी देखा । उस पर बहुत तरह के भाव थे, और वो कभी-कभी अपने होंठ भी चबाती थी, या फिर अपने दाँत एक खास तरीके से दिखाती थी । मैंने उन दोनों चीजों पर टिप्पणी की । उसे अपने मुँह के बारे में कुछ पता नहीं था, और अपनी पैंट में उसे कोई रुचि नहीँ थी । कुछ और बातचीत के बाद, मैं दोबारा उसकी पैंट पर गया, और सुझाव दिया कि शायद पैंट हमारी सहायता करे कि हमें किन मुद्दों पर काम करना था ।
मैंने उससे पूछा कि इन चीजों का कौन सा पहलू वो वास्तव में पसन्द करती थी । उसने अपने टखने के आसपास एक छोटा सा हिस्सा दिखाया और तीन रंगों की तरफ इशारा करते हुए बताया कि वह गर्म और ठंडे भाव के थे ।
इसलिये, मैंने उससे कहा कि वह हरेक रंग बन कर अपने बारे में बताये । उसने अपने आप को एक गर्म, हंसमुख, उत्साही और चमकीला व्यक्ति बताया । फिर स्वयं को एक शांत, विचारशील व्यक्ति बताया जो अकेला रहना पसन्द करता था । फिर उसने स्वयँ को एक भावहीन, स्वार्थी, विवेकशील व्यक्ति बताया ।
मैंने सबके बारे में एक-एक करके अपनी प्रतिक्रिया बताई । जब मैं आखिरी वाले भाग पर पहुँचा, तो वो एकदम से प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुए पहले ही बोली कि यह वाला भाग ठीक नहीं था, और इसके लिये उसने अपने-आप को ही दोषी ठहराया । इससे यह पता चला कि बहुत कुछ चाहती थी जिससे कि वो वाला भाग गल्त हो गया था । मैंने उससे पूछा कि वो कहाँ से आये थे – उसकी माँ से । इसलिये, हमने उसकी माँ के लिये एक तकिया लगाया, और उसने अपनी माँ से बात की, अपना संबंध बताया, लेकिन अपनी चाहने वाली सूची की सीमाएँ भी बताईँ ।
फिर उसकी पहले वाली सास थी, जो कुछ मायनों में 'आदर्श' थी, लेकिन वह उससे बहुत कुछ चाहती थी । मैंने उसको कहा कि वो अपनी सास को तकिये के ऊपर रखे, और फिर दोबारा उसने अपना संबंध बताया, लेकिन अपनी सीमाएँ भी ।
मैं हर बार उसके भावहीन/स्वार्थी भाग की तरफ आता था, उसे प्रमाणित करने की कोशिश में । हर बार वह उसे त्यागना शुरू कर देती थी । मैं उससे पूछता था कि क्या वह अपनी चाहना को स्वयं पर काबू करने देना चाहती थी, और वह उत्तर देती थी 'नहीं' ।
अंत में, जब मैंने उसे अपनी स्वार्थपरता के बारे में बताया, तो उसने मुझे सुनना शुरू कर दिया । मैंने उससे कहा कि अगर मैं अपने काम वाले/व्यापारिक रूप में था, या मैं बहुत ही स्थिर महसूस कर रहा था, तो मैं सहज रूप से उसके इस भाग के साथ हो सकता था । या, फिर मैं भी अपने भावहीन/स्वार्थी रुप में था तो मैं भी इसके साथ ठीक ही रहूँगा । लेकिन अगर मैं खुद को कमजोर या जरूरतमंद महसूस कर रहा था, तो मुझे इससे चोट पहुँच सकती थी ।
वो मुझे बिना किसी सहमति के सुन पा रही थी, और मेरी जानकारी में उसे जज्ब कर रही थी ।
उसने कहा 'लेकिन यह वह हिस्सा है जिसे मैं बदलना चाहती हूँ, क्योंकि मैं लोगों को चोट पहुँचा सकती हूँ' । मैंने उत्तर दिया 'मुझे इसमें ज्यादा रुचि है कि तुम ये मान लो कि वास्तव में यह तुम्हारा ही एक हिस्सा है, जब तुम उस स्थान पर होती हो – और यह मुझे तुम्हारे बारे में सुरक्षा की भावना देता है' ।
वो समझ गई थी कि इस भाग से छुटकारा पाना, या इसमें सुधार लाना, संभव नहीं था, बस उसके अस्तित्व को केवल मानना था ।
इस सत्र को शुरू करने में बहुत मुश्किल हुई थी । हर बार जब वो स्पष्ट रुप से शुरुआत करती थी, तो उसका ध्यान बदल जाता था । यह अपने-आप में ही धयान देने योग्य था – उसका ध्यान बदलना । मैंने उस पर धयान नहीं दिया, क्योंकि हमारे बीच समुचित संबंध नहीं था । मैंने थोड़ा बचाने की संभावना वाला किरदार निभाया, लेकिन उस रास्ते पर आगे न बढ़ने का निर्णय लिया, क्योंकि उस पर पकड़ नहीं बन पा रही थी । इसलिये, स्पष्ट विषय-वस्तु ढूँढने के लिये चूहा और बिल्ली का खेल खेलने के बजाय मैं उस वस्तु पर लौट आया जो मेरे लिये दृष्टा थी – पैंट । ये तथ्य कि उसके लिये वह कोई महत्व नहीं रखता था,हम उसमें से कुछ ऐसा ढूँढ सकते थे जो उजागर हो, उसके किसी भी आकृति के बारे में बताने के विरोध के बावजूद । सीधे-सीधे उसने अपने तीन महत्वपूर्ण हिस्सों का नाम लिया ।
फिर मैंने उनकी संबंधों के परिप्रेक्ष्य में जाँच की – हरेक के बारे में अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त की ।
उसका विरोध तीसरे भाग के बारे में उभर कर आया और उसने स्पष्टत: उस काम की ओर इशारा किया जो करना था : उसकी चाहनाओं और उनके कारणों से निपटना ।
ये करने के बाद, वो अपने उस भाग को मेरे साथ अपने संबंध में और अपने साथ स्वयँ के संबंध में ला सकी ।
इसका नतीजा वही था जिसके पीछे हम गेस्टाल्ट प्रक्रिया में है : एकीकरण
उसने अपनी दूसरी शादी के बारे में बात की, बहुत से गर्भपात करवाये, तब उसका पति दूसरा बच्चा चाहता था लेकिन वास्तव में वो नहीं चाहती थी । उसने बताया कि वह अपने दूसरे पति के साथ बहुत खुश थी, लेकिन कभी-कभी कार्यशालाओं में अपनी हाजिरी उससे छुपाती थी । उसने बताया कि वह शारीरिक रूप से मजबूत नहीं थी और उस अवस्था को बदलना चाहती थी ।
मैंने बताया कि एक मुद्दा दूसरे मुद्दे की तरफ ले जाता है, और इसलिये किसी भी मुद्दे पर गहराई से केन्द्रित होने में मुश्किल होती है । दर-असल, उसने कहा कि अन्य चिकित्सकों को उस पर भरोसा करने में मुश्किल हुई थी ।
मैंने उससे पूछा कि वो मुझसे क्या चाहती थी । उंसने उत्तर दिया कि वो बचना चाहती थी । मैंने उसे बताया कि मुझमें कुछ ऐसा है जिससे उसे बचा कर मुझे खुशी होगी, लेकिन मैं अभी तक ठीक से कर नहीं पा रहा था; तथा दूसरी तरफ मुझमे कुछ ऐसा भी था जो उसे सशक्त बनाना चाहता था, लेकिन वह भी ठीक तरह से नहीं हो पा रहा था ।
सत्र की शुरूआत में मैंने उसकी पैंट देखी – एक रंगबिरंगी और जटिल नमूने की । मैंने उसे कई बार देखा । मैंने उसका मुँह भी देखा । उस पर बहुत तरह के भाव थे, और वो कभी-कभी अपने होंठ भी चबाती थी, या फिर अपने दाँत एक खास तरीके से दिखाती थी । मैंने उन दोनों चीजों पर टिप्पणी की । उसे अपने मुँह के बारे में कुछ पता नहीं था, और अपनी पैंट में उसे कोई रुचि नहीँ थी । कुछ और बातचीत के बाद, मैं दोबारा उसकी पैंट पर गया, और सुझाव दिया कि शायद पैंट हमारी सहायता करे कि हमें किन मुद्दों पर काम करना था ।
मैंने उससे पूछा कि इन चीजों का कौन सा पहलू वो वास्तव में पसन्द करती थी । उसने अपने टखने के आसपास एक छोटा सा हिस्सा दिखाया और तीन रंगों की तरफ इशारा करते हुए बताया कि वह गर्म और ठंडे भाव के थे ।
इसलिये, मैंने उससे कहा कि वह हरेक रंग बन कर अपने बारे में बताये । उसने अपने आप को एक गर्म, हंसमुख, उत्साही और चमकीला व्यक्ति बताया । फिर स्वयं को एक शांत, विचारशील व्यक्ति बताया जो अकेला रहना पसन्द करता था । फिर उसने स्वयँ को एक भावहीन, स्वार्थी, विवेकशील व्यक्ति बताया ।
मैंने सबके बारे में एक-एक करके अपनी प्रतिक्रिया बताई । जब मैं आखिरी वाले भाग पर पहुँचा, तो वो एकदम से प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुए पहले ही बोली कि यह वाला भाग ठीक नहीं था, और इसके लिये उसने अपने-आप को ही दोषी ठहराया । इससे यह पता चला कि बहुत कुछ चाहती थी जिससे कि वो वाला भाग गल्त हो गया था । मैंने उससे पूछा कि वो कहाँ से आये थे – उसकी माँ से । इसलिये, हमने उसकी माँ के लिये एक तकिया लगाया, और उसने अपनी माँ से बात की, अपना संबंध बताया, लेकिन अपनी चाहने वाली सूची की सीमाएँ भी बताईँ ।
फिर उसकी पहले वाली सास थी, जो कुछ मायनों में 'आदर्श' थी, लेकिन वह उससे बहुत कुछ चाहती थी । मैंने उसको कहा कि वो अपनी सास को तकिये के ऊपर रखे, और फिर दोबारा उसने अपना संबंध बताया, लेकिन अपनी सीमाएँ भी ।
मैं हर बार उसके भावहीन/स्वार्थी भाग की तरफ आता था, उसे प्रमाणित करने की कोशिश में । हर बार वह उसे त्यागना शुरू कर देती थी । मैं उससे पूछता था कि क्या वह अपनी चाहना को स्वयं पर काबू करने देना चाहती थी, और वह उत्तर देती थी 'नहीं' ।
अंत में, जब मैंने उसे अपनी स्वार्थपरता के बारे में बताया, तो उसने मुझे सुनना शुरू कर दिया । मैंने उससे कहा कि अगर मैं अपने काम वाले/व्यापारिक रूप में था, या मैं बहुत ही स्थिर महसूस कर रहा था, तो मैं सहज रूप से उसके इस भाग के साथ हो सकता था । या, फिर मैं भी अपने भावहीन/स्वार्थी रुप में था तो मैं भी इसके साथ ठीक ही रहूँगा । लेकिन अगर मैं खुद को कमजोर या जरूरतमंद महसूस कर रहा था, तो मुझे इससे चोट पहुँच सकती थी ।
वो मुझे बिना किसी सहमति के सुन पा रही थी, और मेरी जानकारी में उसे जज्ब कर रही थी ।
उसने कहा 'लेकिन यह वह हिस्सा है जिसे मैं बदलना चाहती हूँ, क्योंकि मैं लोगों को चोट पहुँचा सकती हूँ' । मैंने उत्तर दिया 'मुझे इसमें ज्यादा रुचि है कि तुम ये मान लो कि वास्तव में यह तुम्हारा ही एक हिस्सा है, जब तुम उस स्थान पर होती हो – और यह मुझे तुम्हारे बारे में सुरक्षा की भावना देता है' ।
वो समझ गई थी कि इस भाग से छुटकारा पाना, या इसमें सुधार लाना, संभव नहीं था, बस उसके अस्तित्व को केवल मानना था ।
इस सत्र को शुरू करने में बहुत मुश्किल हुई थी । हर बार जब वो स्पष्ट रुप से शुरुआत करती थी, तो उसका ध्यान बदल जाता था । यह अपने-आप में ही धयान देने योग्य था – उसका ध्यान बदलना । मैंने उस पर धयान नहीं दिया, क्योंकि हमारे बीच समुचित संबंध नहीं था । मैंने थोड़ा बचाने की संभावना वाला किरदार निभाया, लेकिन उस रास्ते पर आगे न बढ़ने का निर्णय लिया, क्योंकि उस पर पकड़ नहीं बन पा रही थी । इसलिये, स्पष्ट विषय-वस्तु ढूँढने के लिये चूहा और बिल्ली का खेल खेलने के बजाय मैं उस वस्तु पर लौट आया जो मेरे लिये दृष्टा थी – पैंट । ये तथ्य कि उसके लिये वह कोई महत्व नहीं रखता था,हम उसमें से कुछ ऐसा ढूँढ सकते थे जो उजागर हो, उसके किसी भी आकृति के बारे में बताने के विरोध के बावजूद । सीधे-सीधे उसने अपने तीन महत्वपूर्ण हिस्सों का नाम लिया ।
फिर मैंने उनकी संबंधों के परिप्रेक्ष्य में जाँच की – हरेक के बारे में अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त की ।
उसका विरोध तीसरे भाग के बारे में उभर कर आया और उसने स्पष्टत: उस काम की ओर इशारा किया जो करना था : उसकी चाहनाओं और उनके कारणों से निपटना ।
ये करने के बाद, वो अपने उस भाग को मेरे साथ अपने संबंध में और अपने साथ स्वयँ के संबंध में ला सकी ।
इसका नतीजा वही था जिसके पीछे हम गेस्टाल्ट प्रक्रिया में है : एकीकरण
शनिवार, 2 अगस्त 2014
Case #27 - 27 नैतिक शुद्धता
जाह्न एक छोटी सी कंपनी चलाता था । उसकी चिंता यह थी कि वह नैतिक रूप से बहुत ही ईमानदार व्यक्ति था । बाजार में, जहाँ कुछ भी चलता है, उसके बड़े पक्के नियम थे और वह उन पर कायम रहता था । वह अपने परिवार के साथ भी ऐसा ही था – अपने कर्तव्यों को गंभीरता से लेता था, अपने माता-पिता की इज्जत करता था और परम्परा पर चलता था ।
फिर भी उसे भारी-भारी और दबाव सा लगता था और वह अपने से प्रश्न करता था कि शायद नैतिक शुद्धता अच्छी चीज नहीं थी, या फिर वास्तव में उसका व्यापार बैठ सकता था क्योंकि वह वैसी बेईमान तरकीबें नहीं अपनाना चाहता था जो उसके प्रतिस्पर्धी अपनाते थे (जैसे कि उद्योग संबंधी जासूसी) । मैंने पहले उन तरीकों के गुण पहचानने चाहे जिन तरीकों से वह इस संसार में रहना चाहता था, लेकिन उस पर कोई असर नहीं पड़ा । उसको यह चिंता थी कि वास्तविक संसार में इससे उसको कुछ नहीं मिलेगा लेकिन साथ ही साथ वह अपने सख्त नैतिक ढांचे पर कायम रहना चाहता था ।
इसलिये मैंने उसे दो विरोधी चीजें बताने के लिये कहा – इतिहास में से ऐसा किरदार जो नैतिक रूप से ईमानदार आदमी को दर्शाता था और फिर कोई ऐसा किरदार जिसके लिये 'सब चलता है' ।
उसने दो को चुना और मैंने उससे कहा कि वह बारी-बारी उनका स्थान ले और उनसे संवाद करे । उसे यह बहुत ही मुश्किल लगा और बार-बार किरदार से बाहर आना चाहता रहा । उसने पूछा 'क्या मैं दोनों को एक कर सकता हूँ ?' लेकिन एकीकरण इतनी आसानी से नहीं होता ।
जब वह अपने ईमानदार किरदार को निभा रहा था तो उसने बताया कि वह चीनी होने की गहरी और लम्बी परम्परा का अनुसरण कर रहा था जबकि दूसरे किरदार में वह उन मूल्यों के साथ समझौता कर रहा था । इसलिये यह स्पष्ट था कि परम्परा को मानने में उसके महत्व की सीमा चीनी सभ्यता का गहन सदाचार मूल्य थे ।
इसलिये, मैंने ये सुझाव दिया कि वह दोनों किरदारों से बाहर आये और अपनी सीट पर बैठ कर दोनों किरदारों से बात करे । उसने परम्परा को स्वीकार किया और फिर यह भी स्वीकार किया कि शायद वह दूसरे पक्ष से कुछ काम का सीख सके ।
यह उसके लिये बहुत बड़ा कदम था ।
मैंने उसे यह सुझाव दिया कि वह एक सम्राट के समान है जिसके एक के बजाय दो सलाहकार थे पर अंतिम निर्णय उसका अपना था ।यह सुनकर उसने काफी अच्छा महसूस किया और अपने नये 'सलाहकार' की कीमत को जान पाया ।
उसने बताया कि उसके व्यक्तिगत जीवन में इसका एक पहलू था, जहाँ वो चीजों को इतनी गंभीरता से लिया कि उसे कभी यह महसूस नहीं हुआ कि उसे कभी छुट्टी मिली थी ।
इसलिये हमने दो और सलाहकार बनाये, एक वह जो उसे उसकी जिम्मेदारियों की याद दिलाये और दूसरा वह जो धृष्ट, गैर-जिम्मेदार और मस्ती करने वाला हो ।
एक बार फिर उसने दो सलाहकार पा कर राहत महसूस की लेकिन अंतिम निर्णय लेने के लिये वही सक्षम था । मैंने उसे मस्ती करने वाले किरदार में एक वास्तविक व्यक्ति के बारे में बताने के लिये कहा। उसने अपने चचेरे भाई के बारे में बताया । पिछली बार उसने अपने चचेरे भाई को नकारात्मक रूप में देखा था, अब वह उसे प्रशंसनीय रूप में देख सकता था, और उसके साथ समय व्यतीत करने के बारे में भी सोच सकता था ।
हमने गेस्टाल्ट के दिशानिर्देश, जो यह मानते हैं कि हरेक गुण के लिये एक विपरीत गुण भी होता है, विरोधाभासों के लिये प्रयोग किये । किसी एक ही पक्ष के साथ चलने से आदमी बंट जाता है । गेस्टाल्ट की दिशा एकीकरण की ओर है, जो एक वास्तविक प्रक्रिया से होनी चाहिये जिसमें दोनों पक्षों के साथ सम्पर्क हो, बजाये इसके कि इसे बौद्धिक तरीके से समझाया जाये ।
उसके लिये प्रयोग का प्रचलित तरीका सहज नहीं था (सीधा संवाद), इसलिये आसामी की स्वेच्छा से और उसकी जानकारी देने पर हमें हमेशा ही उसी स्थान पर प्रयोग को बदलने के लिये लचीले रूप से तैयार रहने की आवश्यकता है ।
फिर भी उसे भारी-भारी और दबाव सा लगता था और वह अपने से प्रश्न करता था कि शायद नैतिक शुद्धता अच्छी चीज नहीं थी, या फिर वास्तव में उसका व्यापार बैठ सकता था क्योंकि वह वैसी बेईमान तरकीबें नहीं अपनाना चाहता था जो उसके प्रतिस्पर्धी अपनाते थे (जैसे कि उद्योग संबंधी जासूसी) । मैंने पहले उन तरीकों के गुण पहचानने चाहे जिन तरीकों से वह इस संसार में रहना चाहता था, लेकिन उस पर कोई असर नहीं पड़ा । उसको यह चिंता थी कि वास्तविक संसार में इससे उसको कुछ नहीं मिलेगा लेकिन साथ ही साथ वह अपने सख्त नैतिक ढांचे पर कायम रहना चाहता था ।
इसलिये मैंने उसे दो विरोधी चीजें बताने के लिये कहा – इतिहास में से ऐसा किरदार जो नैतिक रूप से ईमानदार आदमी को दर्शाता था और फिर कोई ऐसा किरदार जिसके लिये 'सब चलता है' ।
उसने दो को चुना और मैंने उससे कहा कि वह बारी-बारी उनका स्थान ले और उनसे संवाद करे । उसे यह बहुत ही मुश्किल लगा और बार-बार किरदार से बाहर आना चाहता रहा । उसने पूछा 'क्या मैं दोनों को एक कर सकता हूँ ?' लेकिन एकीकरण इतनी आसानी से नहीं होता ।
जब वह अपने ईमानदार किरदार को निभा रहा था तो उसने बताया कि वह चीनी होने की गहरी और लम्बी परम्परा का अनुसरण कर रहा था जबकि दूसरे किरदार में वह उन मूल्यों के साथ समझौता कर रहा था । इसलिये यह स्पष्ट था कि परम्परा को मानने में उसके महत्व की सीमा चीनी सभ्यता का गहन सदाचार मूल्य थे ।
इसलिये, मैंने ये सुझाव दिया कि वह दोनों किरदारों से बाहर आये और अपनी सीट पर बैठ कर दोनों किरदारों से बात करे । उसने परम्परा को स्वीकार किया और फिर यह भी स्वीकार किया कि शायद वह दूसरे पक्ष से कुछ काम का सीख सके ।
यह उसके लिये बहुत बड़ा कदम था ।
मैंने उसे यह सुझाव दिया कि वह एक सम्राट के समान है जिसके एक के बजाय दो सलाहकार थे पर अंतिम निर्णय उसका अपना था ।यह सुनकर उसने काफी अच्छा महसूस किया और अपने नये 'सलाहकार' की कीमत को जान पाया ।
उसने बताया कि उसके व्यक्तिगत जीवन में इसका एक पहलू था, जहाँ वो चीजों को इतनी गंभीरता से लिया कि उसे कभी यह महसूस नहीं हुआ कि उसे कभी छुट्टी मिली थी ।
इसलिये हमने दो और सलाहकार बनाये, एक वह जो उसे उसकी जिम्मेदारियों की याद दिलाये और दूसरा वह जो धृष्ट, गैर-जिम्मेदार और मस्ती करने वाला हो ।
एक बार फिर उसने दो सलाहकार पा कर राहत महसूस की लेकिन अंतिम निर्णय लेने के लिये वही सक्षम था । मैंने उसे मस्ती करने वाले किरदार में एक वास्तविक व्यक्ति के बारे में बताने के लिये कहा। उसने अपने चचेरे भाई के बारे में बताया । पिछली बार उसने अपने चचेरे भाई को नकारात्मक रूप में देखा था, अब वह उसे प्रशंसनीय रूप में देख सकता था, और उसके साथ समय व्यतीत करने के बारे में भी सोच सकता था ।
हमने गेस्टाल्ट के दिशानिर्देश, जो यह मानते हैं कि हरेक गुण के लिये एक विपरीत गुण भी होता है, विरोधाभासों के लिये प्रयोग किये । किसी एक ही पक्ष के साथ चलने से आदमी बंट जाता है । गेस्टाल्ट की दिशा एकीकरण की ओर है, जो एक वास्तविक प्रक्रिया से होनी चाहिये जिसमें दोनों पक्षों के साथ सम्पर्क हो, बजाये इसके कि इसे बौद्धिक तरीके से समझाया जाये ।
उसके लिये प्रयोग का प्रचलित तरीका सहज नहीं था (सीधा संवाद), इसलिये आसामी की स्वेच्छा से और उसकी जानकारी देने पर हमें हमेशा ही उसी स्थान पर प्रयोग को बदलने के लिये लचीले रूप से तैयार रहने की आवश्यकता है ।
रविवार, 27 जुलाई 2014
Case #26 - 26 देना और लेना
ट्रेसी अकेले ही घूमना पसन्द करती थी । उसे एक स्वतंत्र औरत की तरह रहना पसन्द था । अपने घर कुछ हफ्तों में कुछ दिनों के लिये ही जाती थी, और उसे यह ठीक लगता था । शहर में उसका अपना घर था । उसने कहा यह उसके पति को यह ठीक लगता था क्योंकि उसका स्तर ऊँचा था, और निश्चय ही उनके बीच बहस होगी ।
उसे लगता था कि उसका जीवन उसका अपना था । और, अब चूंकि उसका बेटा बड़ा हो चुका था, उसे पारिवारिक जिम्मेदारियों को निभाने की जरूरत नहीं थी । वह अपनी जीवनशैली और अपने काम से प्यार करती थी ।
फिर भी, उसकी चिंता ये थी कि जब वो घर में होती थी तो कुछ समय बाद उसे घबराहट होने लगती थी ।
गहराई से जानने के लिये, मैंने उससे उसके माता-पिता के बारे में पूछा । जब वो बड़ी हो रही थी, उसको कुछ हद तक स्वतंत्रता मिली हुई थी – उसकी माँ काफी सारे बच्चों में व्यस्त रहती थी – उसके पिता उसके साथ लड़कों जैसा व्यवहार करते थे और उसे कुछ विशेषाधिकार दे रखे थे – हालांकि वो उससे प्यार भी करते थे । फिर भी, जब उस पर ध्यान दिया जाता था तो ये ध्यान कुछ कर दिखाने के लिये होता था, या फिर एक अच्छा बच्चा बनने के लिये । इस सब की जड़ में यह था कि या तो यह हो या वह हो । या तो उस पर ध्यान दिया जाता था या वह स्वतन्त्र होती थी । लेकिन इसके बीच का कोई रास्ता नहीं था ।
उसके बाद, मैंने यह जानने के लिये कि उसके पति के साथ यह कैसा था, एक प्रयोग का सुझाव दिया ।
हम एक-दूसरे के सामने खड़े हुए । मुड़े हुए हाथ ऊपर करने का अर्थ था कि ध्यान आकर्षित करना चाहते थे । हाथ पीछे की तरफ करने का अर्थ था स्वतन्त्रता चाहते थे ।
वह एकदम से परेशान हो गई । उसने कहा वह ध्यान आकर्षित करने की मुद्रा में नहीं रहना चाहती थी । इससे उस पर बहुत दबाव पड़ता था और वह घबरा जाती थी ।
मैंने उससे पूछा कि वो स्वयँ कितनी बार महसूस करती थी कि उसे उस मुद्रा में रहना चाहिये, स्वाभाविकत: अपने पति के साथ । उसने कहा उसे जितनी उसके पास स्वतन्त्रता थी उससे ज्यादा स्वतन्त्रता चाहिये थी । मैंने पूछा बिना किसी कर्तव्य पालन की जिम्मेदारी के कितनी बार । उसने कहा- साल में दो बार अपने घर पर और बाकी समय उसका अपना हो ।
मेरे संबंध का यह नमूना नहीं था, लेकिन मैं यह स्वीकार कर सकता था कि यह नमूना उसका होगा।
इसलिये, इस आधार पर हम आगे बढ़े । वह ध्यान आकर्षित कराने की मुद्रा में थोड़ी देर ही रहना चाहती थी । फिर उसके बाद स्वतन्त्रता पाने की मुद्रा में चली गई । उसने कहा कि उसको ध्यान आकर्षित करने की मुद्रा में बड़ा असुविधाजनक लगता था ।
इसलिये, मैंने स्थिति को उल्टा कर दिया । मैंने पति का किरदार निभाया और हाथों को ध्यान आकर्षित करने की मुद्रा में ले आया । उसने एकदम बड़े जोर से पीछे हटना शुरू कर दिया । उसे बहुत गुस्सा आया । उसको लगा जब भी वह अपने पति के साथ होती थी तो वह उससे कुछ न कुछ चाहता था, और यह कि वह हमेशा ही उसको देती आई थी पर उसे कभी कुछ वापिस नहीं मिला था । इसलिये, उसका गुस्सा उभर कर आया और यह घटनाचक्र स्पष्ट हो गया । वो दूर हुई, उसकी जरूरतें और बढ़ गईं, वह और दूर हो गई, इत्यादि ।
इसलिये, मैंने ये सुझाव दिया कि हम हाथ खड़े करने की एक और मुद्रा अपने प्रयोग में जोड़ लें : देने वाली मुद्रा । स्पष्ट रुप से उसके पास देने के लिये कुछ और नहीं था । लेकिन मैंने उसके पति के रूप में देने वाली मुद्रा अपना ली और उसे कहा कि वह ध्यान आकर्षित करने वाली/प्राप्त करने वाली मुद्रा में आ जाये ।
इससे भी उसको बहुत 'शिकायत' हुई । उसे लगता था कि वास्तव में उसने अपने पति से कुछ पाया नहीं, और उसे केवल देते हुए ही काफी साल बीत गये थे ।
फिर भी, मैंने उसे वर्तमान में आने के लिये कहा और एक बार अपना गुस्सा दिखा कर उस मुद्रा का अनुभव करे जिसमें दिया जा रहा हो । वह मान गई और लेने करने से उस पर बहुत गहरा प्रभाव पड़ा । परन्तु, वह फिर असहज महसूस करने लगी – लेने की कीमत उसे देकर चुकानी पड़ेगी, जिससे वह डरती थी ।
इसलिये, इस घटनाचक्र का गहरा पक्ष उजागर हो गया ।
इसलिये, मैंने उसे एक बार प्राप्त करने और एक बार देने के लिये कहा । मैं उसे दूँगा और वह लेगी, और जैसे ही वह असहज महसूस करेगी, हम मुद्रा को बदल लेंगें । वह अपना उधार चुकाने के लिये मुझे वापस दे सकती थी (और मैं प्राप्त करूँगा) । लेकिन तब तक ही जब तक वह सहज रह सकती थी ।
उसकी गति बहुत तेज थी, एक मुद्रा में वह केवल कुछ ही सैकेंड के लिये रहती थी । परन्तु, इससे वह बहुत ही सहज महसूस कर रही थी, और उसे लगा कि हम एक ही मुद्रा में जरूरत से ज्यादा नहीं रहे ।
यह अनु्भव उसके लिये गहरी पैनी दृष्टि वाला था, और इसने उसे वो अनुभव दिया जिसके लिये वह इच्छुक थी पर उसने उम्मीद पूरी तरह से छोड़ दी थी ।
इसका महत्व यह नहीं था कि यह स्थिति के लिये 'ठीक' था या स्थिति का 'इलाज' था, बल्कि यह जागरुकता को खोजने के लिये था, जिसने उसमें एक बड़ी गहरी जागरुकता उत्पन्न की, उसका संदर्भ, उसका घटनाचक्र में भाग लेना, तथा उसे एक नया अनुभव भी प्रदान किया ।
ऐसे नये अनुभव जो गेस्टाल्ट प्रयोगों से निकल कर आते हैं उपाय नहीं हैं, लेकिन एक आदमी के संसार को बड़ा करते हैं, और कुछ करने के लिये शुरुआत का एक नया बिंदु प्रदान करते हैं ।
जब वातावरण से कुछ नहीं मिलता तो वह एक ठीक होने का अनुभव भी प्रदान करते हैं ।
प्रक्रिया की शुरूआत पृष्ठभूमि के संदर्भ से हुई थी । एक बार वह स्पष्ट हो गया तो हम अभी और यहीं के प्रयोग पर आ गये । इसके लिये उसे यह लगना चाहिये था कि यह किसी 'चाहने वाली चीज' के द्वारा व्यवस्थित नहीं किया गया था, लेकिन वास्तव में यह उसकी लय के बारे में था ।
उसमें स्वयँ भाग ले कर मैं जहाँ वह थी, उसे क्या आवश्यकता थी, उससे तालमेल बिठा सकता था और उसकी व्यवस्था पर एक सीधी आनुभविक पैनी दृष्टि डाल सकता था ।
इसका ये अर्थ भी था कि मैं नये तरीकों से प्रतिक्रिया कर सकता था । मैंने प्रयोग में बदलाव ला कर 'देने' की तीसरी मुद्रा भी जोड़ दी थी, क्योंकि यह स्पष्टत: अनुपस्थित थी, फिर भी बहुत ही महत्वपूर्ण तत्व थी । इसने उसको किसी के द्वारा बिना अधिक कीमत के दिये जाने का अनुभव भी लेने दिया।
उसे लगता था कि उसका जीवन उसका अपना था । और, अब चूंकि उसका बेटा बड़ा हो चुका था, उसे पारिवारिक जिम्मेदारियों को निभाने की जरूरत नहीं थी । वह अपनी जीवनशैली और अपने काम से प्यार करती थी ।
फिर भी, उसकी चिंता ये थी कि जब वो घर में होती थी तो कुछ समय बाद उसे घबराहट होने लगती थी ।
गहराई से जानने के लिये, मैंने उससे उसके माता-पिता के बारे में पूछा । जब वो बड़ी हो रही थी, उसको कुछ हद तक स्वतंत्रता मिली हुई थी – उसकी माँ काफी सारे बच्चों में व्यस्त रहती थी – उसके पिता उसके साथ लड़कों जैसा व्यवहार करते थे और उसे कुछ विशेषाधिकार दे रखे थे – हालांकि वो उससे प्यार भी करते थे । फिर भी, जब उस पर ध्यान दिया जाता था तो ये ध्यान कुछ कर दिखाने के लिये होता था, या फिर एक अच्छा बच्चा बनने के लिये । इस सब की जड़ में यह था कि या तो यह हो या वह हो । या तो उस पर ध्यान दिया जाता था या वह स्वतन्त्र होती थी । लेकिन इसके बीच का कोई रास्ता नहीं था ।
उसके बाद, मैंने यह जानने के लिये कि उसके पति के साथ यह कैसा था, एक प्रयोग का सुझाव दिया ।
हम एक-दूसरे के सामने खड़े हुए । मुड़े हुए हाथ ऊपर करने का अर्थ था कि ध्यान आकर्षित करना चाहते थे । हाथ पीछे की तरफ करने का अर्थ था स्वतन्त्रता चाहते थे ।
वह एकदम से परेशान हो गई । उसने कहा वह ध्यान आकर्षित करने की मुद्रा में नहीं रहना चाहती थी । इससे उस पर बहुत दबाव पड़ता था और वह घबरा जाती थी ।
मैंने उससे पूछा कि वो स्वयँ कितनी बार महसूस करती थी कि उसे उस मुद्रा में रहना चाहिये, स्वाभाविकत: अपने पति के साथ । उसने कहा उसे जितनी उसके पास स्वतन्त्रता थी उससे ज्यादा स्वतन्त्रता चाहिये थी । मैंने पूछा बिना किसी कर्तव्य पालन की जिम्मेदारी के कितनी बार । उसने कहा- साल में दो बार अपने घर पर और बाकी समय उसका अपना हो ।
मेरे संबंध का यह नमूना नहीं था, लेकिन मैं यह स्वीकार कर सकता था कि यह नमूना उसका होगा।
इसलिये, इस आधार पर हम आगे बढ़े । वह ध्यान आकर्षित कराने की मुद्रा में थोड़ी देर ही रहना चाहती थी । फिर उसके बाद स्वतन्त्रता पाने की मुद्रा में चली गई । उसने कहा कि उसको ध्यान आकर्षित करने की मुद्रा में बड़ा असुविधाजनक लगता था ।
इसलिये, मैंने स्थिति को उल्टा कर दिया । मैंने पति का किरदार निभाया और हाथों को ध्यान आकर्षित करने की मुद्रा में ले आया । उसने एकदम बड़े जोर से पीछे हटना शुरू कर दिया । उसे बहुत गुस्सा आया । उसको लगा जब भी वह अपने पति के साथ होती थी तो वह उससे कुछ न कुछ चाहता था, और यह कि वह हमेशा ही उसको देती आई थी पर उसे कभी कुछ वापिस नहीं मिला था । इसलिये, उसका गुस्सा उभर कर आया और यह घटनाचक्र स्पष्ट हो गया । वो दूर हुई, उसकी जरूरतें और बढ़ गईं, वह और दूर हो गई, इत्यादि ।
इसलिये, मैंने ये सुझाव दिया कि हम हाथ खड़े करने की एक और मुद्रा अपने प्रयोग में जोड़ लें : देने वाली मुद्रा । स्पष्ट रुप से उसके पास देने के लिये कुछ और नहीं था । लेकिन मैंने उसके पति के रूप में देने वाली मुद्रा अपना ली और उसे कहा कि वह ध्यान आकर्षित करने वाली/प्राप्त करने वाली मुद्रा में आ जाये ।
इससे भी उसको बहुत 'शिकायत' हुई । उसे लगता था कि वास्तव में उसने अपने पति से कुछ पाया नहीं, और उसे केवल देते हुए ही काफी साल बीत गये थे ।
फिर भी, मैंने उसे वर्तमान में आने के लिये कहा और एक बार अपना गुस्सा दिखा कर उस मुद्रा का अनुभव करे जिसमें दिया जा रहा हो । वह मान गई और लेने करने से उस पर बहुत गहरा प्रभाव पड़ा । परन्तु, वह फिर असहज महसूस करने लगी – लेने की कीमत उसे देकर चुकानी पड़ेगी, जिससे वह डरती थी ।
इसलिये, इस घटनाचक्र का गहरा पक्ष उजागर हो गया ।
इसलिये, मैंने उसे एक बार प्राप्त करने और एक बार देने के लिये कहा । मैं उसे दूँगा और वह लेगी, और जैसे ही वह असहज महसूस करेगी, हम मुद्रा को बदल लेंगें । वह अपना उधार चुकाने के लिये मुझे वापस दे सकती थी (और मैं प्राप्त करूँगा) । लेकिन तब तक ही जब तक वह सहज रह सकती थी ।
उसकी गति बहुत तेज थी, एक मुद्रा में वह केवल कुछ ही सैकेंड के लिये रहती थी । परन्तु, इससे वह बहुत ही सहज महसूस कर रही थी, और उसे लगा कि हम एक ही मुद्रा में जरूरत से ज्यादा नहीं रहे ।
यह अनु्भव उसके लिये गहरी पैनी दृष्टि वाला था, और इसने उसे वो अनुभव दिया जिसके लिये वह इच्छुक थी पर उसने उम्मीद पूरी तरह से छोड़ दी थी ।
इसका महत्व यह नहीं था कि यह स्थिति के लिये 'ठीक' था या स्थिति का 'इलाज' था, बल्कि यह जागरुकता को खोजने के लिये था, जिसने उसमें एक बड़ी गहरी जागरुकता उत्पन्न की, उसका संदर्भ, उसका घटनाचक्र में भाग लेना, तथा उसे एक नया अनुभव भी प्रदान किया ।
ऐसे नये अनुभव जो गेस्टाल्ट प्रयोगों से निकल कर आते हैं उपाय नहीं हैं, लेकिन एक आदमी के संसार को बड़ा करते हैं, और कुछ करने के लिये शुरुआत का एक नया बिंदु प्रदान करते हैं ।
जब वातावरण से कुछ नहीं मिलता तो वह एक ठीक होने का अनुभव भी प्रदान करते हैं ।
प्रक्रिया की शुरूआत पृष्ठभूमि के संदर्भ से हुई थी । एक बार वह स्पष्ट हो गया तो हम अभी और यहीं के प्रयोग पर आ गये । इसके लिये उसे यह लगना चाहिये था कि यह किसी 'चाहने वाली चीज' के द्वारा व्यवस्थित नहीं किया गया था, लेकिन वास्तव में यह उसकी लय के बारे में था ।
उसमें स्वयँ भाग ले कर मैं जहाँ वह थी, उसे क्या आवश्यकता थी, उससे तालमेल बिठा सकता था और उसकी व्यवस्था पर एक सीधी आनुभविक पैनी दृष्टि डाल सकता था ।
इसका ये अर्थ भी था कि मैं नये तरीकों से प्रतिक्रिया कर सकता था । मैंने प्रयोग में बदलाव ला कर 'देने' की तीसरी मुद्रा भी जोड़ दी थी, क्योंकि यह स्पष्टत: अनुपस्थित थी, फिर भी बहुत ही महत्वपूर्ण तत्व थी । इसने उसको किसी के द्वारा बिना अधिक कीमत के दिये जाने का अनुभव भी लेने दिया।
शुक्रवार, 25 जुलाई 2014
Case #25 - 25 10,000 तीर
मेरी का दो बार तलाक हो चुका था और अब वो फिर अपने पिछले पति के साथ रह रही थी, जो उसके बेटे का पिता था ।
मैंने उससे जीवन के सफर के बारे में पूछा ।
दोनों एक साथ एक व्यापार करते थे लेकिन वो एक दृष्टिकोण पर सहमत नहीं होतेथे । समय के साथ वह उसके साथ हिंसक होता गया था । यह काफी वर्षों तक चलता रहा ।
फिर उसने उससे तलाक माँगा, और उसके बाद एक कर्मचारी, जो उनके व्यापार में काम करता थी, के साथ संबंध बनाना चाहा ।
उस औरत द्वारा नकार दिये जाने के बाद उसने मेरी से दोबारा विवाह करने के लिये कहा, जिसे उसने मान लिया। पर उसका उसको मारना जारी रहा ।
अंत में, बहुत वर्षों बाद जब हिंसा हद से बढ़ गई तो उसने उसे तलाक दे दिया ।
कुछ वर्षों के बाद उन्होने फिर साथ रहना शुरू कर दिया, इस बार बिना किसी हिंसा के, और वह अब अपने संबंध को संतोषजनक बताती है, और अब वह उसके साथ नाखुश नहीं है ।
फिर भी, यह बताते हुए उसे बहुत पीड़ा महसूस हुई थी।
मैंने उससे पूछा कि वो बची कैसे रही; उसको अपनी माँ और दादी के बारे में याद आया कि उनको किस तरह का जीवन व्यतीत करना पड़ा था (बिना हिंसा के ) ।
मैंने उससे पूछा कि उसे क्या महसूस हो रहा था। उसका उत्तर था 'जैसे मेरे ह्रदय में 10,000 तीर हैं' ।
मैंने इस बात को समझा कि वो इसके बजाय कि दूसरों को दर्द दे, दर्द को अपने अंदर छुपा कर रखती है, लेकिन मैंने उस पर इसके प्रभाव के लिये चिंता जताई ।
मैंने उससे पूछा कि मेरे साथ, जो कि एक आदमी है, बात करते हुए उसे कैसा लगता था – उसने कहा कि वो सुरक्षित महसूस कर रही थी ।
मैंने उससे कहा कि एक आदमी ने वो तीर उसको चुभाये थे, इसलिये एक आदमी हो कर मैं उन्हे निकालने में उसकी सहायता करना चाहता था ।
मैंने ऐसा किया, 'तीर' को जमीन पर लिटा कर, इस बात को माना कि वह किस तरह बुरी तरह घायल हुई होगी ।
मैंने यह जाँचा कि उसको कैसा लग रहा था: उसने बताया कि उसे पीड़ा महसूस हो रही थी, लेकिन अंदर तक द्रवित भी महसूस कर रही थी, और थोड़ा आराम भी लग रहा था ।
इसलिये मैंने इस प्रक्रिया को दो बार दोहराया, हर दफा उसके अनुभव के अलग पक्ष को देखा ।
उसको थोड़ी राहत महसूस हुई, लेकिन उसको अपने हाथ कुछ सुन्न भी होते हुए लगे । इससे यह पता चलता था कि उसने काफी कर लिया था । अंत में, मैंने यह सुझाव दिया कि हम उसके चुनाव के अनुसार तीन तीरों से ये पद्धति करते हैं । उसने तीरों को जमीन के अन्दर गाड़ने वाली पद्धति को चुना ।
इसलिये मैंने उसको एक काल्पनिक कहानी सुनाई जिसमें हम दोनो तीरों को गाड़ने के लिये एक जंगल में जा रहे थे और ये मान कर कि तीर जमीन में गाड़े जा चुके थे हम उन्हे गड़ा हुआ ही छोड़ देते हैं ।
अंत में उसको हल्केपन का और उस जगह पर देखे और सुने जाने का अनुभव हुआ ।
मैंने उससे कहा कि यही काम वह घर पर करे और तीन और तीरों के साथ इस प्रक्रिया को अपने दिमाग में दिन में एक बार करके उन्हे गाड़ने की पद्धति अपनाये ।
इस प्रक्रिया में मैंने संदर्भ को अच्छी तरह से समझने के लिये उसकी पृष्ठभूमि का ढाँचा बनाया । फिर मैंने उसको ठीक करने के लिये अपने आदमी होने को इस्तेमाल किया । मैं इस बात को जाँचते हुए कि हर कदम पर उसे कैसा लग रहा था, धीरे-धीरे आगे बढ़ा और उसे काफी विकल्प दिये ।
मैंने उसके बताये गये तीरों के लक्षण को गंभीरता से लेते हुए उसे ठीक करने का कार्य प्रारंभ किया । महत्वपूर्ण कारक तीरों की संख्या को निकालना नहीं था, या फिर दर्द का स्थायी तौर पर निवारण करना नहीं था, लेकिन वास्तव में जो हमने शुरूआत की थी उससे ये अंतर पड़ा था कि उसे यह रास्ता मिल गया था कि वह स्वयँ इसका सामना कर सकती थी ।
यहाँ पर गेस्टाल्ट प्रयोग सीधे तथ्यों से और जो शब्द उसने प्रयोग किये थे से बनाया गया था और यह मूलत: हमारे बीच स्थापित हुए संबंध के कारण काम कर गया ।
मैंने उससे जीवन के सफर के बारे में पूछा ।
दोनों एक साथ एक व्यापार करते थे लेकिन वो एक दृष्टिकोण पर सहमत नहीं होतेथे । समय के साथ वह उसके साथ हिंसक होता गया था । यह काफी वर्षों तक चलता रहा ।
फिर उसने उससे तलाक माँगा, और उसके बाद एक कर्मचारी, जो उनके व्यापार में काम करता थी, के साथ संबंध बनाना चाहा ।
उस औरत द्वारा नकार दिये जाने के बाद उसने मेरी से दोबारा विवाह करने के लिये कहा, जिसे उसने मान लिया। पर उसका उसको मारना जारी रहा ।
अंत में, बहुत वर्षों बाद जब हिंसा हद से बढ़ गई तो उसने उसे तलाक दे दिया ।
कुछ वर्षों के बाद उन्होने फिर साथ रहना शुरू कर दिया, इस बार बिना किसी हिंसा के, और वह अब अपने संबंध को संतोषजनक बताती है, और अब वह उसके साथ नाखुश नहीं है ।
फिर भी, यह बताते हुए उसे बहुत पीड़ा महसूस हुई थी।
मैंने उससे पूछा कि वो बची कैसे रही; उसको अपनी माँ और दादी के बारे में याद आया कि उनको किस तरह का जीवन व्यतीत करना पड़ा था (बिना हिंसा के ) ।
मैंने उससे पूछा कि उसे क्या महसूस हो रहा था। उसका उत्तर था 'जैसे मेरे ह्रदय में 10,000 तीर हैं' ।
मैंने इस बात को समझा कि वो इसके बजाय कि दूसरों को दर्द दे, दर्द को अपने अंदर छुपा कर रखती है, लेकिन मैंने उस पर इसके प्रभाव के लिये चिंता जताई ।
मैंने उससे पूछा कि मेरे साथ, जो कि एक आदमी है, बात करते हुए उसे कैसा लगता था – उसने कहा कि वो सुरक्षित महसूस कर रही थी ।
मैंने उससे कहा कि एक आदमी ने वो तीर उसको चुभाये थे, इसलिये एक आदमी हो कर मैं उन्हे निकालने में उसकी सहायता करना चाहता था ।
मैंने ऐसा किया, 'तीर' को जमीन पर लिटा कर, इस बात को माना कि वह किस तरह बुरी तरह घायल हुई होगी ।
मैंने यह जाँचा कि उसको कैसा लग रहा था: उसने बताया कि उसे पीड़ा महसूस हो रही थी, लेकिन अंदर तक द्रवित भी महसूस कर रही थी, और थोड़ा आराम भी लग रहा था ।
इसलिये मैंने इस प्रक्रिया को दो बार दोहराया, हर दफा उसके अनुभव के अलग पक्ष को देखा ।
उसको थोड़ी राहत महसूस हुई, लेकिन उसको अपने हाथ कुछ सुन्न भी होते हुए लगे । इससे यह पता चलता था कि उसने काफी कर लिया था । अंत में, मैंने यह सुझाव दिया कि हम उसके चुनाव के अनुसार तीन तीरों से ये पद्धति करते हैं । उसने तीरों को जमीन के अन्दर गाड़ने वाली पद्धति को चुना ।
इसलिये मैंने उसको एक काल्पनिक कहानी सुनाई जिसमें हम दोनो तीरों को गाड़ने के लिये एक जंगल में जा रहे थे और ये मान कर कि तीर जमीन में गाड़े जा चुके थे हम उन्हे गड़ा हुआ ही छोड़ देते हैं ।
अंत में उसको हल्केपन का और उस जगह पर देखे और सुने जाने का अनुभव हुआ ।
मैंने उससे कहा कि यही काम वह घर पर करे और तीन और तीरों के साथ इस प्रक्रिया को अपने दिमाग में दिन में एक बार करके उन्हे गाड़ने की पद्धति अपनाये ।
इस प्रक्रिया में मैंने संदर्भ को अच्छी तरह से समझने के लिये उसकी पृष्ठभूमि का ढाँचा बनाया । फिर मैंने उसको ठीक करने के लिये अपने आदमी होने को इस्तेमाल किया । मैं इस बात को जाँचते हुए कि हर कदम पर उसे कैसा लग रहा था, धीरे-धीरे आगे बढ़ा और उसे काफी विकल्प दिये ।
मैंने उसके बताये गये तीरों के लक्षण को गंभीरता से लेते हुए उसे ठीक करने का कार्य प्रारंभ किया । महत्वपूर्ण कारक तीरों की संख्या को निकालना नहीं था, या फिर दर्द का स्थायी तौर पर निवारण करना नहीं था, लेकिन वास्तव में जो हमने शुरूआत की थी उससे ये अंतर पड़ा था कि उसे यह रास्ता मिल गया था कि वह स्वयँ इसका सामना कर सकती थी ।
यहाँ पर गेस्टाल्ट प्रयोग सीधे तथ्यों से और जो शब्द उसने प्रयोग किये थे से बनाया गया था और यह मूलत: हमारे बीच स्थापित हुए संबंध के कारण काम कर गया ।
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