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About Me

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I teach and practice Gestalt therapy, Career decision coaching, and Family Constellations work. As well as Australia, I teach workshops and training in China, Japan, Korea, the USA & Mexico. I am author of Understanding The Woman In Your Life, a book of advice for men about relationships with women. In my work as director of Lifeworks I provide therapy,  training and supervision. I am a Phd candidate, studying the interpersonal dynamics of power, and am currently director of an MA in Spiritual Psychology for Ryokan College, an accredited online institution based in LA.

सोमवार, 22 सितंबर 2014

Case #38 - 38. औरत जो असफल हो गई

जेम्मा की चिंता असफलता थी. वह हरेक चीज में असफल रहती थी – एक कम्पनी के लिये काम करते हुए उसकी पांच दुर्घटनाएँ हो चुकी थी, दूसरी कम्पनी के लिए काम करते हुए उससे कम्प्यूटर पर गलतियाँ हुई थी, इत्यादि . उसे महसूस होता था कि वह जीवन में असफल थी.

जैसे ही उसने अपनी चिंता बताई, मैं सावधान हो गया. उसने एक के बाद एक कहानी सुनाई, एक में से दूसरी निकलती हुई. वह रुआंसी हो रही थी, बेहोश सी हो रही थी, और मैं यह देख पा रहा था कि मुझे उसके साथ घंटो काम करना पड़ सकता था, बिना किसी नतीजे पर पहुंचे. उसने वो भी समस्याएं बताई जो उसे अपने घर से बाहर निकलेन के बाद अपने माता-पिता के साथ हो रहीं थी, उसे अपने माता-पिता पर बहुत गुस्सा आ रहा था, अपने पिता और उसकी मंशाओं पर उसे शक हो रहा था. स्पष्टत: वह सहायता के लिए बहुत उद्ग्विन थी, और उसकी उद्ग्विनता ने मुझे झंझोड़ दिया था, और मैंने पीछे हटना चाहते हुए भी स्वयं को प्रतिक्रिया करते हुए पाया.

इसलिए मैं यह जानता था कि मुझे सीधे उसके भीतर जाना था, और स्वयं को उसमें भागीदार बनाना था. मैंने कहा चलो हम असफलता से निपटते हैं; यह अभी हो रही है – तुम मेरे साथ पहले ही असफल हो रही हो – तुम्हारी शैली मुझ पर प्रभाव डाल रही है. उसने सिर हिलाया – वो जान चुकी थी कि मैंने प्रतिक्रिया व्यक्त की थी, निस्संदेह उसका जाना-पहचाना अनुभव था.

कोई अगर आत्म-विनाशकारी रूप से अपने को ताले में बंद रखे तो पहला कदम यह होगा कि हम उसकी कहानियां सुनने के बजाय पूर्ण रूप से उसे वर्तमान में ले आयें. और इसे करने का सबसे अच्छा तरीका है कि हम यह देखे कि वह संबंधों में कैसे घुलता-मिलता है.

मैंने फिर उसे मेरे साथ एक छोटी सी गेम खेलने के लिए कहा. मैं चाहता था कि वो अंदाजा लगाये कि उसकी असफलता के बारे में मेरी क्या प्रतिक्रिया थी – हरेक दो अंदाजों के बाद मैं उसे बताऊंगा कि वो सही थी या नहीं.

उसने अंदाजा लगाया कि मैं अपना धैर्य न खोने के लिए पूरी कोशिश कर रहा था. मैंने कहा नहीं. उसने अंदाजा लगाया कि मुझे उसके साथ सहानुभूति महसूस हो रही थी. मैंने कहा नहीं.

मैंने उसे बताया कि मुझे उससे चिडचिडाहट हो रही थी.

फिर मैंने उसे ये अंदाजा लगाने के लिए कहा मुझे वह सब कैसा लग रहा था. उसने कहा मैं अपनी  भावनाओं को दबा रहा था. मैंने कहा ये थोडा सा ही ठीक था. उसने अंदाजा लगाया कि मैं उसे अपने पेट और छाती में महसूस कर रहा था.

फिर मैंने उससे कहा कि वास्तव में मुझे उस पर गुस्सा आ रहा था, और मैं उसे अपनी छाती में एक अंदरूनी दबाव की तरह महसूस कर रहा था.

मैंने उसे वो प्रयोग करने के लिये कहा क्योंकि मैं उसे स्वयं पर दया करने के दलदल से और असफल-सूत्र के पिंजड़े से  निकालना चाहता था. मैं उसे यह दिखाना चाहता था कि यह सह-रचित अनुभव था और वो ही एक अकेली नहीं थी जो पीड़ित थी. यह मेरे लिए भी भयंकर था. मैंने उसे भी यह करने को कहा, क्योकि वह स्पष्टत; पागल थी(अपने पिता के कारण), और अंदाजा लगाने के खेल का स्पष्टतया  अभ्यास करना एक अच्छी बात थी, और अकेले ही अपनी बातें मानने के बजाय   ठीक बात के पता लगने का अवसर मिले.  

इसके बाद मैंने उसे सीटें बदलने के लिए कहा. मैं वो बनूँगा और फिर विपरीत क्रम में वैसा ही करूंगा. इसलिए मैं उदास, निरुत्साहित, असफल व्यक्ति की तरह महसूस करते हुए, और वो क्रोधित थी.

उसने अपने किरदार में यह नोट किया कि  'मैं अपने माता-पिता कि तरह हूं, भाषण देना, चिल्लाना, आलोचना करना, मुझे नीचा दिखाना, मुझ पर कर के दिखने के लिए दबाव डालना'.

यह लाभप्रद था क्योकि, फिर से इसने उसे अपने पहचाने हुए विरोधी भाग से बाहर निकाला, उसे इस चीज का कि क्या हो रहा था ज्यादा प्रायोगिक अनुभव दिया.

फिर मैंने उसे भर्ती की उपमा दी – जैसे कि उसने मुझे स्वयं पर गुस्सा करने के लिए भरती किया था, और यह मैंने इतनी सफलता से किया कि उसे एक मिनट सुनने के मुझे वास्तव में गुस्सा आ गया था. मैंने उसे कहा कि किसी स्तर पर मैं दूसरा पक्ष निभाने के लिए भी सहमत था, और यह मेरा निर्दयी पक्ष था जिससे मैं सहमत था.

मैंने उसे विस्तार से बताया कि यह दो व्यकित्यों का खेल था. उसने कहा – वास्तव में जब वह गुस्से वाला खेल खेल रही थी तो उस खेल ने उसे उस दवाब के बारे में याद दिलाया जो उसे उसके दादा-दादी से उसी तरीके से मिलता था.   

इसलिये, वास्तव में उसका कार्यक्षेत्र इस तरह से संचालित होता था.

मैंने उसे दूसरी उपमा दी: एक पांडुलिपि, और इच्छुक खिलाड़ी की. उसे पांडुलिपि को अपने जीवन के हर क्षेत्र में दोहराना था. वो सहमत हो गई. इसने वो ढांचा बनाया जो कार्यक्षेत्र में हो रहा था, बजाय इसके कि इसे व्यक्तिगत तरीके से किया जाये (उसकी समस्या) और इस व्यावहारिक प्रक्रिया में उसके और उसके आसपास बार-बार होने वाले बलपूर्वक और निर्दयतापूर्ण अनुभव की प्रक्रृति.

फिर मैंने उससे कोई भी ऐसा मशहूर खेल, जिसके चरित्र उसके व्यक्तिगत कार्यक्षेत्र जैसे थे, चुनने के लिए कहा जिसे वह खेल चुकी थी. उसने एक खास नाटक का वर्णन किया जिसके चरित्र वैसे ही थे जिसे हमने सारी प्रक्रिया में जाहिर किया था.

फिर मैंने उससे किसी और कहानी का उदाहरण बताने के लिए कहा – कोई फ़िल्म या नाटक, जिसकी पांडुलिपि अलग हो. यहाँ मैं व्यापक रूप से  देख रहा था, कार्यक्षेत्र के दूसरे साधनों कि तरफ, दूसरे तरीके से रहने वाले.  उसने हैरी पोट्टर को चुना, और जब मैंने पूछा कि वो कौन सा चरित्र बनना चाहती थी, उसने कहा हैरी.

इसलिए मैंने उसे हैरी पोट्टर की तरह देखने को कहा. यह इसलिये था क्योकि जिस तरीके से उसने पीड़ित की सारी पांडुलिपि तैयार की थी – उसने मेरी तरफ एक ख़ास तरीके से देखा था.

उसने इस प्रयोग को आजमाया, और जैसे जैसे हम फ़िल्म में हैरी पोट्टर के स्वभाव को जांचते गये – उसकी न मारे जाने कि क्षमता, इत्यादि उसके रूप में उसमें ज्यादा मजबूती आती गई. उसे अपनी पहचान में एक बदलाव महसूस हुआ, और दूसरी तरफ मैंने उसका दूसरे रूप में अनुभव किया. इस प्रयोग को करने के लिये मुझे उसके साथ बहुत जिद्दी होना पड़ा, और इमानदारी की बात है कि सारे प्रयोग में मैंने संबंध के साथ काम किया, तरह तरह के प्रयोगों के साथ, जिनमें से सबसे आखिरी आधार का बदलाव  था ... लेकिन उसमें उन सभी चीजों की आबश्यकता पड़ी जो पहले हुईं थीं

मंगलवार, 9 सितंबर 2014

Case #37 - 37. अत्याचार करने वाला भाा और रक्षा करने वाला भाला

मेरा अनुमान था कि सीलिया 30 और 40 वर्ष के बीच होगी, लेकिन वास्तव में वह 51 वर्ष की थी और उसके बच्चे भी थे. प्रशंसनीय यह था कि उसका जीवन बहुत संघर्षपूर्ण रहा था, लेकिन वो शांत दिखती थी, और इसलिए वह नवयुवा का आभास देती थी.  यह ऐसी चीजें थीं जिन पर काम करने के लिए मेरे पास समय नहीं था, हालांकि मैंने भविष्य के लिए इसे नोट कर लिया था. यह हमेशा ही महत्वपूर्ण रहता है कि तात्कालिक प्रभाव को पहचान लिया जाये, और जाने-पहचाने आसामियों को भी असंगतियों  या चिकित्सा के लिए उनकी प्रासंगिक चीजों को नये तरीके से देखा जाना चाहिये.

जो मुद्दा वह ले कर आई थी वह इस बारे में था कि जिस विषय पर उसने प्रशिक्षण लिया था वह उस विषय पर काम करने से डर रही थी. वह एक समाजसेवी बनना चाहती थी, और अब जब उसके बच्चों ने घर छोड़ दिया था, यह उसका एक घोषित लक्ष्य था.

इसके बजाय कि मैं उसके आत्मविश्वास पर काम करूँ या फिर उसके डर का पता लगाऊं, मैं सन्दर्भ को जानना चाहता था – उसके आसपास के वातावरण का उसे ऐसा करने के लिए दिया जाने वाला समर्थन. यह कोई समस्या नहीं थी क्योकि उसे पेशेवर समाजसेवी कार्यकर्ताओं का समर्थन प्राप्त था.

परन्तु उसके पति ने कहा कि अगर वो समाजसेवा का काम शुरू करती है तो वह उसे तलाक दे देगा. यह एक बहुत ही तगड़ी प्रतिक्रिया थी, लेकिन पुरुष-प्रधान सभ्यता के चलते, जिसमें यह सत्र हो रहा था, यह चौंकाने वाली बात नहीं थी.

परन्तु जब मैंने आगे पूछा तो उसने बताया कि वह दशकों से घरेलू हिंसा के वातावरण में रह रही थी.

यह मुझे बड़ा अजीब लगा कि और उसकी समाज सेवा संबंधी आकाक्षाओं पर उसकी 10 साल की पढाई और चिकित्सा में या तो यह उभर कर नहीं आया या उसके शिक्षिकों ने किसी कारण से यह जिम्मेदारी नहीं समझी कि इससे भी निपटा जाये.

चिकित्सा में न केवल भावनाओं पर केन्द्रित होना महत्वपूर्ण है, लेकिन सन्दर्भ पर भी केन्द्रित होना आवश्यक है, विशेषतया तब जब सन्दर्भ वर्तमान में अत्याचार कर रहा हो. इसे चिकित्सा का केंद्रबिंदु  रखना जरूरी है.

इसलिए मैं दूसरे मुद्दों से निपटने के लिए इच्छुक नहीं था, जब तक कि इसकी जड़ – उसके समझ में आने वाले डर को – खत्म न किया जाये. उसने बताया कि हिंसा होनी अभी हाल ही में बंद हुई थी.

मैंने उसके पास बैठ कर अपनी भावनाओं के बारे में बताया – खुले दिल से, मुद्दे के साथ गंभीरता से जुड़े रह कर, उसे समर्थन देना चाहते हुए, लेकिन बहुत सतर्कता और एक सम्मानपूर्ण तरीके से.

मैंने उसे बताया कि डर लगभग एक पारिवारिक सदस्य की तरह है. वह सहमत थी. मैंने उससे डर को एक पहचान देने के लिये कहा – उसने कहा कि एक आकार है जिसने काले कपडे पहने हुए हैं, उसकी आँखें बड़ी-बड़ी हैं, एक मुस्कराहट और भाले के साथ. उसने वर्णन दिया कि यह भयानक था.

मैंने उससे विस्तार से वर्णन करने को कहा – कपड़े कैसे दिखते थे. मैं वास्तव में उसे उसके डर के साथ जोड़ना चाहता था. फिर मैंने उसे गेस्टाल्ट प्रयोग में भाग लेने के लिये कहा – डर बनो – ये दिखाओ कि डर बड़ी आँखे लिये अपने भाले के साथ कैसे खड़ा था.

उसने ऐसा ही किया और मैंने भी उसके साथ ऐसा ही किया. कभी-कभी आसामियों के साथ ऐसे प्रयोग करना अच्छा होता है. फिर मैंने उसे दोबारा बैठने के लिये कहा – मैं वह प्रयोग ज्यादा समय के लिए नहीं करना चाहता था. वर्णन करना ही अपने आप में एक बहुत बड़ी बात थी.

उसने कहा कि उसे लगता था कि इस प्रक्रिया में मैंने उसे बहुत कुछ दिया था, और वह और लेते हुए हिचकिचाहट महसूस कर रही थी – जैसे कि उसे मुझे कुछ वापिस करना था. उसने बताया कि उसे स्कूल में पढ़ाया गया था कि वह केवल आदमियों के लिए है, और हालांकि लड़की होते हुए उसने इसका विद्रोह किया था, यह उसकी मन:स्थिति का हिस्सा था.

इसलिये, मैंने इस स्थिति को स्वीकारा और रुक गया. मैंने कहा, 'ठीक है, तो फिर तुम मुझे क्या देना चाहोगी; मैं लेने के लिए तैयार हूं'. हम वहा चुपचाप बैठे रहे, और फिर उसने कहा कि वह मुझे मैंने जो कुछ किया था उसके लिये अपनी प्रशंसा देना चाहती थी.

यह कहने के बाद उसने मेरे साथ दोबारा आगे बढने के लिए स्वयं को सुरक्षित महसूस किया. आसामी के साथ क्या हो रहा है, उसके  हर क्षण को सुनना और उनकी लय के साथ उन्ही जगहों पर रहना बहुत महत्वपूर्ण है.

मैंने उससे पूछा कि डर कहाँ था – उसने उत्तर दिया कि उसके अंदर. उसने कहा कि इसका भाला उसके दिमाग में चुभ कर दर्द कर रहा है.

मैं अब उसके साथ सीधे सम्बधात्मक विधा में चला गया. मैंने उसे बताया कि मुझे उसके दर्द से बहुत दुःख हो रहा था, बहुत दुःख. मैं उसे सुरक्षा देने के लिए बचाना चाहता था लेकिन जानता नहीं था कि कैसे किया जाये.

वह बहुत ज्यादा द्रवित हो गई और हम कुछ समय के लिए चुपचाप बैठे रहे. यह एक मुख्य बदलाव था – कोई जो उसकी परवाह करे, जो उसके साथ हो सके, सुरक्षात्मक रूप में, फिर चीजों को ठीक करने में जल्दबाजी न करे.

यह 'मेरा-तुम्हारा' क्षण था, दो व्यक्ति पूरे सम्पर्क में. मैं चिकित्सक था और वह आसामी थी, लेकिन उस जगह हम दो व्यक्ति थे, एक दूसरे के साथ बैठे हुए, और स्थिति के गहरे दर्द के साथ. मैंने उसकी पीड़ा को गंभीरता से लिया – सिर्फ एक आनंद देने वाला प्रयोग नहीं, केवल एक डर का आकर नहीं, बहुत से दशकों का हिंसा का डर.
उस जगह पर बैठे हुए हम दोनों के दिल खुल चुके थे. मैं बहुत गहराई तक द्रवित हो गया था, और वह भी. हम दोनों ने यही कहा.

फिर मैंने कहा – मेरे पास भी एक भाला है, यह सुरक्षा का भाला है. मैंने उससे अपने भाले के साथ अपने दिल के अन्दर लेने को कहा.

वह इसे आसानी से कर पाई, और उसके आंसू निकल आये. वह सुरक्षित महसूस कर रही थी जिसकी परवाह की जाती हो.

इसे कहा जाता है कि स्वयं की वस्तु जिसे अपने अंदर लिया गया हो . इसका अर्थ है कि उसके अंदर एक आधिकारिक आकार है जो उसके लिये है, जैसे कि उसका पिछला अनुभव था एक प्राधिकारी जो उसके अंदर बढ़ रहा था वह दबाने वाला था और उससे यह उम्मीद की जाती थी वह अपने जीवन में आदमियों के लिए थी. हालांकि चिकित्सा में कुछ ज्यादा नहीं हुआ था, इसका बहुत ज्यादा प्रभाव पड़ा था. अंत में मैंने उससे पूछा कि अपने पेशे में जाने के लिए उसका डर अब कहाँ था. उसने कहा कि उसे नहीं लगता कि उसे अब धमकाया जा रहा था.

अब यह काम का वो भाग है जिसमें संबंधों पर चिकित्सा जारी रहनी चाहिए, और एक मुद्दत की हिंसा के बाद इससे निपटा जा रहा है . मैं इसको सतर्कता पूर्वक देखता रहना चाहूँगा, क्योकि यह अभी भी संभव है कि हिंसा फिर से शुरू हो जाये, और एक पेशेवर की तरह, और साथ ही साथ एक ध्यान रखने वाले व्यक्ति कि तरह, मैं यह निश्चित करना चाहूँगा कि मैं किसी भी रूप में इसका भागीदार न बनूँ.

शुक्रवार, 5 सितंबर 2014

Case #36 - 36. औरत जिसे कुछ महसूस नहीं होता था

ब्रेन्डा ने बताया कि उसकी अपनी कोई पहचान  नहीं थी – वह स्वयं को भूल चुकी थी और दूसरों की पहचान के साथ अपनी पहचान को कुछ ज्यादा ही जोडती थी.

उसने यह भी बताया कि वह शर्मीली थी, अपनी फोटो खिंचवाना या चकाचौंध  में आना पसंद नहीं करती थी.

यह संभल कर और नाजुकता से आगे बढ़ने के लक्षण थे, और शर्म के संभावित  मुद्दों के बारे में जानकारी होना (अनावरण संबंधी) आवश्यक था .

मैंने उसे बताया कि मैं उससे उतना ही पुछूगा जितना उसको ठीक लगे.

मैंने उससे कहा कि हम लोगों के समूह के सामने थे, और पूछा कि वह कैसा लग रहा था. उसने कहा कि वो उसको देख रहे थे, लेकिन उसको ऐसा नहीं लग रहा था कि कोई उसको देख रहा था. मैंने पूछा कि क्या वो इस कारण से था कि वे लोग उसको ज्यादा नहीं जानते थे या इसलियें कि वह नजरें चुरा रही थी. उसने कहा, दोनों ही.

इसने मुझे संबंधो की क्रियाशीलता का ढांचा बनाने में सहायता की. इसलियें, मैं दोबारा उसकी तरफ मुखातिब हुआ और उसको देखने लगा, लेकिन वो मुझसे भी नजर चुरा रही थी. उसने कहा, हाँ. वह सभी के साथ ऐसा ही करती थी.
निस्संदेह यह  संबंधों में रुकावट लाता था –  देखे जाने कि इच्छा का उसका एक पक्ष, लेकिन दूसरा पक्ष इसकी इजाजत नहीं देता था. यह एक चेतावनी थी कि मुझे संभल कर आगे बढ़ना था, नहीं तो मैं खुद परेशान हो जाऊँगा और इस चक्रव्यूह में फंस जाऊँगा.

इसलिये, उससे ज्यादा पूछताछ करने के बजाय मैंने उसे वही चीजें कहीं जो उसने अपने बारे में मुझे बताई थीं – अपनी व्यक्तिगत जानकारी जो उसने मुझसे सांझा कि थी. मैंने उसे वो भी बताया जो मैंने देखा था, जैसे कि जो कपडे उसने पहन रखे थे उनका रंग.

इसने हमारे बीच उससे बिना कुछ और पूछे एक भूमिका तैयार की, जिससे यह पता चलता था कि वह जो कुछ मुझे उपलब्ध करा रही थी या बता रही थी, मैं उसे ग्रहण कर रहा था.  शर्म के मामलों में यह महत्वपूर्ण है कि अपनी भी कोई बात बताई जाये, बजाय इसके कि दूसरे व्यक्ति से कुछ ज्यादा ही पूछा जाये.

तब भी, उसकी आँखें भावहीन  थीं और उसने बताया कि वह बह  रही थी. इसका अर्थ था कि सम्पर्क बहुत अधिक था. मैंने उससे पूछा कि वह किस ओर बह रही थी....उसने कहा कि अनगिनत संसारों में, पिछले जीवन में.

इसका ये अर्थ था कि सम्पर्क टूट रहा था,  इसलिए सुरक्षा का मुद्दा यहाँ मुख्य था.
मैंने ये प्रस्ताव दिया कि वो वास्तव में स्वप्निल अवस्था में जा सकती थी, और मैं भी ऐसा ही कर सकता था, और मैं ग्रुप में सभी को स्वप्निल अवस्था में आने के लिए कहूंगा और हम सब सपने में एक साथ बैठ सकते थे.

इस प्रस्ताव ने उसके आवेग  को बढ़ाया, और उस तरफ जाने के लिए और प्रोत्साहित किया. गेस्टाल्ट में इसे मिथ्याभास  बदलाब का सिद्धांत कहा जाता है – जो कुछ है उसी में प्रवेश करना.

उसने कहा, उसे कुछ महसूस नहीं हो रहा था.

दूसरे शब्दों में पूरी तरह से उसका सम्पर्क खत्म हो चुका था.  इस स्थान पर एक विशेष तरह का सम्पर्क ही उपलब्ध है.
मैंने उससे पूछा कि सुरक्षित महसूस करने के लिए उसे किस तरह के समर्थन कि आवयश्कता थी. उसने कहा मैं नहीं चाहती कि मुझे कोई देखे.
इसलिये, मैंने उससे कहा कि मैं उसकी तरफ न देख कर दूसरी तरफ देखूगा, लेकिन साथ ही साथ मैंने उसे अपनी उदासी के बारे में भी बताया – कि क्योकि मैं उसकी तरफ विल्कुल नहीं देखूंगा, और देखने की कोशिश भी नहीं करूंगा, उसका छुपना सम्पूर्ण होगा. मैंने उससे कहा कि मुझे उसकी तरफ खिंचाव महसूस हो रहा था, लेकिन उस तक पहुँचने का मेरे पास कोई रास्ता नहीं था.
ब्रेन्डा ने मेरी तरफ देखा और कहा कि उसे सहायता की आवश्यकता नहीं थी.
यह रहस्योदघाटन था जो यह बताता था कि मुझे आगे कैसे बढ़ना था.
मैंने उसे एक प्रयोग का प्रस्ताव दिया – वो अपने दोनों हाथ ऊपर उठा कर रखे – एक हाथ पीछे  धकेलते हुए और दूसरा हाथ खुला हुआ जो सहायता लेने के लिए तैयार था.
हमने ऐसा ही किया और फिर  वो मेरी सहायता ले पाई – मैंने धीरे-धीरे अपना हाथ उसके खुले हाथ कि तरफ बढ़ाया और उसे पकड लिया.
फिर उसने कहा कि कोई ऐसी शक्ति है जो उसे महसूस न करने के लिए कहती है. मैंने किसी को अपने सामने उस शक्ति को प्रतीक के रूप में खड़े होने के लिए कहा. वो नहीं जानना चाहती थी कि वो नुमाइंदा किस चीज के लिए था.
इसलिए मैंने उसको उस शक्ति से एक व्यक्तव्य कहने के लिए कहा. उसने कहा 'मैं तुम्हारी बात तब सुनूंगी जब वह मेरे लिए किसी काम की हो, अन्यथा मैं अपनी सहायता खुद कर लूँगी'.
यह व्यक्तव्य विभेदन और एकीकरण का था.
वह अब महसूस कर सकती थी, सहायता ले सकती थी, संबंध बना सकती थी, उस जगह पर देखी जा सकती थी और अब उसे विकल्प तय करने का ज्ञान भी था.
यह काम बहुत आहिस्ता था, मुझे हर समय उसकी सीमाओं का मान रखना था, ज्यादा विस्तार से नहीं पूछना था, वो भी जो वह महसूस कर रही थी...फिर भी हार नहीं माननी थी. सामान्यतया, लोग उसी को प्रतिक्रिया दिखाते हैं जो ऐसी गोपनीयता की  सीमाएं स्थापित  करते हैं – या तो पीछे हट कर या फिर असंबद्ध  तरीके से मिल कर, या फिर उस व्यक्ति में रूचि ले कर या द्याभावना से काबू पा कर. इसमें तटस्थ उपस्थिति, काफी  स्नेह, लेकिन बहुत अधिक नहीं, के साथ – इसे अनुकूलन कहते हैं, और यह एक मूलभूत निपुणता है.




रविवार, 31 अगस्त 2014

Case #35 - 35. अपने पूर्व पर क्रोध

मेरिओन ने अपने पूर्व पति के साथ अपने बच्चों के सांझा पालन-पोषण का मुद्दा उठाया. यह स्पष्ट हो गया था कि यह उसकी मुख्य चिंता नहीं थी. इससे अधिक प्रासंगिक था उसकी असहजता और अपने पति के साथ करने वाला अधूरा कार्य.

अधिक विस्तार में जाने से पहले मैंने कहा – जब मैं तुम्हारी तरफ देखता हूँ तो मुझे यह अनुभव होता है जैसे तुम्हारी आँखे मुझे चुभ रही हैं. इससे मुझ पर बहुत गहरा प्रभाव पड़ता है. तुम्हारे पूर्व पति और मुझ में यह समानता है कि मैं भी एक आदमी हूँ, और मैं सोचता हूँ कि जो शक्ति तुम्हे अपने पति में महसूस होती है, उसमें में कुछ शक्ति मेरे में भी हो सकती है.

मैंने उससे पूछा कि उसका मुद्दा क्या था, उसने कहा, गुस्सा.

मैंने उससे पूछा वो किस बात पर गुस्सा थी. उसने अपनी परिस्थितियों के बारे में एक लम्बी कहानी बतानी शुरू कर दी....कुछ देर बाद मैंने दोबारा पूछा: ठीक है, तो आप वास्तव में किस बात पर गुस्सा हैं. उसने मुझे फिर वो लम्बी कहानी सुनानी शुरू कर दी.

मुझे उससे कई बार पूछना पड़ा जब तक कि वह स्पष्ट रूप से, सीधे शब्दों में और संक्षेप में नहीं बता पाई कि वो इसलिए गुस्सा थी क्योंकि उसे लगता था कि उसके पूर्व पति ने उसको धोखा दिया था, क्योकि उसने उसे आर्थिक रूप से सहायता देनी बंद कर दी थी ताकि वह अपने व्यापार में पैसा लगा सके. वो इसलिए भी गुस्सा थी कि उसने उससे इसके बारे में झूठ बोला था , उससे और उसके माता-पिता से भी(जो उसके साथ रहते थे).

मैंने कहा, हाँ तुम गुस्सा लगती हो, मैं यह तुम्हारी आँखों में देख सकता हूँ. अब इस समय तुम क्या महसूस रही हो?

उसने मुझे कुछ चीजें बतानी शुरू कि जो उसके अपने मूल्यांकन,  निष्कर्ष और विचार थे, न कि उसकी भावनाएं.

उसने ये जरुर कहा 'मैं अपनी भावनाओं को छुपा रही हूँ'.

इसलिए मैंने उससे ये कल्पना करने को कहा कि मै उसका पूर्व पति था और कहा कि 'मुझसे कुछ उगलवाओ.'

उसने बताना शुरू किया कि इस स्थिति के लिए वह भी दोषी थी.

इसलियें, मैंने उस पर फिर से ध्यान दिया और उसे मुझको सीधे-सीधे इन शब्दों के साथ 'मैं क्रोधित हूँ...' शब्दों के साथ शुरू करके कहने को कहा.

अंत में उसने सीधे-सीधे स्वयं को व्यक्त करना शुरू किया, उन चीजों के बारे में बताते हुए जिनकी वजह से उसे गुस्सा था.

मैंने उसकी भावनाओं को स्वीकार किया, ये माना कि कैसे वो अपने गुस्से  को देख और सुन सकती थी...और फिर मैंने उसे कैसे आंसुओं में बदलते हुए देखा – और ऐसे में  मैं भी उसकी पीड़ा को समझ सकता था.

मैं उसके इस खुली अभिव्यक्ति को प्रोत्साहन देता रहा, और वो गुस्से और आंसुओं में अदल-बदल करती रही. जैसे ही उसको महसूस हुआ कि उसकी बात सुनी जा रही थी, उसका अपनी बात सीधे-सीधे  कहने के लिए आत्मविश्वास बढ़ गया. बहुत सारी चुप्पी भी थी, जिसमें उसकी भावनाएं भरी हुई थी, और मेरी सरल स्वीकारोक्ति.

अंत में उसे बहुत हल्का महसूस हुआ, और उसने अपना बहुत सारी  पीड़ा और गुस्से से, जो वह अपने तलाक के बाद से ढो रही थी, छुटकारा पा लिया था.

इस प्रक्रिया को सफल करने  के लिये मुझे हठी होना था, उसकी जागरूकता पर केन्द्रित होना था, प्रयोग में उसके साथ भाग ले कर उसको उसको  अनुभव का ज्ञान कराना था, और उसकी कहानी कहने कि आदत को, जो उसका अपनी गूढ़ भावनाओं से बचने  करने का तरीका था, छुड़ाना था. मैंने उसे  गुस्से को सम्बन्धात्मक तरीके से काबू करना बताया, और उसे स्वयं को व्यक्त करने के लिए समर्थन और प्रोत्साहन दिया...उसे यह महसूस करने में कि ऐसा करना सुरक्षित है, कुछ समय लगा.
मैं भी उन चीजों पर नहीं गया जिन्हें वह टालना चाहती थी; और उसे स्वयं ही अनुभव करने के लिये कहा.   

इसकी प्रतिक्रिया में मैंने उसका आभार व्यक्त किया जिसके लिये वह अब तक तरस रही थी – उसका  इस स्थान पर देखा और सुना  जाना. मैं उसका पूर्व पति नहीं था, लेकिन हमारे बीच की अनुभूति इतनी मजबूत थी कि मुझे वह एक नुमाइंदा समझ कर अपनी बात कहने के पश्चात  तसल्ली महसूस कर रही थी.

शुरुआत में मेरा इस बात को जोड़ना कि मैं भी आदमी था, उसकी भावनाओं को मेरे साथ जोड़ने के लिये काफी था, और मेरी ग्रहणशीलता इस हद वास्तविक थी कि उसे लगा कि यह अभिनय नहीं था.

महत्वपूर्ण यह था कि वह चिल्लाई नहीं, चीखी नहीं, तकिये नहीं मारे, या अपनी आवाज भी ऊँची नहीं की.
गुस्सा सम्बन्ध और अपनाने से जाता है, ये आवश्यक नहीं कि नाटकीय चिकित्सा तकनीक से जाये.

बुधवार, 27 अगस्त 2014

Case #34 - सम्पर्क और विश्वसनीयता

नाथन एक तगड़ी काठी का, विचारशील आदमी था जिसकी उपस्थिति बड़ी स्पष्ट और मजबूत थी. उसका मुद्दा विश्वसनीयता था. उसे नहीँ लगता था कि वह दूसरों के साथ विश्वसनीय था. वो लगभग कभी बहस या लड़ाई नहीं करता था . वह घर पर और दफ्तर में दूसरों के साथ बहुत सहयोगी था .
उसकी पारिवारिक पृष्ठभूमि उसके बड़े भाई तथा बहन के बीच लड़ाई की थी. जबकि अपने परिवार में उसको एक अच्छे लड़के का स्थान मिला था. बचपन में दो अवसरों ने उसे प्रभावित किया था. एक तब जब उसे अपने बड़े भाई पर बहुत गुस्सा आया था, और उसने उस पर कुछ फेंक कर मारा था, जिससे उसकी आँख जाते-जाते बची थी. और, दूसरा जब उसने स्कूल एक लड़के को मारा था, जिसने बाद में उसके घर आ कर उसका चेहरा नोच डाला था .

तब से उसने अपने को रोक कर रखा था और किसी को नहीं मारता था.

उसने मुझे यह कह कर चौका दिया कि उसे अपने ऊपर विशवास नहीँ था. मैं हैरान था क्यों कि वह अपने शरीर के हिसाब से एक शक्तिशाली आदमी था .

उसने मुझे बताया कि उसके पास अपने बारे में दूसरों की बहुत ही तीखी प्रतिक्रियाए थी, इसलिए वह उन्हें अपने पास ही रखना चाहता था.

इसलियें, मैने उसे विश्वसनीयता प्रक्रिया बताई जिसे पहले मैने उसके साथ ही की.

उसके तीन भाग थे – वो क्या सोचता था, वो क्या महसूस करता था और दूसरों से वह क्या चाहता था.

मैने यह प्रक्रिया उसके साथ की और उसने मेरे साथ. वह इसे आसानी से कर सका था.

मैंने इसे एक विश्वसनीय गोष्ठी बताया. इसे जारी रखने से एक विश्वसनीय वार्तालाप होगा और यह अंत में एक विश्वसनीय संबंध बनेगा.

फिर मैंने उसे समूह में तीन लोगों के साथ ये प्रक्रिया करने को कहा. पहली तो बहुत सीधी-साधी  थी. दूसरे में एक औरत ने उसे बहुत जटिल प्रतिक्रिया दी. वह घबरा गया, और इसलिये मैंने उसे एक भावुक व्यक्तव्य के साथ प्रतिक्रिया देने को कहा. मैंने उसे विशेषतया औरतों को प्रतिक्रिया देने के लिए एक फार्मूला दिया : गोष्ठी के पहले विश्वसनीय व्यक्तव्य के बाद उसे हरेक उस व्यक्तव्य के लिए, जो उसके दिमाग में आये, तीन भावुक व्यक्तव्य देने थे.

फिर उसने इस चीज का एक और व्यक्ति के साथ अभ्यास किया .

मैंने उससे पूछा कि उसको यह कैसा लगा था; उसने उत्तर दिया कि आसान.

इससे यह पता चलता था कि उसे सिर्फ थोड़ी दिशा बताने कि आवश्यकता थी, कुछ दिशानिदेश, और अभ्यास के लिए सहारा.

एक आदमी की तरह उसे स्पष्ट निर्देश पसंद थे. जैसे कि किसी के पास बहुत सारी छुपी हुई शक्ति हो, और उसे सुरक्षित तरीके से केवल बाहर निकालने कि जरूरत हो .

उसे यह भरोसा था कि वह प्रक्रिया के अभ्यास को जारी रख पायेगा.

निस्संदेह, हम उसके परिवार से उत्पन्न हुई स्थिति पर या उसकी दुविधा पर भी काम कर सकते थे. लेकिन यह ऐसा दखल था जो उसके वर्तमान एवं भविष्य पर केन्द्रित था, और इसने उसे तत्काल ही सफलता का अनुभव दिया. यह इसलिए महत्वपूर्ण था क्योंकि इसने उसके आत्मविश्वास को उभारा था. इसने उसे एक आनुभविक  तरीके से सीखने का मौक़ा भी दिया, जिससे कि वह अपने लिए एक विश्वसनीय सम्पर्क प्रक्रिया को खोजता रहे.

सम्पर्क गेस्टाल्ट कि सिद्धांत और अभ्यास के लिए एक मुख्य पहलू हैं  और वह इस सत्र का केन्द्रीय विषयवस्तु  था.  



शुक्रवार, 22 अगस्त 2014

Case #33 - 33 एक पूर्ण और विश्वसनीय ुलासा

जेम्स का मुद्दा था कि वह सारा हफ्ता बहुत मेहनत करता था, कभी-कभी दूसरे शहरों में भी जाता था, और फिर शुक्रवार को वह घर आता था । घर से दूर रह कर वह घर लौटने का इन्तजार करता था । उसके लिये यह महत्वपूर्ण था कि उसकी पत्नी और बच्चे घर पर मिलें और वह इस भावना के साथ लौटे कि वह घर लौट रहा था ।

परन्तु, उसकी पत्नी एक उच्च-पदस्थ मानव संसाघन प्रबंधक थी, और वह घर पर कम ही रहती   थी । जब उस पर  दबाव डाला जाता था तो वह कहती थी कि उसका पेशा भी महत्वपूर्ण था, और उसकी भावनाएं उसकी अपनी मुश्किल थीं ।

वह अपनी पत्नी के साथ बहुत वर्षों से रह रहा था, और दोनों ही व्यक्तिगत बढ़त तथा ज्योतिष में रुचि रखते थे । वह अपने आप को कर्क राशि का बताता था, जो भावुक होते हैं ।

उनका संबंध बहुत गहरा और प्यार भरा था, लेकिन उनमें बहुत झगड़े भी होते थे जिन्हे वह कम करना चाहता था और संबंध में सुधार लाना चाहता था ।

इससे मुझे हस्तक्षेप के लिये संदर्भ मिल गया ।

मैंने उससे उसकी पत्नी के लिये उतनी ही कोई महत्वपूर्ण चीज पूछी जो वह उसे देना चाहेगा । उसने कहा जब वह कोई अपने दफ्तर में प्रस्तुति (प्रेसेंटेशन) करती थी, और उसके साथ सांझा करती थी, तो वह उससे मान्यता और प्रशंसा चाहती थी ।

मैंने उससे किसी दूसरी चीज के बारे में पूछा । उसने बताया कि जब वह कोई पुस्तक पढ़ती थी (सामान्यतया व्यक्तिगत विकास पर), तो वो चाहती थी कि वह भी उसे पढ़े और उसके बारे में बात   करे ।

मैंने पूछा क्या वह इन दोंनों में से कुछ करता था । उसने कहा, कुछ हद तक…परन्तु उसकी तसल्ली के मुताबिक नहीं ।

इसलिये, मैंने यह सुझाव दिया कि पहले वो उसके उन दोनों निवेदनों को गंभीरता से ले, और दोनों को तहेदिल से करे ।

मैंने सुझाव दिया कि ऐसा करने के कुछ समय पश्चात वह उसे एक पूर्ण, जटिल तथा विश्वसनीय व्यक्तव्य  दे कि उसके लिये शुक्रवार रात को उसका घर पर रहना क्या मायने रखता था ।

इससे मेरा क्या मतलब था, मैंने यह अपने जीवन के एक उदाहरण से दर्शाया :
बड़े होते हुए, जन्मदिन का हमारे घर में बहुत ही विशेष स्थान होता था । जबकि मेरी पत्नी का जन्मदिन मुश्किल से ही मनाया जाता था; और ऐसा कई बार होता था कि जब उसकी पत्नी की बहन का जन्मदिन मनाया जाता था, लेकिन उसका नहीं मनाया जाता था ।

इसका नतीजा यह हुआ कि उसे जन्मदिन के लिये कोई उत्साह नहीं होता था; वह अपने जन्मदिन को सरल और निजी रूप में मनाना पसन्द करती थी ।

मैं एक विशेष दिन की उम्मीद करता था, जो बहुत सी ऐसी चीजों के साथ ऐसा लगे कि वह 'मेरा दिन' था । बहुत से ऐसे अवसर थे जब यह सब उसने मेरे तरीके से नहीं किया जैसा कि मैं चाहता था, और मुझे बहुत चोट पहुँचती थी; ऐसा कुछ जो उसके लिये समझना बड़ा मुश्किल था ।

इसलिये, मेरा पूर्ण और जटिल व्यक्तव्य कुछ इस प्रकार था ;

मैं यह जानता हूँ जन्मदिन तुम्हारे लिये बहुत भारी पड़ते हैं, और ये कि तुम्हे अपने बचपन में इसका अच्छा अनुभव नहीं हुआ । मैं जानता हूँ कि तुमने मेरे जन्मदिन को एक अच्छा अवसर बनाने के लिये भरपूर कोशिश की है, और उसके लिये मैं बहुत आभारी हूँ । और मैंने यह भी अनुभव किया है कि ऐसा भी समय आया है कि कई कारणों से तुम अपने-आप को सही जगह पर महसूस नहीं करती हो, कुछ अतिरिक्त कोशिश करने के लिये, या किसी खास मात्रा से ज्यादा करने के लिये । मैं यह समझता हूँ कि यह तुम्हारे लिये उस भावना से संबंधित है जो तुम समझती हो कि वास्तव में तुम्हारे पास देने के लिये कितना है, और ये कि तुम इससे ज्यादा अपने जन्मदिन पर उम्मीद नहीं करती  हो । परन्तु, मैं तुम्हारे साथ अलग हूँ । जन्मदिन मेरे को भी दूसरे तरीके से भारी लगते हैं । क्योंकि मेरे लिये उनके विशेष होने की परम्परा थी, उसके पीछे मेरी उम्मीद और आशा थी कि मैं उस दिन सबसे  'पहले' रहूँ । और ये कि अगर तुम अच्छी मनोदशा में नहीं हो, तो तुम उसको एक दिन के लिये भूल जाओगी, सिर्फ उस दिन के लिये, ताकि मैं यह महसूस कर सकूँ कि मुझे विशेष व्यवहार मिल रहा है । वह मेरे लिये बहुत मायने रखेगा, और इससे भी ज्यादा क्योंकि मुझे मालुम है कि यह तुम्हारे लिये हमेशा आसान नहीं है । तुम्हे यह कहते हुए मुझे कुछ घबराहट हो रही है, क्योंकि मेरे लिये यह महत्वपूर्ण है, और इसलिये तुम्हारे लिये यह मुशिकल विषय है ।  

जेम्स को मेरे अपने जीवन से व्यक्तिग्त उदाहरण देने से वह यह समझ सकता था कि अपने इस मुद्दे के लिये  एक जटिल विश्वसनीय व्यक्तव्य कैसे बनाया जाये ।

गेस्टाल्ट संबंधों में गहराई एवँ विश्वसनीयता लाने के बारे में है, और जुड़ाव और धनिष्ठता को बढ़ाने के बारे में है । यह एक तरीके का उदाहरण है जिसे हम अपने उस आसामी के लिये करते हैं जो बातचीत करने की मूल जानकारी से ज्यादा जानते हैं ।


मंगलवार, 19 अगस्त 2014

Case #32 - विश्वसनीय साधन

डायने के दो मुद्दे थे । पहला मुद्दा यह था कि उसका पहला लड़का, जो 12 वर्ष का था, पढ़ाई में उतनी मेहनत नहीं करता था जितनी कि वह चाहती थी ।

मैंने उसे पैमाने पर नाप  के अनुसार बताने के लिये कहा कि वह कितना अच्छा कर रहा था । उसने बताया कि 6 या 7 । क्या वह अपना गृहकार्य करता था ? हाँ । लेकिन वास्तविकता यह है एक अच्छे स्कूल में दाखिले के लिये किसी बच्चे को बहुत अच्चे नम्बर चाहिये होते हैं, और इसलिये उस पर दबाव बना हुआ था ।

पहले तो मैंने अपने विचारों के अनुसार जवाब दिया -  माता-पिता पर आधारित बच्चों के पालन-पोषण पर मे्री धारणाएँ – एक बच्चे के संतुलित जीवन पर मेरी धारणाएँ, और मेरे मूल्य कि शिक्षा के क्षेत्र की उपल्बधियाँ ही अंतिम लक्षय नहीं होती ।

मेरे लिये अपनी स्थिति को स्पष्ट करना महत्वपूर्ण था, और विचारों में अंतर की सीमाओं को महसूस करना, और यह जानना कि उसे सहायता देने की मेरी इच्छा (और उसकी सीमाएँ) उसके कितने काम आ सकती थी ।

उसमें दवंद चल रहा था, क्योंकि इससे पहले उसने पालन-पोषण पर बहुत सारी पुस्तके पढ़ी थी, और उसके लिये कुछ अपने लिए समय देने की कोशिश की थी, लेकिन वह उसके भविष्य के लिये चिंतित थी, और नहीं जानती थी कि प्रभावपूर्ण ढ़ंग से उसे कैसे प्रेरित करे ।

इसलिये मेरा प्रस्ताव था कि वह उसके साथ बैठ कर पहले तो यह बताये कि उसके बड़े होने में उसके लिये क्या महत्वपूर्ण था ।

फिर वह उसको उस वस्तुस्थिति से परिचित करायेगी जिसका वह सामना कर रहा था – एक सामाजिक और स्कूल की व्यवस्था जिसमें बहुत ही ज्यादा प्रतिस्पर्धा थी, और जिसमें विशेष संस्थान में दाखिला लेने के लिये विशेष ग्रेड पाने की आवश्यकता थी । वह भांति-भांति के संस्थानों के बारे में पता लगायेगी, उनकी जरूरतें, तथा उनमें दाखिले के फायदे और नुक्सान के बारे में पता लगायेगी ।

फिर वह उसको अपना लक्ष्य निर्धारित करने में सहायता करेगी, वह कहाँ तक पहुँचना चाहता था, और यह सब करने के लिये वो क्या करना चाहता था ।

इस तरीके से वह पूरी तरह से विश्वसनीय हो सकती थी, जबकि साथ ही साथ वह उसे अपना रास्ता पाने के लिये सहायता भी कर सकती थी । उसको सहायता देने के लिये उसकी सहमती और इच्छा को तब उस दिशा में मोड़ा जा सकता था जिसमें उसके द्वारा चुने गये विकल्पों को सहारा मिल सके, बजाय इसके कि वह  उसके लिये विकल्प चुने ।

उसका दूसरा मुद्दा उसके पति के साथ संबंध के बारे में था । वो घर आने बाद बीयर लेता था, अखबार पढ़ता था, अपने ब्लाग पर लिखता था, और उसे व बच्चों को पूरी तरह से अनदेखा कर देता था ।

स्पष्टत:, वह इस स्थिति से खुश नहीं थी, लेकिन इसके लिये कोई रास्ता नहीं ढूँढ सकी थी ।

बाकी चीजों में, वह पारिवारिक जीवन में भाग लेता था, परिवार को घुमाने ले जाता था, परिवार के साथ समय व्यतीत करता था और कभी-कभी खाना भी बनाता था ।

वह कोई खास बातचीत करने वाला नहीं था, इसलिये यह कुछ नया नहीं था ।

मुझे यह स्पष्ट था कि उसको डांटने से, उससे कुछ माँगने से, या फिर यह भी सुझाव देना कि वह उससे कुछ विश्वसनीय तरीके से बात करे प्रभावकारी नहीं होगा ।

मैंने उसके  ब्लाग के बारे में पूछा । उसने बताया कि ब्लाग बड़ा ही स्पष्ट और मजेदार था । वह इसमें मजेदार टिप्पणियों के साथ चित्र भी जोड़ता था । उसकी इच्छा होती थी कि काश वह उसके साथ भी वैसे ही बात करे ।

मेरे लिये रास्ता स्पष्ट था । वह उसे बदलेगी नहीं, परन्तु वह उसका साथ दे सकती थी ।

मैंने पूछा कि क्या उसके पति के पास आई-पैड़ था । उसने बताया कि वह उसने छुपा दिया था ।

मैंने उससे कहा कि वह उसे तत्काल ही आई-पैड दे दे, और एक अपने लिये खरीद ले । फिर वह उसके साथ लिख कर बातचीत कर सकती थी । वह उसके ब्लाग पर प्रतिक्रिया व्यक्त कर सकती थी (वह उन लोगों को जवाब देता, जो ऐसा करते थे) । वह उसे नोट, पत्र, एक वाक्य भेज सकती थी । जब भी वह अखबार पढ़ रहा होगा, वह उसे छोटी-छोटी टिप्पणियाँ भेज सकती थी । वह पत्र लिख कर और उनको छाप कर डाक द्वारा भेज सकती थी या उसके तकिये के नीचे रख सकती थी ।

इस तरीके से मैं उस चीज का उपयोग कर रहा था जो उपलब्ध थी । यह उसके मन के भीतर की गतिशीलता पर असर नहीं कर रहा था, और मैंने उसकी इस धारणा को, कि वह उस पर इसलिये धयान नहीं दे रहा था कि उसमें कुछ गल्त है, बल देने से इन्कार कर दिया । इसके बजाय मैंने यह देखा कि कहाँ पर साधन उपलब्ध हैं जिनसे वह रचनात्मक रूप से उस से सम्पर्क कर सके ताकि वह संबंध के बंद बक्से से बाहर आ सके ।

शनिवार, 16 अगस्त 2014

Case #31 - धनिष्ठता के लिये यौन-ापार

लुई ने कहा कि उसे अपने संबंध में ज्यादा जुनून चाहिये था ।

उसके पति का 5 वर्ष पहले एक प्रेम-प्रसंग था । वह लगभग एक वर्ष तक रहा । उसने उसे स्वीकारा और अपने घुटनों पर बैठ कर माफी माँगी और उस प्रेम-प्रसंग को समाप्त कर दिया ।

उसके बाद से चीजें धीरे-धीरे अच्छी हो रही थीं , लेकिन अभी भी लुई के कुछ मुद्दे बाकी थे ।

जब उसके पति ने उसे पहली बार प्रेम-प्रसंग के बारे में बाताया था तो उसने विवेकशील तरीके से उत्तर दिया, उससे ये पूछ कर कि क्या वह शादी को तोड़ रहा था या नहीं । उसका स्थिति से निपटने का तरीका एकदम से स्थिति को आँकना था, और यह जानना था कि उसका पति और वह कहाँ पर खड़े थे । वह बचाव की एक अच्छी शुरूआती युक्ति थी ।

लेकिन बाद में उसको बहुत उदासी महसूस हुई ।

अभी कुछ दिनों से, उसे बहुत गुस्सा भी आ रहा था ।

लेकिन यह ऐसा कुछ नहीं था जिसको उसने उठाया था । उसके पति ने उससे कहा था कि यदि वह अभी भी गुस्सा थी तो वह उसको छोड़ने के लिये तैयार था (अपने अपराधबोध के कारण) । इसलिये उसे यह डर था कि वह अभी भी उसको छोड़ सकता था यदि वह अपनी भावनाएँ दर्शाती है ।

लेकिन यह बात उसे खाये जा रही थी । और यद्यपि उनके संबंध में बहुत सी अच्छी बातें हैं, वह दोबारा उससे ठीक तरह से खुल नहीं पाई थी, यौन-क्रिया के स्तर को  ले कर – उसने कुछ थोड़ा-बहुत छुपा लिया था । मैंने उससे पूछा कि वो यौन-क्रिया कितनी बार करते हैं – महीने में लगभग 4 बार ।

मैंने उससे पूछा कि वो कितनी देर बात करते हैं – औसतन लगभग आधा घंटा प्रतिदिन ।

मैंने उसको अपने पति के बौद्धिक भावुक स्तर का मूल्यांकन करने के लिये कहा । उसने 3 बताया । अब यह मुझे स्पष्ट हो गया था कि उसका पति उसकी बात वैसे नहीं सुनेगा जो इन परिस्थितों में वह उससे चाहती थी । उस पर अपनी भावनाओं को प्रकट करने के लिये काम करने से कोई लाभ नहीं था; यह उसका अपना कुछ गुस्सा बाहर निकाल सकती थी, लेकिन वास्तव में यह उनकी घनिष्ठता को बढ़ा नहीं सकता था क्योंकि उसके पति से उसे कुछ खास मिलने वाला नहीं था। और उसके पति से ये बात किये बिना कि उसके साथ क्या हो रहा था, उनका संबंध कुछ स्तही स्तर पर ही रहेगा ।

गेस्टाल्ट 'क्षमायाचना' पर काम नहीं करता, यद्यपि यह 'क्या है' पर जोर देता है । लेकिन इस मामले में, बहुत से अन्य विकल्प थे जिनके बारे में उसे पता नहीं था । लुई एक अधयापक थी, और उसने बताया कि उसने अपने पढ़ाने की शैली को अभी हाल ही में बदला था जिसमें 'चाहिये और नहीं चाहिये' को छोड़ दिया था, और उसने अपनी कक्षा में एक धीमा और महत्वपूर्ण बदलाव पाया था । इसी के साथ-साथ वह स्वयं को भी खोज रही थी ।

इसलिये, मैं यह जानता था कि उसके पास अपने साधन हैं, और वह स्पष्ट रुप से अपने विकास के ऊपर कार्य कर रही थी । लेकिन इससे वास्तव में यह बात उन दोनों के संबंध के बीच नहीं आई
थी ।

मेरा धयान उन दोनों के संबंध के मुद्दे पर था, बजाय लुई के साथ अंतरात्मिक तौर पर या मेरे साथ पारस्परिक तौर पर भी ।

इसलिये मैने उसे कुछ गृहकार्य करने का सुझाव दिया ।

मूलत: यह एक सौदा था ; धनिष्ठता के लिये अधिक यौन-क्रिया ।

मैंने सुझाव दिया कि वो अपने पति से कहे कि वह ज्यादा यौन-क्रिया चाहती थी, और अधिक नजदीकी चाहती थी । उसे यह सब इसलिये करना था क्योंकि वह ज्यादा धनिष्ठता चाहती थी ।

इसलिये, उसे पाने के लिये वह दोनों रोजाना ½ घंटा साथ में व्यतीत करें जिससे कि उनके संबंध में धनिष्ठता पैदा हो। मैंने उसे बहुत से विकल्प बताये – छोटी-छोटी बातों पर एक दूसरे से विश्वसनीय ढंग से बातचीत करने का अभ्यास करना; एक साथ कोई किताब पढ़ना और उस पर वार्ता करना; किसी व्यायाम का अभ्यास एक साथ करना, जैसे कि सुनना, या भावनओं को जाहिर करना; एक-दूसरे के गुस्से की बात सुनने के लिये एक-दूसरे को मौका देना; या फिर उस समय में कुछ चीजों को एक साथ करना जिससे कि उनकी नजदीकी और आपसी जुड़ाव की भावना बढ़े ।  

मैं उससे सहमत था कि यह अनुचित था । वो एक तरीके से अधयापक का किरदार कर रही थी, इसके लिये योजना बना रही थी और उसको अपने तरीके से करने की कोशिश कर रही थी ताकि वह अपना गुस्सा सुरक्षित तरीके से जता सके । यह उचित नहीं था, क्योंकि वह उस तरह से दोगुना कार्य कर रही थी ।

परन्तु, इसके कुछ और अनगिनित गौण फायदे भी होंगें, और इससे वह अपने संबंध में भावुकता लाने के अपने लक्ष्य को भी पा लेगी ।

इसका नतीजा ये होगा कि वह दोनों एक ही पृष्ठभूमि पर होंगें, बजाय इसके कि इससे उसको अपनी व्यक्तिगत जागरुकता ही मिले ।

इस दृष्टिकोण में 'एक जोड़े के संबंध पर एक ही व्यक्ति द्वारा काम करने' का इस्तेमाल किया
गया । अर्थात, जब हम किसी आसामी के साथ काम कर रहे होते हैं तो हम संबंध को सबसे आगे रखते हैं । उनके ऊपर केन्द्रित होने के बजाय, हम यह देखते हैं कि संबंध को कैसे मजबूत करें । बहुत सारी भावनाएँ, पहचान और कहानियाँ एक जोड़े के संबंध का नतीजा हैं । इसलिये, एक ही तरफ बदलाव ला कर हम संबंध में बदलाव ला सकते हैं, बजाय इसके कि हम एक ही व्यक्ति के अनुभव पर केन्द्रित हों । यह एक समुचित दृष्टिकोण को अपनाना है, हिस्सों पर काम करने की बजाय पूरे मुद्दे पर काम करना ।

यह बहुत ही स्वार्थी लगता था कि व्यवहार को बदलने के लिये यौन-क्रिया को इस्तेमाल  किया जाये – लेकिन लोग ऐसा बिना जाने ही करते हैं । जो हमने किया है उसकी जिम्मेवारी लेना और संबंधों में सबसे आगे लाना दूसरे व्यक्ति को दर-असल विकल्प दे देता है । उस तरीके से ऐसा प्रस्ताव कोई जोड़-तोड़ नहीं है, लेकिन इसके बजाय एक इमानदार प्रस्ताव है । और इस संदर्भ में किसी चीज के लिये ऐसा लेन-देन जोड़े के संबंध को प्रगाढ़ करेगा ।

सोमवार, 11 अगस्त 2014

Case #30 - 30 कामुक न ोने का एक अच्छा कारण


ब्रिजिट ने अपनी पीठ के निचले हिस्से में और जननेन्द्रिय क्षेत्र में अकड़न बताई । उसके तलाक को 5 साल हो गये थे और उसके बाद से वह कोई और संबंध नहीं बना पाई थी ।

उसने बताया कि उसके पति ने उसे चोट पहुँचाई थी । उसने कभी यौन-संबंधों में उत्साह नहीं दिखाया था, जब कि उसके पति ने बहुत बार कई तरीकों से भरपूर कोशिश की थी, और ये कि उनके संबंध में कई बहुत अच्छी बातें भी थी ।

मैंने उससे पूछा कि उसने खासतौर पर उसे कैसे चोट पहुँचाई थी, लेकिन वह इसे बता नहीं पाई । उसने कहा कि उसे लगता था कि वह उसकी तरफ नहीं आता है, इसलिये यही वह चीज है जिससे उसको चोट पहुँचती थी ।

लेकिन ऐसा लगता था कि उसके पति ने उसे चोट पहुँचाने के लिये विशेष रूप से कुछ नहीं किया   था । इसलिये ये तीर कहीं और ही निशाना लगा रहे थे ।

उसने तब बताया कि वास्तव में उसे अपने शरीर में बने रहने की भावना नहीं रही थी । मैंने भी अपने अलगाव का अनुभव उसे बताया, और यह भी मुझे अपने शरीर में पूर्ण रुप से रहने में मुश्किल होती थी ।

उसने कहा कि उसे शक है कि यह उसके माता-पिता द्वारा उसके भाई को बुरी तरह से पीटने से उत्पन्न हुआ था । उसके बाद उसे तस्करों द्वारा उठा लिया गया था, और वह पांच वर्ष बाद ही उन्हे पत्र लिख पाया था, और वहां से बच पाया था ।

परन्तु, उसके बाद वह गलियों में भिखारियों के साथ घूमता रहता था, चोरी करता था, कई बार जेल गया और जब उसने उसकी सहायता की कोशिश की तो उसने उसके यहाँ भी चोरी की ।  

उसने बताया कि 15 साल पहले उसके पिता का देहांत हो गया और तभी से उसका भाई ठीक था, खुश था और एक अच्छा जीवन कर रहा था ।

फिर भी, उसे अभी भी बहुत पीड़ा और अपराधबोध होता था कि वो उसकी पिटाई के लिये कुछ नहीं कर पाई थी ।

मैंने उसे बताया कि उसके पास उस समय कोई सहारा नहीं था – बताने के लिये कोई भी नहीं था, उसे सान्तवना देने के लिये कोई भी नहीं था ।

मैंने यह प्रस्ताव दिया कि, मान लिया जाये कि उसकी पीड़ा अभी भी मौजूद थी, मैं उसके साथ बैठकर अपनी बाजू उसके चारों ओर करता हूं ताकि उसे ये लगे कि जो सहारा उसके पास कभी नहीं था, वह उसके पास है ।

जैसे ही मैंने ये किया, उसने अत्यधिक गहरी पीड़ा से सुबकना शुरू कर दिया । वो हाँफने लगी तो मैंने उसे पकड़ा, और फिर उसने सांस ली । और, वर्तमान में रहते हुए उसने अपने रोने में अत्यधिक पीड़ा को महसूस किया ।

कुछ देर बार उसका रोना बंद हो गया, और वह स्थिर और चुप हो गई । मैंने उससे बात की ।

तब, वह बैठ गई और मेरी तरफ देखा । उसने कहा 'मैं अब तुम्हे कुछ देना चाहती हूँ' । मैंने उसमें एक बदलाव महसूस किया और अपने जोश में भी । मैंने कहा, मैं वह महसूस कर सकता हूँ, मुझे जोशीला महसूस हुआ । उसने बताया कि उसे भी अपने सारे शरीर में जोश महसूस हो रहा था ।

मैंने उससे पूछा कि वो मुझे क्या देना चाहती थी, लेकिन कुछ समय तक उसे कहने के लिये शब्द नहीं मिले । फिर उसने कहा 'मैं तुम्हारी आँखों को अपनी आँखों से चूमना चाहती हूँ' । मैं उसका खुलापन और हम दोनों के बीच उर्जा का प्रवाह महसूस कर पा रहा था । मैंने कहा, अब तुम अपने शरीर में हो, और एक संबंध के लिये तैयार हो । उसने सिर हिलाया ।

मैंने उसकी अपनी पहली भावना(अकड़न महसूस होना) को नहीं लिया, और न ही दूसरी (सामान्य तौर पर उसके शरीर में भावनाओं की कमी) भावना को लिया । मैंने उससे बातचीत की और तब तक इन्तजार किया जब तक कुछ और निकल कर नहीं आया, जो कि उसका पारिवारिक अधूरापन था ।

ऐसे आघात को देखने से उस पर बहुत गहरा प्रभाव पड़ा था, और इसके बावजूद कि उसके भाई ने अंतत: अपने जीवन को फिर से सुधार लिया था, वो अभी भी उसी पीड़ा और अपराधबोध के साथ चल रही थी । वो तब तक आगे नहीं बढ़ पा रही थी जब तक उसके दर्द को महसूस नहीं किया जा सकता था और उसे सहारा नहीं दिया जाता ।

ऐसे अनुभव को दे कर एक बहुत ही मजबूत ठीक होने वाले अनु्भव की शुरूआत हुई, जिससे कि वह तत्काल ही अपनी पीड़ा और अपराधबोध से छुटकारा पा सकी, और अपनी यौन-संबंधी भावनाओं के लिये उपलब्ध हुई ।


शुक्रवार, 8 अगस्त 2014

Case #29 - 29 गुस्से ाली छोटी सी बची को पालना

कैथी अपने पिता से नाराजगी का मुद्दा ले कर आई । मैंने पूछा उसे किस बात का गुस्सा था । उसने बताया कि जब वह 4 वर्ष की थी उसके पिता ने उसकी माँ को तलाक दे दिया था ।

मैंने उसकी पृष्ठभूमि की प्रकृति को परखा । वह बीस साल पहले हुआ था और तब से वह  अपने पिता से केवल 20 बार मिली थी । वह उसके बारे में बहुत कम जानती थी ।

उसे लगता था कि उसकी माँ पीड़ित व्यक्ति थी – उसके पिता का प्रेम-प्रसंग था, और फिर उसने दोबारा शादी कर ली थी ।

उसने अपने व्यस्क जीवन में उससे मिलने की कोई कोशिश नहीं की थी । मैंने पूछा क्यों तो उसने जवाब दिया कि पिछली बार जब वह अपनी दूसरी शादी से अपनी बेटी को साथ ले कर आया था तो उसका सौतेली बहन को प्यार करते देख कर मेरी को बहुत जलन महसूस हुई थी ।

मैंने उससे कहा कि मैं उसके माता-पिता के तलाक के मुद्दे पर, या उसके बारे में उसके गुस्से पर, काम नहीं करूँगा (क्योंकि वास्तव में यह उसके मुद्दों का केन्द्रबिंदु नहीं था) । इसके बजाय मैं उसके साथ केवल एक व्यस्क की तरह ही काम करना चाहता था और जानना चाहता कि वर्तमान समय में वह क्या करना चाहती थी ।

वो कुछ हिचकिचा रही थी, लेकिन मेरी सीमाएँ स्पष्ट थीँ ।

मैंने उसको अपने तलाक के बारे में एक कहानी सुनाई, और अपनी सबसे बड़ी बेटी, जब वह बड़ी हो चुकी थी, के साथ हुई बातचीत और जो गल्तफहमियाँ उसने पाल रखी थीं के बारे में बताया ।

मैंने उससे कहा कि मैं उसकी अपने पिता के साथ हुई बातचीत को जानने के लिये तैयार था परन्तु उसके साथ किसी असहाय, पीड़ित या अशक्त भूमिका में रहने के लिये तैयार नहीं था ।

उसे अपनी माँ की कहानियाँ विरासत में मिली थीं और वह उन्ही के रंग में रंगी हुई थी । एक व्यस्क होते हुए वह अपने विकल्पों का इस्तेमाल कर सकती थी और सीधे अपने पिता से उसकी तरफ की बात का पता लगा सकती थी । उसने अभी तक ऐसा नहीं किया था, इसलिये बजाय इसके कि मैं उसके भूतकाल को खोदूँ , मेरा विचार भविष्य की ओर धयान देने का था ।

इसके अलावा, जब हम इसके बारे में बात करते थे तो मेरी की आवाज और हाव-भाव छोटी बच्ची की तरह हो जाते थे । मैंने उससे कहा कि मैं समझता था, और मुझे उस दया आ रही थी, कि उसने अपने पिता का बहुत कुछ खोया था, लेकिन अब वो बीती बात हो चुकी थी और किसी प्रकार की चिकित्सा या अपने पिता के साथ बातचीत उन दिनों को वापिस नहीं ला सकती थी ।

जैसे भी हो, हमें इसी त्रासदी के साथ रहना था और यहीं से उसके लिये उपाय ढूँढना था । यह बहुत मुश्किल था लेकिन कुछ और करने से उसे उसी असहाय स्थिति में ही रहने के लिये ही मदद करते और उकसाते और वह हमेशा उस चीज को पाने की इच्छुक रहती जिसे उसने खो दिया था ।
कभी-कभी समानुभूति दिखाने से लोगों की सहायता हो जाती है परन्तु बाकी समय उन्हे एक स्पष्ट सीमा चाहिये होती है और हमेशा पीछे मुड़ कर देखने के बजाय आगे बढ़ने का रास्ता चाहिये होता  है ।  उसके अंदर की छोटी बच्ची के पास कोई विकल्प नहीं था, अपने पिता की तरफ जाने की हिम्मत नहीं थी ।

उसने बताया कि अगर उसने अपने पिता को बचपन में देखा होता तो उसे किस तरह से मारती । स्पष्ट रूप से वो गुस्सा थी और मैं इसे सामान्य स्तर पर ले कर आया । लेकिन उसके बारे में बताने के लिये उसे कोई और रास्ता नहीं मिला था, वह अभी भी वही छोटी क्रोधी बच्ची थी ।

इसलिये, मैंने एक प्रयोग का सुझाव दिया: कमरे में उस स्थान से शुरू करके, जिसे वह अपनी माँ का स्थान समझती थी,  कमरे में दूसरी तरफ अपने पिता की तरफ जाये । शायद अपने पिता के साथ बातचीत करने के लिये या फिर शायद उसके साथ खड़े होने के लिये ।

उसे यह सुझाव बड़ा चुनौतीपूर्ण लगा और वह बहुत डर गई थी । मैंने उसको प्रोत्साहित करने के लिये सब कुछ किया, लेकिन उसे विकल्प भी दिये । मैंने उसे बार-बार याद दिलाया कि वह 24 वर्ष की थी । मैंने उससे छोटी बच्ची की आवाज को त्यागने के लिये कहा, अपनी कमर को झुकाने के बजाय सीधे रखने के लिये कहा (उसने अपनी कमर में लगातार दर्द की शिकायत बताई थी) और उस दशा से व्यस्कता और दूसरे विकल्पों को आजमाने के लिये कहा ।

धीरे-धीरे वह प्रयोग के लिये मान गई । वह एक समय में एक कदम आगे बढ़ी, उसे हर कदम पर  सहारे की आवश्यकता होती थी जिससे वह गिर न जाय । अंतत: वह अपने पिता के स्थान पर पहुँची, और मैंने किसी को उसके पिता का किरदार निभाने के लिये कहा ।

उसे अपने पिता से बात करने में बहुत मुश्किल हो रही थी । इसलिये, मैंने उससे पूछा कि वह क्या महसूस कर रही थी, और उसे उन शब्दों में कहे जिनमें वह कह सकती थी । मैंने यह उसकी आधा दर्जन भावनाओं के लिये किया, इसलिये उसके पास कहने के लिये बहुत कुछ था । उसे अपने शब्दों को कहने के लिये और प्रोत्साहन देने की आवश्यकता थी । वास्तव में वह छोटी-छोटी  साँस की तेज आवाजें निकाल रही थी, जिन्हे पहचानने पर पता चला कि उनमें उसकी सौतेली बहन की तरफ ध्यान देने पर शिकायतें थीं ।

वह अपने पिता से प्रश्न पूछना चाहती थी, लेकिन मैंने उसे केवल अपनी बात कहने के लिये कहा । मैंने उसे सवालों की चालबाजी के बारे में बताया और उसे उन कारणों पर ले कर आया जिनसे वह अपने पिता के पास जाना चाहती थी ।

अंत में, उसने अपने पिता से बात की । उसे बताया कि वह उससे नाराज, चोट खाई हुई, थी और यह भी कि उसे उसको देख खुशी हुई थी । ज्यादातर उसने अपनी परेशानी के बारे में और अपने डर के बारे में बताया । प्रतिनिधि की प्रतिक्रिया थी कि उसे उस को देख कर खुशी हुई थी; और इसकी उसे उम्मीद नहीं थी ।

सारी प्रक्रिया उसके लिये बहुत मुश्किल थी । मुझे प्रयोग को आसान बनाने के लिये बहुत कुछ करना  पड़ा, जैसे कि यह एक चिकित्सा समूह है, वह उसके असली माता-पिता नहीं थे, और वह केवल एक लकड़ी के फर्श पर चल रही थी, इससे ज्यादा कुछ नहीं ।इसने उसकी भावुकता को थोड़ा कम किया । मैं हरेक कदम पर उसके साथ रहा, उसे सिखाते हुए, सहारा देते हुए और उसे अपने व्यस्क रूप में बने रहने के लिये चुनौती देते हुए ।

यह गेस्टाल्ट के 'सुरक्षित आपातकाल' का एक उदाहरण था, जिसमें हम उस सीमा में जाते हैं जो सामान्यतया बहुत मुश्किल होती है, फिर भी जितना भी सहारा दे पायें उससे यह करना आवश्यक
है ।

यह व्यक्ति को एक नया अनुभव लेने देता है ।

परन्तु ऐसे प्रयोग निर्देशात्मक नही होते और आसामियों को नये 'चाहनाओं' में इन्हे इस्तेमाल न करने के लिये प्रोत्साहित किया जाता है, लेकिन इसके बजाय इन्हे जागरूकता लाने और विकल्प खोजने के रूप में देखने के लिये कहा जाता है ।  




बुधवार, 6 अगस्त 2014

Case #28 - 28 बोलने वाली पैंट

नैन्सी ने बहुत सारे मुद्दे बताये । उसे लगता था कि विश्वसनीयता और उसके व्यवहार में एक अंतर था। पहली शादी से उसके एक बच्चा था; उस संबंध में बहुत ही कम वास्तविकता थी, क्योंकि वह कभी-कभी ही साथ रहते थे ।

उसने अपनी दूसरी शादी के बारे में बात की, बहुत से गर्भपात करवाये, तब उसका पति दूसरा बच्चा चाहता था लेकिन वास्तव में वो नहीं चाहती थी । उसने बताया कि वह अपने दूसरे पति के साथ बहुत खुश थी, लेकिन कभी-कभी कार्यशालाओं में अपनी हाजिरी उससे छुपाती थी । उसने बताया कि वह शारीरिक रूप से मजबूत नहीं थी और उस अवस्था को बदलना चाहती थी ।

मैंने बताया कि एक मुद्दा दूसरे मुद्दे की तरफ ले जाता है, और इसलिये किसी भी मुद्दे पर गहराई से केन्द्रित होने में मुश्किल होती है । दर-असल, उसने कहा कि अन्य चिकित्सकों को उस पर भरोसा करने में मुश्किल हुई थी ।

मैंने उससे पूछा कि वो मुझसे क्या चाहती थी । उंसने उत्तर दिया कि वो बचना चाहती थी । मैंने उसे बताया कि मुझमें कुछ ऐसा है जिससे उसे बचा कर मुझे खुशी होगी, लेकिन मैं अभी तक ठीक से कर नहीं पा रहा था; तथा दूसरी तरफ मुझमे कुछ ऐसा भी था जो उसे सशक्त बनाना चाहता था, लेकिन वह भी ठीक तरह से नहीं हो पा रहा था ।

सत्र की शुरूआत में मैंने उसकी पैंट देखी – एक रंगबिरंगी और जटिल नमूने की । मैंने उसे कई बार देखा । मैंने उसका मुँह भी देखा । उस पर बहुत तरह के भाव थे, और वो कभी-कभी अपने होंठ भी चबाती थी, या फिर अपने दाँत एक खास तरीके से दिखाती थी । मैंने उन दोनों चीजों पर टिप्पणी की । उसे अपने मुँह के बारे में कुछ पता नहीं था, और अपनी पैंट में उसे कोई रुचि नहीँ थी । कुछ और बातचीत के बाद, मैं दोबारा उसकी पैंट पर गया, और सुझाव दिया कि शायद पैंट हमारी सहायता करे कि हमें किन मुद्दों पर काम करना था ।   

मैंने उससे पूछा कि इन चीजों का कौन सा पहलू वो वास्तव में पसन्द करती थी । उसने अपने टखने के आसपास एक छोटा सा हिस्सा दिखाया और तीन रंगों की तरफ इशारा करते हुए बताया कि वह गर्म और ठंडे भाव के थे ।

इसलिये, मैंने उससे कहा कि वह हरेक रंग बन कर अपने बारे में बताये । उसने अपने आप को एक गर्म, हंसमुख, उत्साही और चमकीला व्यक्ति बताया । फिर स्वयं को एक शांत, विचारशील व्यक्ति बताया जो अकेला रहना पसन्द करता था । फिर उसने स्वयँ को एक भावहीन, स्वार्थी, विवेकशील व्यक्ति बताया ।

मैंने सबके बारे में एक-एक करके अपनी प्रतिक्रिया बताई । जब मैं आखिरी वाले भाग पर पहुँचा, तो वो एकदम से प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुए पहले ही बोली कि यह वाला भाग ठीक नहीं था, और इसके लिये उसने अपने-आप को ही दोषी ठहराया । इससे यह पता चला कि बहुत कुछ चाहती थी जिससे कि वो वाला भाग गल्त हो गया था । मैंने उससे पूछा कि वो कहाँ से आये थे – उसकी माँ से । इसलिये, हमने उसकी माँ के लिये एक तकिया लगाया, और उसने अपनी माँ से बात की, अपना संबंध बताया, लेकिन अपनी चाहने वाली सूची की सीमाएँ भी बताईँ ।

फिर उसकी पहले वाली सास थी, जो कुछ मायनों में 'आदर्श' थी, लेकिन वह उससे बहुत कुछ चाहती  थी । मैंने उसको कहा कि वो अपनी सास को तकिये के ऊपर रखे, और फिर दोबारा उसने अपना संबंध बताया, लेकिन अपनी सीमाएँ भी ।

मैं हर बार उसके भावहीन/स्वार्थी भाग की तरफ आता था, उसे प्रमाणित करने की कोशिश में । हर बार वह उसे त्यागना शुरू कर देती थी । मैं उससे पूछता था कि क्या वह अपनी चाहना को स्वयं पर काबू करने देना चाहती थी, और वह उत्तर देती थी 'नहीं' ।

अंत में, जब मैंने उसे अपनी स्वार्थपरता के बारे में बताया, तो उसने मुझे सुनना शुरू कर दिया । मैंने उससे कहा कि अगर मैं अपने काम वाले/व्यापारिक रूप में था, या मैं बहुत ही स्थिर महसूस कर रहा था, तो मैं सहज रूप से उसके इस भाग के साथ हो सकता था । या, फिर मैं भी अपने भावहीन/स्वार्थी रुप में था तो मैं भी इसके साथ ठीक ही रहूँगा । लेकिन अगर मैं खुद को कमजोर या जरूरतमंद महसूस कर रहा था, तो मुझे इससे चोट पहुँच सकती थी ।

वो मुझे बिना किसी सहमति के सुन पा रही थी, और मेरी जानकारी में उसे जज्ब कर रही थी ।
उसने कहा 'लेकिन यह वह हिस्सा है जिसे मैं बदलना चाहती हूँ, क्योंकि मैं लोगों को चोट पहुँचा सकती हूँ' । मैंने उत्तर दिया 'मुझे इसमें ज्यादा रुचि है कि तुम ये मान लो कि वास्तव में यह तुम्हारा ही एक हिस्सा है, जब तुम उस स्थान पर होती हो – और यह मुझे तुम्हारे बारे में सुरक्षा की भावना देता है' ।

वो समझ गई थी कि इस भाग से छुटकारा पाना, या इसमें सुधार लाना, संभव नहीं था, बस उसके अस्तित्व को केवल मानना था ।

इस सत्र को शुरू करने में बहुत मुश्किल हुई थी । हर बार जब वो स्पष्ट रुप से शुरुआत करती थी, तो उसका ध्यान बदल जाता था । यह अपने-आप में ही धयान देने योग्य था – उसका ध्यान  बदलना । मैंने उस पर धयान नहीं दिया, क्योंकि हमारे बीच समुचित संबंध नहीं था । मैंने थोड़ा बचाने की संभावना वाला किरदार निभाया, लेकिन  उस रास्ते पर आगे न बढ़ने का निर्णय लिया, क्योंकि उस पर पकड़ नहीं बन पा रही थी । इसलिये, स्पष्ट विषय-वस्तु ढूँढने के लिये चूहा और बिल्ली का खेल खेलने के बजाय मैं उस वस्तु पर लौट आया जो मेरे लिये दृष्टा थी – पैंट । ये तथ्य कि उसके लिये वह कोई महत्व नहीं रखता था,हम उसमें से कुछ ऐसा ढूँढ सकते थे जो उजागर हो, उसके किसी भी आकृति के बारे में बताने के विरोध के बावजूद । सीधे-सीधे उसने अपने तीन महत्वपूर्ण हिस्सों का नाम लिया ।

फिर मैंने उनकी संबंधों के परिप्रेक्ष्य में जाँच की – हरेक के बारे में अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त की ।

उसका विरोध तीसरे भाग के बारे में उभर कर आया और उसने स्पष्टत: उस काम की ओर इशारा किया जो करना था : उसकी चाहनाओं और उनके कारणों से निपटना ।

ये करने के बाद, वो अपने उस भाग को मेरे साथ अपने संबंध में और अपने साथ स्वयँ के संबंध में ला सकी ।

इसका नतीजा वही था जिसके पीछे हम गेस्टाल्ट प्रक्रिया में है : एकीकरण

शनिवार, 2 अगस्त 2014

Case #27 - 27 नैतिक शुद्धता

जाह्न एक छोटी सी कंपनी चलाता था । उसकी चिंता यह थी कि वह नैतिक रूप से बहुत ही ईमानदार व्यक्ति था । बाजार में, जहाँ कुछ भी चलता है, उसके बड़े पक्के नियम थे और वह उन पर कायम रहता था । वह अपने परिवार के साथ भी ऐसा ही था – अपने कर्तव्यों को गंभीरता से लेता था, अपने माता-पिता की इज्जत करता था और परम्परा पर चलता था ।

फिर भी उसे भारी-भारी और दबाव सा लगता था और वह अपने से प्रश्न करता था कि शायद नैतिक शुद्धता अच्छी चीज नहीं थी, या फिर वास्तव में उसका व्यापार बैठ सकता था क्योंकि वह वैसी बेईमान तरकीबें नहीं अपनाना चाहता था जो उसके प्रतिस्पर्धी अपनाते थे (जैसे कि उद्योग संबंधी जासूसी) । मैंने पहले उन तरीकों के गुण पहचानने चाहे जिन तरीकों से वह इस संसार में रहना चाहता था, लेकिन उस पर कोई असर नहीं पड़ा । उसको यह चिंता थी कि वास्तविक संसार में इससे उसको कुछ नहीं मिलेगा लेकिन साथ ही साथ वह अपने सख्त नैतिक ढांचे पर कायम रहना चाहता था ।

इसलिये मैंने उसे दो विरोधी चीजें बताने के लिये कहा – इतिहास में से ऐसा किरदार जो नैतिक रूप से ईमानदार आदमी को दर्शाता था और फिर कोई ऐसा किरदार जिसके लिये 'सब चलता है' ।

उसने दो को चुना और मैंने उससे कहा कि वह बारी-बारी उनका स्थान ले और उनसे संवाद करे । उसे यह बहुत ही मुश्किल लगा और बार-बार किरदार से बाहर आना चाहता रहा । उसने पूछा 'क्या मैं दोनों को एक कर सकता हूँ ?' लेकिन एकीकरण इतनी आसानी से नहीं होता ।

जब वह अपने ईमानदार किरदार को निभा रहा था तो उसने बताया कि वह चीनी होने की गहरी और लम्बी परम्परा का अनुसरण कर रहा था जबकि दूसरे किरदार में वह उन मूल्यों के साथ समझौता कर रहा था । इसलिये यह स्पष्ट था कि परम्परा को मानने में उसके महत्व की सीमा चीनी सभ्यता का गहन सदाचार मूल्य थे ।

इसलिये, मैंने ये सुझाव दिया कि वह दोनों किरदारों से बाहर आये और अपनी सीट पर बैठ कर दोनों किरदारों से बात करे । उसने परम्परा को स्वीकार किया और फिर यह भी स्वीकार किया कि शायद वह दूसरे पक्ष से कुछ काम का सीख सके ।

यह उसके लिये बहुत बड़ा कदम था ।

मैंने उसे यह सुझाव दिया कि वह एक सम्राट के समान है जिसके एक के बजाय दो सलाहकार थे पर अंतिम निर्णय उसका अपना था ।यह सुनकर उसने काफी अच्छा महसूस किया और अपने नये 'सलाहकार' की कीमत को जान पाया ।

उसने बताया कि उसके व्यक्तिगत जीवन में इसका एक पहलू था, जहाँ वो चीजों को इतनी गंभीरता से लिया कि उसे कभी यह महसूस नहीं हुआ कि उसे कभी छुट्टी मिली थी ।
इसलिये हमने दो और सलाहकार बनाये, एक वह जो उसे उसकी जिम्मेदारियों की याद दिलाये और दूसरा वह जो धृष्ट, गैर-जिम्मेदार और मस्ती करने वाला हो ।

एक बार फिर उसने दो सलाहकार पा कर राहत महसूस की लेकिन अंतिम निर्णय लेने के लिये वही सक्षम था । मैंने उसे मस्ती करने वाले किरदार में एक वास्तविक व्यक्ति के बारे में बताने के लिये कहा। उसने अपने चचेरे भाई के बारे में बताया । पिछली बार उसने अपने चचेरे भाई को नकारात्मक रूप में देखा था, अब वह उसे प्रशंसनीय रूप में देख सकता था, और उसके साथ समय व्यतीत करने के बारे में भी सोच सकता था ।

हमने गेस्टाल्ट के दिशानिर्देश, जो यह मानते हैं कि हरेक गुण के लिये एक विपरीत गुण भी होता है, विरोधाभासों के लिये प्रयोग किये । किसी एक ही पक्ष के साथ चलने से आदमी बंट जाता है । गेस्टाल्ट की दिशा एकीकरण की ओर है, जो एक वास्तविक प्रक्रिया से होनी चाहिये जिसमें दोनों पक्षों के साथ सम्पर्क हो, बजाये इसके कि इसे बौद्धिक तरीके से समझाया जाये ।

उसके लिये प्रयोग का प्रचलित तरीका सहज नहीं था (सीधा संवाद), इसलिये आसामी की स्वेच्छा से और उसकी जानकारी देने पर हमें हमेशा ही उसी स्थान पर प्रयोग को बदलने के लिये लचीले रूप से तैयार रहने की आवश्यकता है ।

रविवार, 27 जुलाई 2014

Case #26 - 26 देना और लेना

ट्रेसी अकेले ही घूमना पसन्द करती थी । उसे एक स्वतंत्र औरत की तरह रहना पसन्द था । अपने घर कुछ हफ्तों में कुछ दिनों के लिये ही जाती थी, और उसे यह ठीक लगता था । शहर में उसका अपना घर था । उसने कहा यह उसके पति को यह ठीक लगता था क्योंकि उसका स्तर ऊँचा था, और निश्चय ही उनके बीच बहस होगी ।

उसे लगता था कि उसका जीवन उसका अपना था । और, अब चूंकि उसका बेटा बड़ा हो चुका था, उसे पारिवारिक जिम्मेदारियों को निभाने की जरूरत नहीं थी । वह अपनी जीवनशैली और अपने काम से प्यार करती थी ।

फिर भी, उसकी चिंता ये थी कि जब वो घर में होती थी तो कुछ समय बाद उसे घबराहट होने लगती थी ।

गहराई से जानने के लिये, मैंने उससे उसके माता-पिता के बारे में पूछा । जब वो बड़ी हो रही थी, उसको कुछ हद तक स्वतंत्रता मिली हुई थी – उसकी माँ काफी सारे बच्चों में व्यस्त रहती थी – उसके पिता उसके साथ लड़कों जैसा व्यवहार करते थे और उसे कुछ विशेषाधिकार दे रखे थे – हालांकि वो उससे प्यार भी करते थे । फिर भी, जब उस पर ध्यान दिया जाता था तो ये ध्यान कुछ कर दिखाने के लिये होता था, या फिर एक अच्छा बच्चा बनने के लिये । इस सब की जड़ में यह था कि या तो यह हो या वह हो । या तो उस पर ध्यान दिया जाता था या वह स्वतन्त्र होती थी । लेकिन इसके बीच का कोई रास्ता नहीं था ।

उसके बाद, मैंने यह जानने के लिये कि उसके पति के साथ यह कैसा था, एक प्रयोग का सुझाव दिया ।

हम एक-दूसरे के सामने खड़े हुए । मुड़े हुए हाथ ऊपर करने का अर्थ था कि ध्यान आकर्षित करना चाहते थे । हाथ पीछे की तरफ करने का अर्थ था स्वतन्त्रता चाहते थे ।

वह एकदम से परेशान हो गई । उसने कहा वह ध्यान आकर्षित करने की मुद्रा में नहीं रहना चाहती थी । इससे उस पर बहुत दबाव पड़ता था और वह घबरा जाती थी ।

मैंने उससे पूछा कि वो स्वयँ कितनी बार महसूस करती थी कि उसे उस मुद्रा में रहना चाहिये, स्वाभाविकत: अपने पति के साथ । उसने कहा उसे जितनी उसके पास  स्वतन्त्रता थी उससे ज्यादा स्वतन्त्रता चाहिये थी । मैंने पूछा बिना किसी कर्तव्य पालन की जिम्मेदारी के कितनी बार । उसने कहा- साल में दो बार अपने घर पर और बाकी समय उसका अपना हो ।

मेरे संबंध का यह नमूना नहीं था, लेकिन मैं यह स्वीकार कर सकता था कि यह नमूना उसका होगा।
इसलिये, इस आधार पर हम आगे बढ़े । वह ध्यान आकर्षित कराने की मुद्रा में थोड़ी देर ही रहना चाहती थी । फिर उसके बाद स्वतन्त्रता पाने की मुद्रा में चली गई । उसने कहा कि उसको ध्यान आकर्षित करने की मुद्रा में बड़ा असुविधाजनक लगता था ।

इसलिये, मैंने स्थिति को उल्टा कर दिया । मैंने पति का किरदार निभाया और हाथों को ध्यान आकर्षित करने की मुद्रा में ले आया । उसने एकदम बड़े जोर से पीछे हटना शुरू कर दिया । उसे बहुत गुस्सा आया । उसको लगा जब भी वह अपने पति के साथ होती थी तो वह उससे कुछ न कुछ चाहता था, और यह कि वह हमेशा ही उसको देती आई थी पर उसे कभी कुछ वापिस नहीं मिला   था । इसलिये, उसका गुस्सा उभर कर आया और यह घटनाचक्र स्पष्ट हो गया । वो दूर हुई, उसकी जरूरतें और बढ़ गईं, वह और दूर हो गई, इत्यादि ।

इसलिये, मैंने ये सुझाव दिया कि हम हाथ खड़े करने की एक और मुद्रा अपने प्रयोग में जोड़ लें : देने वाली मुद्रा । स्पष्ट रुप से उसके पास देने के लिये कुछ और नहीं था । लेकिन मैंने उसके पति के रूप में देने वाली मुद्रा अपना ली और उसे कहा कि वह ध्यान आकर्षित करने वाली/प्राप्त करने वाली मुद्रा में आ जाये ।

इससे भी उसको बहुत 'शिकायत' हुई । उसे लगता था कि वास्तव में उसने अपने पति से कुछ पाया नहीं, और उसे केवल देते हुए ही काफी साल बीत गये थे ।

फिर भी, मैंने उसे वर्तमान में आने के लिये कहा और एक बार अपना गुस्सा दिखा कर उस मुद्रा का अनुभव करे जिसमें दिया जा रहा हो । वह मान गई और लेने करने से उस पर बहुत गहरा प्रभाव पड़ा । परन्तु, वह फिर असहज महसूस करने लगी – लेने की कीमत उसे देकर चुकानी पड़ेगी, जिससे वह डरती थी ।

इसलिये, इस घटनाचक्र का गहरा पक्ष उजागर हो गया ।

इसलिये, मैंने उसे एक बार प्राप्त करने और एक बार देने के लिये कहा । मैं उसे दूँगा और वह लेगी, और जैसे ही वह असहज महसूस करेगी, हम मुद्रा को बदल लेंगें । वह अपना उधार चुकाने के लिये मुझे वापस दे सकती थी (और मैं प्राप्त करूँगा) । लेकिन तब तक ही जब तक वह सहज रह सकती थी ।

उसकी गति बहुत तेज थी, एक मुद्रा में वह केवल कुछ ही सैकेंड के लिये रहती थी । परन्तु, इससे वह बहुत ही सहज महसूस कर रही थी, और उसे लगा कि हम एक ही मुद्रा में जरूरत से ज्यादा नहीं रहे ।

यह अनु्भव उसके लिये गहरी पैनी दृष्टि वाला था, और इसने उसे वो अनुभव दिया जिसके लिये वह इच्छुक थी पर उसने उम्मीद पूरी तरह से छोड़ दी थी ।

इसका महत्व यह नहीं था कि यह स्थिति के लिये 'ठीक' था या स्थिति का 'इलाज' था, बल्कि यह जागरुकता को खोजने के लिये था, जिसने उसमें एक बड़ी गहरी जागरुकता उत्पन्न की, उसका संदर्भ, उसका घटनाचक्र में भाग लेना, तथा उसे एक नया अनुभव भी प्रदान किया ।

ऐसे नये अनुभव जो गेस्टाल्ट प्रयोगों से निकल कर आते हैं उपाय नहीं हैं, लेकिन एक आदमी के संसार को बड़ा करते हैं, और कुछ करने के लिये शुरुआत का एक नया बिंदु प्रदान करते हैं ।

जब वातावरण से कुछ नहीं मिलता तो वह एक ठीक होने का अनुभव भी प्रदान करते हैं ।

प्रक्रिया की शुरूआत पृष्ठभूमि के संदर्भ से हुई थी । एक बार वह स्पष्ट हो गया तो हम अभी और यहीं के प्रयोग पर आ गये । इसके लिये उसे यह लगना चाहिये था कि यह किसी 'चाहने वाली चीज' के द्वारा व्यवस्थित नहीं किया गया था, लेकिन वास्तव में यह उसकी लय के बारे में था ।

उसमें स्वयँ भाग ले कर मैं जहाँ वह थी, उसे क्या आवश्यकता थी, उससे तालमेल बिठा सकता था और उसकी व्यवस्था पर एक सीधी आनुभविक पैनी दृष्टि डाल सकता था ।

इसका ये अर्थ भी था कि मैं नये तरीकों से प्रतिक्रिया कर सकता था । मैंने प्रयोग में बदलाव ला कर 'देने' की तीसरी मुद्रा भी जोड़ दी थी, क्योंकि यह स्पष्टत: अनुपस्थित थी, फिर भी बहुत ही महत्वपूर्ण तत्व थी । इसने उसको किसी के द्वारा बिना अधिक कीमत के दिये जाने का अनुभव भी लेने दिया।  

शुक्रवार, 25 जुलाई 2014

Case #25 - 25 10,000 तीर

मेरी का दो बार तलाक हो चुका था और अब वो फिर अपने पिछले पति के साथ रह रही थी, जो उसके बेटे का पिता था ।
मैंने उससे जीवन के सफर के बारे में पूछा ।
दोनों एक साथ एक व्यापार करते थे लेकिन वो एक दृष्टिकोण पर सहमत नहीं होतेथे । समय के साथ वह उसके साथ हिंसक होता गया था । यह काफी वर्षों तक चलता रहा ।
फिर उसने उससे तलाक माँगा, और उसके बाद एक कर्मचारी, जो उनके व्यापार में काम करता थी, के साथ संबंध बनाना चाहा ।
उस औरत द्वारा नकार दिये जाने के बाद उसने मेरी से दोबारा विवाह करने के लिये कहा, जिसे उसने मान लिया। पर उसका उसको मारना जारी रहा ।
अंत में, बहुत वर्षों बाद जब हिंसा हद से बढ़ गई तो उसने उसे तलाक दे दिया ।
कुछ वर्षों के बाद उन्होने फिर साथ रहना शुरू कर दिया, इस बार बिना किसी हिंसा के, और वह अब अपने संबंध को संतोषजनक बताती है, और अब वह उसके साथ नाखुश नहीं है ।
फिर भी, यह बताते हुए उसे बहुत पीड़ा महसूस हुई थी।
मैंने उससे पूछा कि वो बची कैसे रही; उसको अपनी माँ और दादी के बारे में याद आया कि उनको किस तरह का जीवन व्यतीत करना पड़ा था (बिना हिंसा के ) ।
मैंने उससे पूछा कि उसे क्या महसूस हो रहा था। उसका उत्तर था 'जैसे मेरे ह्रदय में 10,000 तीर  हैं' ।
मैंने इस बात को समझा कि वो इसके बजाय कि दूसरों को दर्द दे, दर्द को अपने अंदर छुपा कर रखती है, लेकिन मैंने उस पर इसके प्रभाव के लिये चिंता जताई ।
मैंने उससे पूछा कि मेरे साथ, जो कि एक आदमी है, बात करते हुए उसे कैसा लगता था – उसने कहा कि वो सुरक्षित महसूस कर रही थी ।
मैंने उससे कहा कि एक आदमी ने वो तीर उसको चुभाये थे, इसलिये एक आदमी हो कर मैं उन्हे निकालने में उसकी सहायता करना चाहता था ।  
मैंने ऐसा किया, 'तीर' को जमीन पर लिटा कर, इस बात को माना कि वह किस तरह बुरी तरह घायल हुई होगी ।
मैंने यह जाँचा कि उसको कैसा लग रहा था: उसने बताया कि उसे पीड़ा महसूस हो रही थी, लेकिन अंदर तक द्रवित भी महसूस कर रही थी, और थोड़ा आराम भी लग रहा था ।
इसलिये मैंने इस प्रक्रिया को दो बार दोहराया, हर दफा उसके अनुभव के अलग पक्ष को देखा ।
उसको थोड़ी राहत महसूस हुई, लेकिन उसको अपने हाथ कुछ सुन्न भी होते हुए लगे । इससे यह पता चलता था कि उसने काफी कर लिया था । अंत में, मैंने यह सुझाव दिया कि हम उसके चुनाव के अनुसार तीन तीरों से ये पद्धति करते हैं । उसने तीरों को जमीन के अन्दर गाड़ने वाली पद्धति को चुना ।
इसलिये मैंने उसको एक काल्पनिक कहानी सुनाई जिसमें हम दोनो तीरों को गाड़ने के लिये एक जंगल में जा रहे थे और ये मान कर कि तीर जमीन में गाड़े जा चुके थे हम उन्हे गड़ा हुआ ही छोड़ देते हैं ।
अंत में उसको हल्केपन का और उस जगह पर देखे और सुने जाने का अनुभव हुआ ।
मैंने उससे कहा कि यही काम वह घर पर करे और तीन और तीरों के साथ इस प्रक्रिया को अपने दिमाग में दिन में एक बार करके उन्हे गाड़ने की पद्धति अपनाये ।
इस प्रक्रिया में मैंने संदर्भ को अच्छी तरह से समझने के लिये उसकी पृष्ठभूमि का ढाँचा बनाया । फिर मैंने उसको ठीक करने के लिये अपने आदमी होने को इस्तेमाल किया । मैं इस बात को जाँचते हुए कि हर कदम पर उसे कैसा लग रहा था, धीरे-धीरे आगे बढ़ा और उसे काफी विकल्प दिये ।
मैंने उसके बताये गये तीरों के लक्षण को गंभीरता से लेते हुए उसे ठीक करने का कार्य प्रारंभ किया । महत्वपूर्ण कारक तीरों की संख्या को निकालना नहीं था, या फिर दर्द का स्थायी तौर पर निवारण करना नहीं था, लेकिन वास्तव में जो हमने शुरूआत की थी उससे ये अंतर पड़ा था कि उसे  यह रास्ता मिल गया था कि वह स्वयँ इसका सामना कर सकती थी ।
यहाँ पर गेस्टाल्ट प्रयोग सीधे तथ्यों से और जो शब्द उसने प्रयोग किये थे से बनाया गया था और यह मूलत: हमारे बीच स्थापित हुए संबंध के कारण काम कर गया ।

सोमवार, 21 जुलाई 2014

Case #24 - 24 छोड़ा हुआ बच्चा

सत्र की शुरुआत में मैंने कुछ समय जेन के साथ जुड़ने में व्यतीत किया । मैंने देखा उसने पीले/सोने के रंग का टाप पहना हुआ था । उसने कहा कि उसे भड़कीले रंग अच्छे लगते हैं, वो जोश लाते हैं जिससे उदासी से निपटने में सहायता मिलती है । जेन ने बताया कि कैसे वो उत्साही और तेज लोगों के बीच रहना पसन्द करती है; अगर वो ऐसे लोग नहीं हैं उसे उनमें कोई रुचि नहीं होती ।
मैंने उससे पूछा कि वह किसके साथ काम करना चाहती थी - उसने बताया कि व्यापार, पिता और प्रेमी । मैंने उसको एक को चुनने के लिये कहा और उसने व्यापार को चुना ।
व्यक्ति कुछ भी चुने वो ठीक है, और वह अपने लक्ष्य के बहुत करीब हो सकता है ।
मैंने उससे पूछा दर-असल मुद्दा क्या था – उसने कहा कि वह आत्मकेन्द्रित है और जो उसे चाहिये उसके पीछे लग जाती है, बिना दूसरों की परवाह किये ।
मैंने व्यापार में इसके सकारात्मक पक्ष को स्वीकार किया और समझ में आया कि कैसे यह दूसरों को अखर सकती है ।
फिर उसने खु्लासा किया कि उसे बहुत इच्छा है कि दूसरों से सम्मान मिले, और ये कि वास्तव में उसे गोद लिया गया था । उसके अपने माता-पिता ने उसको एक पुल के नीचे छोड़ दिया था ।
इसने मेरे लिये चीजों को महत्वपूर्ण ढंग से बदल दिया । ऐसे महत्वपूर्ण और मुश्किल पड़ाव के खुलासे का ये मतलब है कि वो मुझ पर व्यक्तिगत और ह्रदय के अंदर की बातों के लिये भरोसा कर रही है । इसको सिर्फ उसके बारे में कुछ उपयोगी और उपयुक्त सूचना समझने और उसके आत्मकेन्द्रित होने के संदर्भ में लेने के बजाय, मैंने इसे उसकी सम्माम पाने की इच्छा, जो उसने कहा था कि जिसकी उसे जरूरत है, एक गहरी अन्तर्वेदना के रुप में लिया ।
मैंने फिर उसके उत्साह की आवश्यकता को भी  समझ लिया ।
मैंने उससे पूछा कि वो क्या महसूस कर रही थी लेकिन वो कुछ भी बता नहीं पाई । इसके अलावा ऐयर कंडिनशर के कारण उसकी टाँगे भी ठंडी पड़ रहीं थी ।
इसलिये मैंने उससे संबंध में ठंडेपन के बारे में पूछा, और उसे बताया कि जो वह संबंध में चाहती थी, वह उसमें पाये गये उत्साह के विरुद्ध था ।
लेकिन मैं इस बारे में बात करके समय व्यतीत नहीं करना चाहता था । मैंने उससे पूछा कि वो पुल के नीचे कब तक पड़ी रही । वो नहीं जानती थी, इसलिये मैंने उसे अनुमान लगाने के लिये कहा । उसके विचार में एक दिन के लिये ।
स्पष्टत:, उस समय के दौरान वो ठंडी पड़ गई होगी ।
इसलिये, उससे उसके साथ हुई उस कटु घटना के बारे जान कर, मैं यह सुनिश्चित करना चाहता था कि कुछ अलग ही हुआ हो । मैंने उससे पूछा कि क्या मैं उसके पास आ सकता था और क्या वो अपना सिर मेरे कंधे पर रख सकती थी ।
उसने कहा, हाँ, और यही वो चीज थी जिसके लिये वो तड़प रही थी ।
इसलिये, हमने ऐसा ही किया और मैंने उससे साँस लेकर अपने अंदर जो भी गर्मी ले सकती थी लेने के लिये कहा । इसके लिये कुछ समय लगा; कुछ समय के लिये वो ऐसा नहीं कर पाई । लेकिन फिर उसने शुरू किया; उसका साँस जल्दी-जल्दी चलने लगा, शिशुओं की तरह । अंत में वो धीमी पड़ी; मैंने उससे पूछा वो क्या महसूस कर रही थी । उसने कहा, गर्म लेकिन उसकी टाँगें अभी तक ठंडी थी । इसलिये मैंने उन्हे कपड़े से ढक दिया, और हम आगे बढ़ते रहे । उसने बताया कि उसके पेट में से आवाजें आ रही हैं । मैंने उससे उसके अनुभव के बारे में पूछा, उसने कहा कि वो अपना वजन घटाने की कोशिश कर रही थी और उसे भूखे रह पाने की कोशिश में बड़ी मुश्किल हो रही   थी ।
स्पष्टत:, यह उसकी भावात्मक सौहार्द की भूख थी । इसलिये मैंने उसके पेट पर हाथ रख कर उस सौहार्द में साँस लेने के लिये कहा ।
हमने यह कुछ अधिक देर के लिये किया और उसे चेतावनी देते हुए मैं पीछे हट गया ।
उसने बताया कि वह बहुत सारी कार्यशालाओं में गई थी पर उसके मुद्दों पर ऐसी प्रतिक्रिया कहीं नहीं मिली थी ।
गेस्टाल्ट की प्रक्रिया अभी और यहाँ का संबंध तथा उसके कार्यक्षेत्र का संदर्भ, तथा उसमें क्या अनुपस्थित है, द्वारा निदेशित है । उसने जिस बारे में भी बात की थी, वो सब एक साथ पता चल गये – मान्यता की आवश्यकता, सौहार्द की इच्छा, उसकी भूख और अधिक खाना, उसका अपने हित को बचा पाना ।
इसलिये मैंने उसको बहुत गहराई से मान्यता प्रदान की जो मैं कर सकता था, ज्यादातर गैर-संवादी, और स्पर्श के स्तर पर; क्योंकि शिशु के साथ संवाद ज्यादातर गैर-संवादी स्पर्शिय स्तर पर ही होता है ।
सुविधाजनक काम इलाज में उपयोगी हो सकता है, लेकिन सबसे गहरा बदलाव संबंध के माधयम से ही आता है । आसामी की संबंधात्मक जरूरतों के अनुकूल बनना एक मुख्य उपाय है, और फिर एक ऐसा तरीका निकालना, जिससे उन आवश्यकताओं की पूर्ति हो, एक बहुत गहरे प्रभाव के रुप में परिलक्षित होता है।

शुक्रवार, 18 जुलाई 2014

Case #23 - 23 शराबी पिता

मैरी के अपने पिता को लेकर बहुत सारे मुद्दे थे ।
मैंने पहले उसके साथ जुड़ने के लिये कुछ समय व्यतीत किया । मैं उसे बताता हूँ कि मुझे उसके बारे में क्या अनुभव हुआ – उत्साही, स्पष्ट, और मेरे प्रत्युत्तर में उसमें गर्मजोशी है ।
मैं उससे पूछता हूँ कि मेरे बारे में उसका अनुभव क्या रहा । वो सहज महसूस करती है, सोचती है कि मैं मित्रवत हूँ ।
मैंने उससे उसके पिता के बीच अंतर और समानताएँ बताने के लिये कहा ।
अंतर हैँ : वह उसके पैसा खर्च करने पर आलोचना करते था, वह समय-समय पर बहुत शराब पीते था, और उसे उसके बारे में चिंता होती है, जो वह उनको बताती है ।
समानताएँ थीं : वह उसको बहुत सहयोग देते था और उसे प्रोत्साहन देते था ।
वह बताती है कि उसकी माँ उस पर बहुत भरोसा करती है, उसके पिता के बारे में उससे शिकायत करती है और उसके द्वारा दिये गये कष्टों को उसे बताती है ।
मैंने उससे कहा कि उसके शरीर में जो भावनाएँ थीं, उनको पहचाने । उसे छाती में कुछ अटका हुआ लगता है, पीठ में तनाव महसूस होता है और पेट में कुछ कसाव लगता है । हम कुछ समय व्यतीत करते हैं जबकि वह इनमें साँस लेती है । तब मैं अपने-आप को उसके पिता की तरह पेश करता हूँ, कल्पना करता हूँ कि वो क्या कह सकता है ।
उसके पिता का किरदार करते हुए मैं कहता हूँ :
'मैं चाहता हूँ कि तुम पीछे हटो, जो चुनाव मैंने अपने जीवन में किये था वो मेरा अपना निर्णय है । तुम्हे अपना जीवन स्वयँ ही चलाना है । '
'मैं तुम्हे ये समझाना चाहता हूँ कि तुम्हारी माँ और मैं अपने तरीके से चीजों को सुलझायेंगे । कृपया हमारे संबंध के बारे में चिंता मत करो।'
-'अगर तुम्हारी माँ मेरे बारे में तुमसे शिकायत करती है तो मैं चाहता हूँ कि तुम उस पर धयान न दो और उससे कहो कि तुम इस बारे में सुनना नहीं चाहती हो'
इन वाक्यों के बाद मैं उससे पूछता हूँ कि उसे क्या महसूस होता है, वो बताती है कि उसे राहत महसूस हो रही है ।
अंत में मैं उससे राहत और सहजता की भावना के साथ भरपूर साँस लेने के लिये कहता हूँ ।
वह उसके संबंध में दूसरा मुद्दा उठाना चाहती थी, परन्तु मैंने उसको वहीं रुकने के लिये कहा, और कुछ देर के लिये राहत की भावना के साथ रहने के लिये कहा ।
इस प्रक्रिया में मैंने सीधे तौर पर संबंधात्मक आधार पर शुरूआत की क्योंकि मैं जानता था कि उसका मुद्दा उसका पिता है और मैं चाहता था कि मैं ऐसे तरीके खोजुँ जिसमें कि मैं उसके पिता जैसी स्थिति में हो सकुँ । ऐसा करने से मैं आसानी से जान पाया कि उसके मुद्दे क्या थे, और क्या मैंने भी उनका अनुभव किया है ।
अंतर और समानताएँ हमारे संबंधों को परिभाषित करने में सहायता करते हैं, और मुझे उससे जुदा रखते हैं, लेकिन जुडाव का एक बिंदु भी देते हैं, और हमारे बीच पारस्परिकता स्थापित करने के उपाय भी ।
स्पष्टत:, पारिवारिक व्यवस्था मेरी पर माता-पिता का असर डाल रही थी, और यह हानिकारक है ।
इसलिये, उसके पिता के स्थान की कल्पना करके मैं उसे इस बारे में एक संदेश दे पाया हूँ, जो उसके ऊपर असर कर सकता है । यह एक खुशनुमा पारिवारिक समूह की व्याख्या है ।
जाहिर तौर पर, शराब के साथ भी मुद्दे थे लेकिन हम सबको एक साथ नहीं सुलझा पाते, सबसे स्पष्ट ये बात है कि उसे अपने पिता को बचाना बंद कर देना चाहिये । इसलिये उससे अस्तित्व संबंधी जिम्मेदारी का संदेश उसको रुकने में सहायता कर सकता है, और वो अपनी जरूरतों पर धयान दे सकती है ।
राहत से यह संकेत मिलता है कि हम सही दिशा में जा रहे थे । प्रारम्भ की शारीरिक जाँच
ने यह सुनिश्चित कर दिया था कि मेरे पास आधार था और मैं बदलाब को देख सकता था ।

सोमवार, 14 जुलाई 2014

Case #22 - 22 दरवाजे पर एक भेडिया

मेट्ट एक सफल व्यापारी था । उसने अपना ज्यादातर वयस्क जीवन अपने बारे में जानने में, अधययन करने में, स्वयँ सहायता करना सिखाने वाली पुस्तकें, और अपनी सकारात्मक गति बनाने में व्यतीत किया था । अभी हाल ही में हुए उसके तलाक ने उसके जीवन को एक नये संबंध के कारण नया मोड़ दिया था । उसकी पिछली पत्नी बहुत आलो्चनात्मक थी, विशेषतया उसकी आर्थिक स्थिति और कामकाजी जीवन को लेकर क्योंकि वह अमीर नहीं था । उसने हमेशा उस पर उसकी आर्थिक सफलता को ले कर आघात किया था । वो मेरे पास अपने काम करने के स्थान पर घबराहट का दौरा पड़ने के अनुभव के बाद आया । वह लगभग सारा दिन 'लकवे' से ग्रसित रहा ।
इसका एक कारण उसका अपनी पूर्व पत्नी से सुबह का वार्तालाप लगता था, जो चाहती थी कि वो अपने सुबह के सारे कार्यक्रम रद्द करके उन दोनों के बेटे को लेने आये क्योंकि उसकी कार गैराज में जानी थी । हमेशा की तरह, उसके साथ बात करते हुए वह कटु, इल्जाम लगाने वाली तथा आलोचनात्मक थी ।
जो भी हो, हाल में भी बहुत सारी घटनाएँ हुई थीं – वह एक ठेका, जिसकी उसे उम्मीद थी, प्राप्त नहीं कर पाया था; बहुत सारे खातों में देर से देनदारी हो रही थी; वह अपने पेशे को बनाने में बहुत सी सकारात्मक चीजें कर रहा था, जिसमें से एक किताब लिखना भी था, लेकिन इसमें से किसी ने भी तात्कालिक प्रभाव से फल नहीं दिया; एक पिछला सांझेदार उसके ऊपर केस कर रहा था; और अंत में जब उसने अपने बैंक खाते को देखा तो उसमें केवल 100 डालर ही बचे थे ।
मैंने उससे पूछा कि मुझे यह सब बताते हुए उसे कैसा लग रहा था । वो जो कुछ हो रहा था उसके बारे में अपने विचार बताता रहा, अपने बहुत सी पिछली बातों को दोहरा्ता रहा…लेकिन मैंने उसे बीच में ही रोक उसके अपने शारीरिक अनुभव में बताने के लिये कहा ।
उसने कहा कि पिछली बार जब उसे घबराहट का दौरा पड़ा था तो उसके शरीर को लगा था कि वो एक सीधी जैकेट में है । अब वो कमजोर, डरा हुआ महसूस कर रहा था, विशेषतया छाती में ।
मैंने उसे अपनी भावनाओं पर धयान देने के लिये कहा…उसने गौर किया कि उसे गर्मी लग रही थी, और एक डर की परत थी । उसने कहा कि यह एक विदेशी आक्रमणकारी की तरह था ।
उसने फिर वो उपमा दी जो उसके पिता द्वारा दी जाती थी – दरवाजे पर भेड़िया ।
सामान्यतया, जब उसका आत्मविश्वास ज्यादा होता था तो वह चुनौतियों का सामना कर सकता था । लेकिन इस समय, जब उसके आत्मविश्वास ने उसका साथ छोड़ दिया था तो भेड़िया उस पर काबू पा सकता था ।
मैंने ये सुझाव दिया कि भेड़िया न केवल दरवाजे पर था, वह उसके ऊपर चढ़ कर खड़ा था।
इसलिये मैंने उससे ये कल्पना करने के लिये कहा कि भेड़िया उसके ऊपर चढ़ा हुआ था । उसने कहा 'उसकी थूक मुझ पर गिर रही है' । इसलिये,मैंने उससे कहा कि ऐसा महसूस करे कि जैसे भेड़िये ने  उसको नीचे दबोच कर रखा था, और वह भेड़िये का हाँफना सुने और उसकी थूक अपने चेहरे पर गिरती हुई महसूस करे ।
मैंने उससे कहा कि वह भरपूर साँस ले, और डर को अपने सारे शरीर में महसूस करे, और वर्तमान में रहे । मैंने उससे कहा कि वो अपने शरीर में बहुत अधिक मात्रा में शक्ति महसूस करेगा और अगर किसी भी समय यह शक्ति बहुत अधिक हो जाती है, तो वह प्रक्रिया को रोक सकता था ।
उसने वैसा ही किया और उसका शरीर ऐंठन में झटके लेने लगा । कुछ देर बार उसने आँखें खोली और हैरानी से बताया कि उसे अपने शरीर में बहुत सारी शक्ति महसूस हुई थी।
मैंने फिर उसे ये कल्पना करने के लिये कहा कि वह भेड़िया था, मेट्ट के ऊपर चढ़े हुए उसकी थूक गिर रही थी । मैंने उससे मेट्ट से बात करके कुछ संदेश देने के लिये कहा ।
कुछ देर बाद उसने आँखें खोली । उसकी चेतना में अंधकार छा गया था। उसने कहा 'दर-असल यह एक अक्लमंद भेड़िया है' ।
उसको समझ में आया कि उसे एक भेड़ समझा जाता था, और उस स्थिति में, वह कमजोर था, अपना पक्ष नहीं रख पाता था, उस पर काबू किया जा सकता था और उसका आत्मविश्वास कम था । भेड़िया उसका अपना ही त्यागा हुआ हिस्सा था, जो चुनौतियों से लड़ने के लिये शक्ति से भरपूर था, व्यक्तिगत तथा व्यवसायिक रुप से ।
इस प्रक्रिया में मैंने पहचान का प्रयोग किया और विशेषतया उन संकेतों से शुरुआत करके जिन्हे शारीरिक अनुभव ने बताया था ।  मैंने आक्रमित से संबंध का अनुसरण किया क्योंकि यह स्पष्टत: केवल प्रत्यक्ष धमकी से ज्यादा था, उसको डर के कारण लकवा मार गया था – खतरे का एक बहुत ही नजदीकी अनुभव ।
इसलिये, गेस्टाल्ट के तरीके में, हम सीधे ही खतरे के अनुभव में प्रवेश करते हैं लेकिन पर्याप्त सहायता के साथ । फिर हम उसके दूसरे तरफ के बिंदु की तरफ जाते हैं – खतरनाक होते हुए, विभाजित के उपचार के लिये ।

शुक्रवार, 11 जुलाई 2014

Case #21 - 21 जंगली औरत


सिंथिया अभी हाल ही में अपने तीसरे पति से अलग हुई थी । वो बीस वर्षों तक एक साथ रहे थे । वह अपने एक सपने पर काम करना चाहती थी ।
मैंने उसे वह वर्तमान में ऐसे बताने का निर्देश दिया कि जैसे कि ये सब हो रहा था, एक-एक करके ।
उसने कहा:
मैं बिस्तर पर सो रही हूँ । वो आता है, मेरा आलिंगन ले कर चूमता है । वो मुझे बताता है कि अभी-अभी उसने एक नया घर सस्ते में खरीदा है जिसमें एक बड़ा सा शेड है । इसमें एक नया बेडरूम एक कमरे के साथ है ।
हम अपने घर की ओर जाते हैं और वहाँ एक लड़का एक लकड़ी का बड़ा सा टुकड़ा ले कर खिड़की के बाहर फेंकता है । अब जाह्न (पति) आता है और उसके फोन की घंटी बजती है । वो कहता है कि उसे अकेले में बात करनी है । मुझे लगता है कि उसकी नई महिला मित्र है ।
मैंने फिर उसको कुछ किरदार निभाने के लिये और हरेक किरदार में अपने बारे में बताने के लिये कहा ।
पहला घर था – उसने कहा, 'मैं नया, चमकदार, अच्छे गुणों वाला, पुराने घर से कहीं बेहतर हूँ । खुशनुमा, बड़ा और विशाल ।'
फिर जाह्न – ' मैं खुश हूँ, घर चाहता हूँ । इसे खरीदना एक चमत्कार है । मैं मजबूत हूँ, मेरा एक उद्देश्य है।'
फिर वो लकड़ी का टुकड़ा जो खिड़की से बाहर फेंका गया था – 'मैं सख्त, मजबूत, शक्तिशाली हूँ । पुराने घर की कोई कीमत नहीं है । मैं केवल यह दिखाना चाहता हूँ कि यह
टूटा हुआ है, बहुत ज्यादा आवाज करता है ।'
फिर लड़का, जो सपने में 13 साल का था – ' मैं शरारती, मजबूत हूँ ।'
फिर नई प्रेमिका – 'मैं आकर्षित हूँ, जिज्ञासु हूँ ।'
इस सबके लिये उसे पढ़ाना पड़ा क्योंकि सिंथिया इस बात को बताना चाहती रही कि हरेक तत्व का मतलब क्या है ।
लेकिन गेस्टाल्ट में हम प्रत्यक्ष अनुभव को देखते हैं न कि पहले से बनी हुई धारणा या संबंध को । इसलिये मैं उसे हरेक तत्व को पहचानने के लिये और अपने अनुभवों को, न कि अपने विचारों को, बताने के लिये पीछे की ओर ले जाता रहा ।
मैंने उससे पूछा कि इन सबसे अलग क्या है – लड़का । चंचल, जो अपने आपे में नहीं है ।
इसलिये, मैं इसको उसके वर्तमान जीवन के साथ जोड़ कर देखता हूँ – ऐसा क्या है जो अपने-आपे में नहीं है ।
सिंथिया ने कहा – सारी रात घर से बाहर रहना, एक बड़ा सा अलाव हो, चाँद की चाँदनी में समुद्र किनारे पार्टी हो और फिर समुद्र किनारे ही सो जायें ।
उसने कहा कि वो जाह्न को लाना चाहेगी लेकिन वो मुझमें एक जंगली औरत देखना पसंद नहीं करता…इसलिये मैंने इसे निरुत्साहित करना सीख लिया…वो एक ऐसी उम्मीद को संभाल नहीं सकता जो उसे एक ही तरीके की लगती है' ।
उसने बताया कि उसने उसे सालों तक अपने साथ राक एण्ड रोल डांस कराने की कोशिश की परन्तु अंत में उसको अपनी कोशिश छोड़नी पड़ी ।
मैंने उससे कहा कि वह खुद को न रोके और स्वयँ ही डाँस कक्षाओं में जाती रहे ।
फिर मैंने उसे जाह्न को कल्पना में कुछ जंगली तरीके से कहने को कहा, ऐसा कुछ जो उसके चरित्र में नहीं है ।  मैं जाह्न का किरदार निभाऊँगा और वह मुझे यह सीधे तौर पर कह सकती है ।
- वह उसको कहती है कि वो चाहती है कि दोनों नौकरी छोड़ दें, एक नाँव ले लें, और समुद्र में जायें, जहाँ भी लहरें उन्हे ले जायें, वो खाना बनायेगी और दोनों एक-साथ कविताएँ लिखेंगे ।
मैंने उसे अब की बार कुछ बहुत जोर से कहने को कहा, ऐसा कुछ जो थोड़ा चुनौतीपूर्ण हो ।
उसने कहा वो उसके द्वारा दवाइयाँ लेने के कारण थक चुकी है और उसे अपने पिछले वर्ष गँवाने का, और इस बात का इन्तजार करने का कि वो कुछ अलग करे, गुस्सा है । वो और वादों को अब और सहन नहीं करेगी, बस कार्यवाही होनी चाहिये ।
मैंने जो कुछ हुआ था उसे बताया – वह बहुत स्पष्ट थी, स्थिर थी, तथा जाह्न की तरह मेरी गैर-बचाव की मुद्रा में(जिसे वह साधारणतया मुश्किल पाता था), मैंने उसकी स्पष्टवादिता की प्रशंसा की ।
मैंने उसे और मजबूत, कटु, और जंगली होने के लिये कहा ।  
उसने अपने बारे में, अपनी सीमाओं के बारे में, कुछ और कहा ।
मैंने उसे फिर बताया कि क्या हुआ था ।
उसने अपने आप को बहुत मजबूत महसूस किया ।
गेस्टाल्ट में हम उन चित्रों की जाँच करते हैं जो उभरते हैं । सपने में यहाँ-वहाँ बहुत से चित्र उभरते हैं, परन्तु हमने उनको चुना जिनमें उसके लिये सबसे अधिक शक्ति थी – कुछ ऐसा करना जो असामान्य हो ।
यह सकारात्मक और नकारात्मक, दोनों ही तरीको से, जंगलीपने, मजबूती और उसका खुद को आगे बढ़ाने में परिवर्तित हुआ ।
मैंने प्रयोग में उसके साथी का किरदार निभा कर भाग लिया, और फिर जो कुछ हुआ उसके बारे में उसे बताया । इसने ये सब उसको स्वाभाविक लगने में मदद की और सुरक्षा की एक ऐसी अनुभूति पैदा की जिससे वो एक नये तरीके से कोशिश कर सके ।
गेस्टाल्ट सहायता द्वारा कुछ नया करने की कोशिश है और उन मुख्य मुद्दों पर ध्यान  देना  जो जागरूकता में उत्पन्न होते हैं – और इन मुद्दों तक पहुँचने के लिये सपने बहुत अच्छे माधयम हैं  ।


रविवार, 6 जुलाई 2014

Case #20 - 20 जमा हुआ ढक्कन

जेन को समूह में बाँटने से गुस्सा आता था । वो काँपती हुई आई । वो विषय-वस्तु के बारे में बात नहीं करना चाहती थी, जो ठीक था । हमने केवल उर्जा के ऊपर काम किया । मैंने उसे अपना अनुभव बताने के लिये कहा । उसने जम जाने के बारे में बात की । मैंने उसे एक लक्षण के बारे में बताने को कहा कि वो क्या महसूस करती है । उसने कहा कि एक जमा हुआ ढक्कन । मैंने उसे शरीर का वो हिस्सा दिखाने के लिये कहा जहाँ पर यह था – पेट के निचले भाग में !
मैंने उससे कहा कि वो ऐसे बोले जैसे वो ढक्कन है "मैं एक जमा हुआ ढक्कन हूँ "। उसने वह किया और बताया कि कैसे उसने कोनों को बंद किया ।
इसलिये मैंने उसे कोने की तरह बोलने के लिये कहा । "मैं एक कोना  हूँ…" और फिर उसने कोने  के दूसरे पक्ष बताये । मैंने उससे एक हाथ वहाँ रखने के लिये कहा जहाँ जमा हुआ ढक्कन था और दूसरा हाथ वहाँ रखने के लिये कहा जहाँ कोना था (उसके बगल में) । फिर मैंने उसको उन जगहों पर साँस लेने के लिये कहा । इसने उसकी भावनाओं को बढ़ा दिया । उसकी टाँगें काँपने लगी । इसलिये, मैंने उसको प्रोत्साहित किया ।
उसे बहुत उदासी महसूस हुई, वह रोने लगी । वो कुछ बता नहीं पाई । तो मैंने उसे पैरों की अंगुलियों को मोड़ने के लिये कहा । उसे यह बहुत मुश्किल लगा और एक ही पैर कि अन्गुली सकी । थोड़ी देर बाद मेरी सहायता से उसने दूसरे पैर की अंगुलियाँ भी मोड़ लीं । फिर उसने बार-बार डकार लेनी शुरु कर दी । उसने कहा कि उसके साथ यह होता रहता है । शारीरिक रूप से ये एक बहुत अच्छा निकास है, और अभिव्यक्ति की एक शुरुआत है ।
अब ये पक्का था कि उसे अपनी उर्जा बढ़ती हुई लग रही थी, अभी उसके पास शब्द नहीं थे ।  इसलिये, मैंने उसे शारीरिक निकास के लिये प्रोत्साहित किया और धीरे-धीरे वो अपनी भावनाओं को शब्दों में ढाल पा रही थी । मैंने उसे, ये मान कर कि वह व्यक्ति जिसने उसे चोट पहुँचाई थी वहीं पर है, सीधे तौर पर कहने के लिये कहा ।
यह उसके लिये बहुत सारी पीड़ाओं का अंत था जिसे वो अपने साथ बहुत वर्षों से चुपचाप ले कर चल रही थी । उसे अपनी भावनाओं को लक्षण(ढक्कन, कोना)  की तरह व्यक्त करने के लिये कह कर, हम उन लक्षणों पर सीधे-सीधे काम कर सकते थे । उसको उन्हे अपनाने के लिये कह कर उसकी जागरुकता पर ध्यान बढ़ा जो पहले धुंधलाई हुई और उपेक्षित थी – स्वाभाविक रूप से, कोई भी दर्द को महसूस नहीं करना चाहता । अपने शरीर की उर्जा और भावनाओं के साथ रहने में उसकी सहायता करके हमने उसके सोचने की प्रक्रिया को पूरी तरह से उपेक्षित कर दिया और एक स्वाभाविक रूप से उसे खुलने दिया ।
अगर आप शारीरिक प्रक्रिया के साथ रहेंगे तो हमेशा ही ऐसा होगा क्योंकि शरीर हमेशा ठीक होने की दिशा में ही बढ़ता है ।

सोमवार, 30 जून 2014

Case #19 - आकर्षण ता सीमाएँ

डी एक नवयौवना थी जिसने अपने डर के बारे में बताया । मैंने पूछा, तुम्हे किस चीज का डर है ? उसने कहा वो आदमियों से डरती है । मैंने उसे स्पष्ट करने के लिये कहा । उसने बताया कि उसे पुरुषों का ध्यान अपनी ओरचाहिये लेकिन वह उससे डरती भी है ।
मैंने उसे स्वयं को दोनों चिकित्सक तथा अधयापक बताया, लेकिन मैं भी एक आदमी हूँ । उसने कहाँ, हाँ, लेकिन वो मुझे वास्तव में वैसा नहीं मानती है ।
मेरा ध्यान मुद्दे को अभी और इसी  समय में लाने का और एक संबंध स्थापित करने में था । ज्यादा जागरूकता लाने में और एक संबंध के विकास के लिये मैं स्वयँ को एक साधन की तरह प्रयोग करना चाहता था ।
इसलिये मैंने कहा कि असलियत तो यही है कि मैं एक पुरुष हूं इसलिये यह देखने के लिये कि यह उसके लिये कैसा है, यह फायदेमन्द रहेगा ।
उसने कहा कि इससे दहशत होती है । मैंने  पूछा क्यों । क्योंकि मैं उसे आकर्षक पा सकता हूँ ।
उसके साथ गल्त क्या है ? क्योंकि मुझे उससे प्रेम हो सकता है और उसके लिये एक मुश्किल स्थिति पैदा हो सकती है ।
इसलिये मैंने उससे कहा कि मुझसे सीधे तौर पर कहे कि मैं तुमसे प्यार में नहीं पड़ना चाहती, मैं तुम्हारे लिये उपलब्ध नहीं हूँ ।
अपनी सीमा निर्धारित करने पर उसे काफी अच्छा महसूस हुआ ।
फिर मैंने उसे अपना अनुभव भी बताया । मैंने कहा कि मैं भी उसके प्रेम में नहीं पड़ना चाहता । तुम मुझे आकर्षक तो लगती हो लेकिन हकीकत में तुम और मैं अपनी सीमा में रह सकते हैं ।
फिर उसके बाद हमने कुछ बातचीत की जिसमें मैंने उसको बताया कि मुझे उसके आकर्षक लगने से कैसा लगा और ये सब उसको कैसा लगा । वो अपने मुद्दे के छोर पर थी – अपनी ओर धयान तो चाहती थी लेकिन डरती भी थी ।
इसलिये एक सुरक्षित तरीके से परखने  पर, उसे अपने ठीक होने का अनुभव होता, अपनी सीमाएँ निर्धारित करने में और उन्हे व्यक्त करने में सक्षम होती, और आकर्षण को बहुत ज्यादा न होने दे कर  उससे निपट पाती ।
उसने इस बातचीत में कई बार शर्मिंदगी महसूस की । इसलिये, मैंने इसका केन्द्रबिंदु  अपने और अपने अनुभव की ओर कर लिया । मैंने उसे बताया कि ये सारी चीजें मुझे भी आसान नहीं लगती हैं – ये कुछ ऐसा है  जिसे कई बार अपनी चेतना से बाहर निकालना चाहा है । इसलिये ये अच्छा है कि इसे एक-दूसरे को बता पायें और बिना नियन्त्रण खोने के डर से वर्तमान क्षण में उसका अनुभव कर पायें ।
उसके लिये काफी तरीकों से ये एक नया अनुभव था और उसे अपनी सीमाएँ तय करने में, विषय के बारे में बात करने में, और संबंध में बिना किसी मुश्किल के कामुकता के पक्ष के बारे में जागरुक होने के लिये उसमें एक विश्वास आया था ।  
गेस्टाल्ट प्रमाणिकता पर जोर देता है और उसे जागरूकता को बढ़ाने की प्रक्रिया में प्रयोग करता है और उस जागरुकता को संबंध के बीच ले कर आता है ।

शुक्रवार, 27 जून 2014

Case #18 - 18 छोटी सी छुट्टी

टरुडी अपनी आँटी और अंकल के साथ रहती थी । अंकल को उसकी साइकोलाजी में रूचि बेकार की लगती थी । वह उस पर नौकरी करने के लिये जोर डालता था । वह उसके द्वारा कार्यशालाओं, जैसे कि यह कार्यशाला, पर किये गये खर्च की आलोचना करता था और उससे कहता था कि उसकी उम्र 26 वर्ष की होने के कारण उसे अब विवाह कर लेना चाहिये ।
जब मैंने उससे पूछा कि उसे अपने शरीर में कैसा महसूस होता है, तो उसने बताया कि उसे कंधों में दर्द होती है । शारीरिक तौर पर यह सामान्यतया जरूरत से ज्यादा जिम्मेदारी लेने के कारण होता  है ।
और वास्तव में, वो इन मामलों में अपने ऊपर ज्यादा जोर डालती थी । नौकरी ढूँढना, किस तरह की नौकरी ढूँढे, इत्यादि । मैंने उससे पूछा वह क्या करना चाहती थी – क्या चिकित्सा करवाना चाहती  थी। लेकिन उसे लगता था कि उसे अभ्यास की आवश्यकता है और इससे पहले कि वह तैयार हो, जीवन का अनुभव लेना चाहती थी । मैंने उससे पूछा, वो कब होगा – तो उसने कहा 'जब मैं बूढ़ी हो जाऊँगी' ।
गेस्टाल्ट में हम हमेशा विशिष्टताओं पर केन्द्रित करते हैं । मैंने उससे पूछा, कितनी बूढ़ी ? तो उसका जवाब था 80 साल की ।
इसलिये, मैंने उससे पूछा कि इस समय और उस समय के अंतराल में वो क्या काम करना चाहेगी । अपने ऊपर दबाव महसूस होने के कारण उसे इस बात का जवाब देने के लिये सोचने में मुश्किल हो रही थी ।
इसलिये मैंने उससे कहा कि इस दबाव से छुट्टी ले ले और 1 मिनट के लिये छुट्टी मनाये । उस समय के दौरान बस मेरे साथ रहने के लिये । मैंने उसमें एक ऐसी चीज देखी, जिसकी मैंने प्रशंसा की । और मैंने उसको वही करने के लिये कहा । इसने उसको आधार दिया और मेरे साथ उसके संबंध में पूर्णता ला दी, उसे सकारात्मक मान्यता दी (उसने बताया था कि उसे कोई प्रोत्साहन नहीं मिलता, सिर्फ अपने माता-पिता से दबाव मिलता था ), और संवेदिक जागरूकता में ले आया । हम गेस्टाल्ट में लोगों को अपनी 'कहानियों' तथा योजनाओं से बाहर लाने के लिये इन प्रारंभिक प्रक्रियाओं का प्रयोग करते हैं ।
यहाँ मैंने जो प्रस्तावित किया था वो एक गेस्टाल्ट का प्रयोग था ।
वह थोड़ी सहज हुई, परन्तु उसे ये बहुत मुश्किल लगा । वो अपने को कोई 'छुट्टी नहीं दे पाई । इसलिये मैं उसकी जाँच करने को उधर गया और उसके कंधे के उस हिस्से को, जहाँ उसे दर्द हो रही थी, ढूँढ कर अपनी अंगुली से दबाया । यह मालिश नहीं थी, बस जिस जगह की वजह से उसे तनाव हो रहा था, उसकी जानकारी के लिये तथा इस बारे में उसकी जागरुकता को बढाने के लिये – वो इसकी इतनी आदी हो चुकी है कि वह उसके बारे में सोचती नहीं ।
जब मैंने उसे छोड़ा तो ही वो मुझे छोड़ पाई ।
इससे पहले कि हम उसकी नौकरी की स्थिति के बारे में थोड़ी और बातचीत करें, हमने फिर से एक छोटी सी छुट्टी के लिये कोशिश की।
उसके बाद हम फिर 'छुट्टी' पर आ गये, जिसको उसने मुश्किल पाया ।
मैंने दुख व्यक्त किया कि यह उसके लिये बहुत मुश्किल था । मैंने चिंता भी जाहिर की कि यदि उसने अपने ऊपर इतना दबाव पड़ते रहने दिया तो वो इतने लम्बे समय तक जी नहीं पायेगी ।
इससे उसकी जागरूकता एक बड़े परिदृश्य पर केन्द्रित हुई और इतने अधिक दबाव के साथ जीने के नतीजे पर । इसने उसको यह दृष्टिकोण भी दिया कि उसकी यह आदत उसे उस रास्ते पर ले जायेगी जिसे वो वास्तव में चुनना नहीं चाहती ।
गेस्टाल्ट चुनाव के बारे में है ।   

सोमवार, 23 जून 2014

Case #17 - 17 धिसी-पिी कहानी को सुलाना

जेन को दिमागी तकलीफ थी । उसने अपने जीवन में बहुत दुख झेला था; उसका दवाखानों में आना-जाना लगा रहता था, और बहुत सी दवाइयों को लेना पड़ता था और एक बहुत बड़ी मुश्किल से छुटकारा पाने की कोशिश में इलाज करवा रहा था । उसका स्वाभिमान बहुत कम था और उसे लोगों के बीच आत्मविश्वास नहीं था; वो बहुत शर्मीला था ।
उसने बोलना शुरू किया; वह अपने दुख की कहानी बताना चाहता था ।
मैंने तभी उसे बीच में रोक दिया । मेरा मत था कि यह एक बहुत पुरानी धिसी-पिटी कहानी है जिससे उसका मकसद हल नहीं होता,  शायद सिवाय इसके कि वह हमदर्दी लेना चाहता था,  खुद पर अफसोस करना चाहता था या फिर अपनी बहुत समय की पीड़ा को सही ठहराने के लिये ।
मैंने उससे कहा कि मैं उसे किस चीज में आनन्द आता है और किस चीज में पीड़ा मिलती है में अंतर समझाऊँगा । मैंने उसे कमरे में चारों ओर देखने को कहा और ये बताने के लिये कहा  कि किस व्यक्ति को देख कर उसे प्रसन्नता महसूस होती है, एक ऐसे मापदण्ड पर जिसमें ज्यादा आनन्द और कम आनन्द का पता चले ।
फिर मैंने उसे किसी ऐसे व्यक्ति को चुनने के लिये कहा जिसको देख कर उसे सबसे अच्छा लगा । उसने अपने चिकित्सक को चुना, जो उस समूह में था । मैंने उससे कहा कि वो बताये उसे क्या लगता है । उसने बताया कि उसे अपनी छाती में जोश सा महसूस होता है । मैंने उससे कहा कि वह जोर से साँस ले । देखने से वो सहज लग रहा था, उसका चेहरा कोमल हो गया था । फिर मैंने उससे कहा कि उसके बाद समूह में उसको कौन सा व्यक्ति अच्छा लगता है । उसने उम्र में सबसे छोटे सदस्य को चुना । इसलिये, मैंने उसे वैसा ही करने को कहा ।
यह सब करने के बाद वह शांत और तृप्त लग रहा था ।
इस प्रयोग ने उसकी दु:खद कहानी को सुलझाया और उसको संबंधों, वर्तमान के जीवन्त सम्पर्क में लाया ।
गेस्टाल्ट यहाँ और अभी के संदर्भ में काम करता है। संदर्भ को समझ्ने के लिये या और गहराई से समझने के लिये कहानी में जाना लाभदायक हो सकता है, लेकिन कुछ कहानियाँ नई होती हैं जिन्हें सुनने और समझने की जरूरत होती है । बाकी कहानियाँ घिसी-पिटी होती हैं जिनमें कोई नयापन नहीं होता और खुद को महत्व देने के लिये होती हैं । सभी कहानियों को अंत में वर्तमान में लाया जाता है जहाँ पर हमें कोई चुनाव मिलता है, जो कि गेस्टाल्ट का महत्वपूर्ण केन्द्र बिन्दु है ।

शुक्रवार, 20 जून 2014

Case #16 - 16 मुस्कराी आँखें, डरावनी आँखें

इनग्रिड ने मेरी तरफ देखा और कहा तुम्हारे पास मुस्कराती आँखें हैं ।
मैंने कहा, डरावनी आँखों से बेहतर ।
मैं इससे भिन्न करना चाहता थ । यह बढ़िया है कि वह मेरे साथ सुरक्षित महसूस कर रही थी, लेकिन यह इसलिये था  कि उसने मेरा डरावना भाग नहीं देखा था । और, उसके डरावने भाग के बारे में क्या । मेरी रुचि एक भरपूर संबंध की ओर बढ रही है, बजाय इसके कि सुरक्षा के पूर्वानुमान के साथ ही रहा जाये । इसलिये, मैंने उससे पूछा कि उसकी आँखें डरावनी कब थी, और मैंने उस समय की बात की जब मैं क्रोधित होता था, जब मुझे चोट पहुँचती थी ।
उसने अपने गुस्से की बात की । मैंने उससे एक खास उदारण बताने के लिये कहा । उसने बताया कि जब उसके पति ने उसे फोन किया तो उसने उससे कहा कि उस समय वह व्यस्त थी पर वास्तव में उसके पास बात करने के लिये समय नहीं था । वो लम्बे समय तक बात करता रहा और वो सुनती रही । ऐसा हमेशा ही होता था ।
इसलिये मैंने एक प्रयोग का प्रस्ताव किया ।
हम एक-दूसरे के आमने-सामने हाथ ऊपर करके खड़े हो गये और वैसा ही किया जैसा उसके पति के साथ होता था जब वो अपनी सीमा का उल्लंघन करता था । मैंने धीरे से उसके हाथ पीछे किये, जिससे कि उसको पीछे होना पड़ा नहीं तो वो गिर जाती ।
फिर मैंने उसको वापिस धक्का देने के लिये कहा । उसने कोशिश की, लेकिन बहुत ही हल्के से । हमने इसे बहुत बार दोहराया ।
मैंने उसको अपनी सीमा में रहने के लिये कहा । और अंत में उसने अपनी भरपूर शक्ति से बहुत जोर से धक्का दिया – यह बहुत जोरदार लगा ।
फिर मैंने उसे अपने पति की तरह करने के लिये और मेरी सीमा का अतिक्रमण करने के लिये   कहा । इस स्थिति का सामना करना उसके लिये बहुत मुश्किल था, आक्रामक होना उसके लिये बहुत बड़ा कदम था ।
इसलिये इस बार मैंने उससे कहा कि वो मुझे अपनी सीमा का उल्लंघन करने न दे, बल्कि रोक कर मेरी शक्ति का सामना करे । उसको लगा जैसे उसकी टांगों को लकवा मार गया हो और उसके हाथों में शक्ति न रही हो। इसलिये मैंने उससे कहा कि अपनी जागरुकता को अपने पैरों की तरफ लाये । कुछ समय बाद मैंने उसे आगे बढ़ने के लिये कहा और मैं पीछे हट गया । अंत में उसने अपने सारे शरीर को इस प्रक्रिया में लीन किया और मुझे उसे पीछे धकेलने में बड़ी मुश्किल हो रही थी क्योंकि वो अब वास्तव में अपनी शक्ति का प्रयोग कर रही थी ।
ऐसा लगा कि यह एक बहुत मजबूत मुकाबला था ।
यह एक बहुत शक्तिशाली प्रयोग था, जहाँ स्थिति के बारे में बात करने के बजाय, हम उसे उसी समय हम दोनों के बीच यहीं ले आये । खुद को शामिल करके मैं यह महसूस कर पाया कि वास्तव में उस संबंध में क्या हो रहा था, और उसे उसकी जकड़न और कमजोरी से निकाल कर पूर्णता की ओर जाने के लिये सहायता कर पाया ।

रविवार, 15 जून 2014

Case #15 - 15 वैंग का मामला, कमजोर बोध, और झपकी

वैंग एक प्रतिभाशाली युवक था । मैं एक तार्किक तरीके का दृष्टिकोण दर्शाना चाहता था । इसलिये, मैंने उसकी टी-शर्ट को देखने से शुरूआत की जो भूरे रंग की बहुत ही उबाऊ थी । उसने बताया कि उसने इसको चुना क्योंकि उसमें रंगों को पहचानने की क्षमता नहीं है, और उसे यह हरी लगती है ।
उसने दर-असल अपने रंग बोध के संबंध में 'कमजोर' शब्द का इस्तेमाल किया ।
उसने आगे बताया कि उसका संवेदी तथा अन्तर्वैक्तिक बोध सामन्यतया 'कमजोर' है ।
इससे उसकी महिला-मित्र के साथ कठिनाईयाँ होती हैं ।
मैंने इसमें अपनी बात कही और अपनी कमजोर बोध क्षमताओं के बारे में बताया ।
मेरे द्वारा अपनी व्यक्तिगत बातें बताने से उसको अपनी बातें आगे खुल कर कहने का आधार मिलता है ।
वह जानना चाहता था कि इसे कैसे बदले या ठीक करे ।
मैंने उसे गेस्टाल्ट के दृष्टिकोण से समझाया कि हमें ठीक करने में कोई रुचि नहीं है, परन्तु जो है उसे पूरे तौर करने में, हरेक व्यक्ति की शैली की मजबूतियों और कमियों को समझने में है । और फिर शायद संभावनों की सीमा को बढ़ाने में ।
इसलिये मैंने उसे उन विशेष उदाहरणों को बताने के लिये कहा जहाँ उसकी शैली उसके काम आती  है । वो इसके बारे में कुछ कहता है, और फिर 'लेकिन' कहता है…इसलिये मैंने उसे अपना मूल्याँकन करने से रोक दिया और फिर अपने उन उदाहरणों को ये मूल्यांकन करते हुए बताया कि वो कहाँ पर मेरे काम आते हैं ।
गेस्टाल्ट के तरीके में इलाज करने वाला अक्सर स्वयँ को उदाहरण के तौर पर पेश करता हैं ।
फिर मैंने उससे उसकी कमियों के बारे में पूछा । उसने एक साधारण सा प्रत्युत्तर दिया । इसलिये मैंने उससे किसी विशेष उदाहरण को बताने के लिये कहा । गेस्टाल्ट में हम मुद्दों को विशेष तरीके से इतना मथ लेते हैं कि हम उनके साथ काम कर सकें ।
उसने उदाहरण दिया कि उसकी महिला मित्र उससे प्रशंसा और कोमल शब्द चाहती है, और उसे ये लगता है कि उसने उसे पहले ही ये चीजें दे दी हैं । इसलिये वो इसका प्रतिरोध करता है । उसे इस बात को समझने में बड़ी मुश्किल होती है कि वह क्या चाहती है ।
मैंने उसको उसकी आँख झपकने के बारे में बताया, जो मैंने देखी थी । यह कुछ असामान्य थी – अक्सर जल्दी-जल्दी झपकती थी और कभी-कभी तो बड़ी उल्लेखनीय होती थी ।
उसको इस बारे में कुछ पता नहीं था कि वह ऐसा करता था, लेकिन उसके आँखें झपकाने के अनुभव से उसकी जानकारी कराने ने उसे बिल्कुल कोरा कर दिया । इसलिये मैंने उसे समूह में कुछ लोगों की तरफ देखने को कहा और कहा कि देखे कि उसके आँखें झपकाने के साथ क्या होता होता है । यह बहुत मुश्किल था, वह जल्दी से गया परन्तु कुछ देख नहीं पाया ।
इसलिये मैंने उसे अपनी ओर देखने और धयान देने के लिये कहा । उसने सीधे-सीधे अपना मूल्याँकन करना शुरू कर दिया, मैंने उसे केवल स्वयँ पर और अपने अनुभव पर कैमरे की तरह धयान देने के लिये कहा । यह उसके लिये मुश्किल था और उसे कोई ज्यादा जानकारी नहीं थी । लेकिन उस वक्त उसने आँखें धीरे से झपकाईं । मैंने पूछा उस वक्त क्या हुआ था ।
उसने कहा वह आँख मिलाना नहीं चाहता था । गेस्टाल्ट में हम घटना पर धयान देते हैं, खासकर वो मोड़ जहाँ चीजें बदलती हैं और उस वक्त के हुए अनुभव की जाँच करते हैं ।
हमने टालने के बारे में बात की और मैंने उसे अपने पिता के आने के दौरान का अपना उदाहरण दिया । फिर से, मैंने अपने बारे में जो खुलासा किया था, उसने आगे बातचीत करने का आधार बनाया । उसने कुछ भावुक हो कर प्रतिक्रिया व्यक्त की – उसको भी अपने पिता से बातचीत करने में मुश्किलें आती थी ।
हमारे पास उसमें जाने का समय नहीं था, लेकिन इसको आगे के कार्य के लिये चिन्हित कर लिया गया ।
पहले ही बहुत कुछ करना था, इसलिये हमने इस सत्र को समाप्त कर दिया ।
उसने जो कुछ जाना था उसका अभ्यास करने के लिये उसे एक विशेष मोड़ ला कर छोड़ दिया गया, जैसा कि वह शुरूआत करने से पहले था । वह चुस्त था, और हमेशा सोचने लगता था । इसलिये, आँखें झपकाने ने उसे अपनी भावनाओं से संबंध बनाने के लिये एक मार्कर दिया, विशेषतया तब जब वह देखता था कि चीजें हद से बाहर जा रही हैं ।
उसकी दूसरों के साथ सामंजस्य बैठाने की क्षमता तब तक काम नहीं कर सकती थी जब तक कि उसकी स्वयँ से सामंजस्य बैठाने की क्षमता का विकास न किया जाये । और आँखें झपकाने से जो अंतराल मिलता था उससे कुछ हद तक उसकी 'कमजोर' बोध शक्ति पर नियंत्रण रहता था ।



सोमवार, 9 जून 2014

Case #14 - 14 नींद : रोक के रखें या आने दें

जूली कहती है कि समूह में बैठे हुए वो बहुत ही सहज और उनींदी महसूस करती है ।
कहती है कि वो 20 सालों तक निंद्रा न आने की बीमारी से ग्रसित थी । मैंने उससे पूछा कि उस समय क्या हुआ था, और वो उत्तर देती है कि बहुत सारी चीजें थी, वो बहुत व्यस्त थी, और उसे सोने के लिये ज्यादा वक्त नहीं मिलता था । संदर्भ की खोजबीन करने के बजाय, मैंने उसके तात्कालिक अनुभव पर केन्द्रित होने का और एक गेस्टाल्ट प्रयोग करने का निर्णय लिया ।
मैंने उसे बताया कि नींद को आने देना चाहिये और उनींदी होने के लिये समूह में यही वह कर पा रही थी ।
इसलिये यदि उसे नियमित रूप से सोने में मुश्किल आती थी, तो स्पष्टत: उसको नींद को रोके रखने का अभ्यास है । इसलिये, मैंने उससे कहा कि आओ मुझे पकड़ कर, मेरी कलाई को पकड़ कर, सोने की कोशिश करो । फिर मैंने उससे कहा कि क्लास में नींद आने के अनुभव को मुझे कर के दिखाये और फिर उसे रोक कर रखे जैसे कि वह सोने से पहले करती थी ।
मैंने देखा कि उसका पकड़ना इतना मजबूत नहीं था, केवल दो उंगलियों से पकड़ रखा था । इसलिये, मैंने उसका धयान उस ओर खींचा और उससे कहा कि नींद आने देने का प्रयोग करे । यह उसके लिये मुश्किल नहीं था ।
यह एक छोटा सा प्रयोग था लेकिन इसने उसको इसका सीधा अनुभव कराया कि वो क्या कर रही है और उस चीज को किसी और तरीके से कैसे किया जा सकता  है । मैंने उससे कहा कि सोते समय वो ये धयान रखे कि कैसे उसे नींद को रोके रखने के बारे में पता चला और फिर याद करे कि उसने मेरी कलाई को कैसे छोड़ा और कैसे वो समूह में नींद को आने देती है ।
गेस्टाल्ट प्रयोग मुद्दों को वर्तमान में ले कर आने का है, और उनकी परख एक सम्मिल्लित, सक्रिय एवँ रचनात्मक तरीके से करने के बारे में है। जहाँ भी संभव हो, इसे आसामी और इलाज करने वाले के बीच एक संबंध स्थापित करके किया जाता है । इससे इलाज करने वाले को ये समझने में सहायता मिलती है कि क्या हो रहा है, बजाय इसके कि इसे बयान किया जाये । प्रयोग एक नया अनुभव देता है और उन उपस्थित चीजों के बारे में जानकारी देता है जिनके बारे में जानकारी नहीं मिलती या विस्तार से देखी नहीं जा सकती । गेस्टाल्ट में हम यह समझते हैं कि कैसे चीजों की पूरी जानकीरी की जाये, और वो अटकी हुई न रहें, अधूरी या बँटी हुईं…एकीकरण स्वाभाविक रूप से होता है । यह टाओइस्ट की अवधारणा है ।

मेरे बारे में

Steve Vinay Gunther·

मैं जेसटाल थेरेपी, सिखाने के साथ चिकित्सीय अभ्यास, कैरियर निर्णय कोचिंग

और परिवारीक कन्सटेलेस्न भी करता हुं.

ऑस्ट्रेलिया के साथ – साथ, मैं चीन, जापान, कोरिया, अमेरिका और मेक्सिको में कार्यशालाओं और प्रशिक्षण केंद्र चलाता हुं.

मैं “अन्डरस्टेनडींग द वुमन इन योर लाइफ ” का लेखक हुं, जो महिलाओं के साथ संबंधों के बारे में पुरुषों के लिए सलाह की एक किताब है.

मैं लाइफवर्क का निर्देशक हूँ और साथ ही प्रशिक्षण और पर्यवेक्षण प्रदान करता हुं.

मैं एक पीएचडी उम्मीदवार हूँ, जो बिजली की पारस्परिक गतिशीलता का अध्ययन करता हुं.

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